अस्पताल, डाटा सेंटर में डीजल का संकट? नई पाबंदी से बिगड़ेगी सप्लाई; इंडस्ट्री परेशान

सरकार ने औद्योगिक, वाणिज्यिक और संस्थागत उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल पंपों से डीजल खरीद पर सख्ती कर दी है. इस कदम का मकसद सस्ते रिटेल डीजल के दुरुपयोग को रोकना है, लेकिन अस्पतालों, डेटा सेंटरों, आईटी पार्कों और टेलीकॉम नेटवर्क जैसी जरूरी सेवाओं को अब ईंधन आपूर्ति और संचालन संबंधी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

डीजल की कीमत Image Credit:

केंद्र सरकार का 11 जून का फैसला पेट्रोल पंपों पर डीजल की बिक्री को सीमित करने का था, लेकिन इसका असर अब उन सेवाओं पर पड़ा है जिनके लिए हर मिनट कीमती है. सरकारी आदेश के मुताबिक, अब पेट्रोल पंपों पर एक बार में 200 लीटर से ज्यादा डीजल नहीं मिलेगा. इस कदम का मकसद उन व्यावसायिक ग्राहकों को रोकना था, जो सस्ता डीजल पाने के लिए सीधे पंपों पर पहुंच रहे थे, जिससे ईंधन की किल्लत की स्थिति पैदा हो रही थी. लेकिन इस फैसले ने बड़े अस्पतालों, डेटा सेंटरों और आईटी कैंपस के सामने बड़ा परिचालन संकट खड़ा कर दिया है.

क्यों पैदा हुआ यह संकट?

इस समस्या की जड़ है रिटेल और बल्क डीजल की कीमतों में मौजूद भारी अंतर. फिलहाल दिल्ली में पेट्रोल पंपों पर डीजल करीब ₹95.20 प्रति लीटर है, जबकि बल्क सप्लाई का भाव ₹134.50 के आसपास है. करीब ₹40 का यह अंतर सरकारी तेल कंपनियों ने आम नागरिकों को महंगाई से राहत देने के लिए रखा था.

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्योग जगत, टेलीकॉम टावर कंपनियों और बड़े ट्रांसपोर्टरों ने इसका फायदा उठाने के लिए बल्क सप्लाई के बजाय सीधे पेट्रोल पंपों से डीजल खरीदना शुरू कर दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले मई के महीने में तीन सरकारी तेल कंपनियों- आईओसी (IOC), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL) की पेट्रोल बिक्री में 4.8% और डीजल की बिक्री में 6.4% का भारी उछाल दर्ज किया गया.

सरकारी तेल कंपनियों की बिक्री में हुई अचानक बढ़ोतरी ने सरकार को यह सख्ती करने पर मजबूर किया, जिसके तहत अब औद्योगिक और संस्थागत ग्राहकों को केवल डेडिकेटेड पंपों या बल्क सप्लाई से ही ईंधन लेना होगा.

अस्पतालों के लिए ‘बिजली’ जीवन रक्षक है

सबसे ज्यादा परेशानी उन बड़े अस्पतालों को हो रही है जिनके लिए बिजली का निर्बाध प्रवाह सीधे तौर पर मरीज की जान से जुड़ा है. अस्पताल इसे केवल आपातकालीन बैकअप नहीं मानते, बल्कि ऑपरेशन और आईसीयू में वोल्टेज में हल्का सा उतार-चढ़ाव भी जोखिम भरा होता है.

इस मुद्दे पर पीटीआई (PTI) के हवाले से एक अस्पताल चेन के अधिकारी ने कहा, “कई अस्पताल पूरी तरह से ग्रिड बिजली पर निर्भर नहीं रहते. डीजल जनरेटर हमारी ऑपरेशनल प्लानिंग का अभिन्न हिस्सा हैं क्योंकि निर्बाध बिजली मिलना अनिवार्य है.” इन अस्पतालों के लिए अब कम समय में ईंधन जुटाना एक बड़ी चुनौती बन गया है, जो पहले स्थानीय पंपों से आसानी से हो जाता था.

आईटी सेक्टर और डेटा सेंटरों की दुविधा

डेटा सेंटर और आईटी पार्क अपनी ‘अपटाइम’ गारंटी को पूरा करने के लिए डीजल जनरेटर पर बहुत अधिक निर्भर हैं. कई जगहों पर ग्रिड से बिजली लेने के बजाय डीजल जनरेटर का उपयोग करना अधिक किफायती होता है, खासकर बिजली की अधिक मांग वाले घंटों (peak hours) के दौरान.

एक उद्योग विशेषज्ञ ने पीटीआई से बातचीत में कहा, “कुछ राज्यों में पीक आवर के दौरान बिजली की दरें डीजल जनरेटर से बिजली बनाने की लागत से कहीं अधिक हैं. इसलिए कंपनियां पीक आवर्स के दौरान अपनी बिजली जरूरतों के लिए जनरेटर पर भरोसा करती हैं.” अब, पाबंदियों के कारण इन संस्थानों के लिए अपनी बिजली की लागत और आपूर्ति को मैनेज करना मुश्किल हो गया है.

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उद्योग जगत को राहत की उम्मीद

फिलहाल, इन संस्थानों के पास 90 दिनों का समय है कि वे अपनी ईंधन आपूर्ति के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करें. रिपोर्ट के मुताबिक, इंडस्ट्री बॉडीज अब सरकार से इस आदेश में संशोधन और राहत की मांग कर रही हैं. उनका तर्क है कि अस्पताल और डेटा सेंटर जैसे सेक्टरों को इस पाबंदी से छूट मिलनी चाहिए क्योंकि ये ‘अति आवश्यक सेवाओं’ (essential services) की श्रेणी में आते हैं. सरकार ने अभी तक किसी विशेष सेक्टर को छूट देने के संकेत नहीं दिए हैं, लेकिन आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार ‘व्यावसायिक दुरुपयोग’ रोकने और ‘जरूरी सेवाओं’ के संचालन के बीच कोई रास्ता निकालती है या नहीं.