टाटा संस: AGM में वोटिंग को लेकर टाटा की कंपनियों के सामने दुविधा, विवाद के बीच चंद्रा की नियुक्ति बनी चुनौती
टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, इंडियन होटल्स कंपनी, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, टाटा पावर और टाटा केमिकल्स जैसी कंपनियों के सामने एक मुश्किल चुनाव है. ग्रुप के जटिल क्रॉस-होल्डिंग स्ट्रक्चर का मतलब है कि कई ऑपरेटिंग कंपनियों और शेयरहोल्डर्स के हित वोटिंग के गणित का हिस्सा बन सकते हैं.

टाटा संस के भीतर जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. हर दिन नई चुनौतियां सामने आ जा रही हैं. फिलहाल सभी की नजरें टाटा संस की आगामी सालाना आम बैठक (AGM) पर है, जिसमें वोट करने वाली टाटा की ऑपरेटिंग कंपनियों के सामने एक मुश्किल स्थिति है. वे टाटा संस के डायरेक्टर के तौर पर एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और होल्डिंग कंपनी के बोर्ड के बीच बढ़ते मतभेदों में किसी एक पक्ष का साथ देने के लिए मजबूर होने से बचना चाहती हैं.
ऑपरेटिंग कंपनियों की हिस्सेदारी
ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, इंडियन होटल्स कंपनी, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, टाटा पावर और टाटा केमिकल्स जैसी कंपनियों के सामने एक मुश्किल चुनाव है. ये कंपनियां या तो वोट करें और किसी एक पक्ष का समर्थन करने वाली दिखें, या फिर ऐसे विवाद से दूर रहें जिसके ग्रुप पर बड़े असर पड़ सकते हैं. टाटा संस में लगभग 10 ऑपरेटिंग कंपनियों की कुल हिस्सेदारी 12.86% है, जिससे शेयरहोल्डर्स के जटिल गणित में उनके वोट अहम हो जाते हैं.
चंद्रशेखरन की नियुक्ति
चंद्रशेखरन, जो अक्टूबर 2016 में टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे और जनवरी 2017 में चेयरमैन बने थे, उन्हें डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्त किया जाना है. टाटा संस के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर उनकी भूमिका कानूनी रूप से बोर्ड में उनकी स्थिति बनाए रखने पर निर्भर करती है.
टाटा संस के बोर्ड ने 17 सितंबर को एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त करने की बात कही गई है. उनका मौजूदा कार्यकाल अगले साल फरवरी में आधिकारिक तौर पर खत्म हो रहा है. लेकिन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया है.
क्रॉस-होल्डिंग स्ट्रक्चर
टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की बहुमत हिस्सेदारी है. ईटी के अनुसार, मामले से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि यह गलत है कि ऑपरेटिंग कंपनियों को ऐसे मामले में घसीटा जा रहा है, जो असल में ट्रस्ट्स और टाटा संस से जुड़ा है. यह ऐसी स्थिति है जिसके शामिल सभी लोगों पर लंबे समय तक असर पड़ सकते हैं.
ग्रुप के जटिल क्रॉस-होल्डिंग स्ट्रक्चर का मतलब है कि कई ऑपरेटिंग कंपनियों और शेयरहोल्डर्स के हित वोटिंग के गणित का हिस्सा बन सकते हैं. इससे कंपनियां ऐसे गवर्नेंस विवाद में फंस सकती हैं जिनसे वे बचना चाहेंगी.
कंपनियों को आखिरकार अपने बिजनेस और शेयरहोल्डर्स के फायदे को ध्यान में रखकर ही काम करना होगा. इसलिए, चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के पक्ष या विपक्ष में वोट देने को टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के रिश्तों पर एक बड़े नजरिए के तौर पर देखा जा सकता है.
मिसाल कायम करने का समय
कंपनियों के लिए यह मामला एक मिसाल कायम करने का भी है. कोई पक्ष लेने से ऐसी उम्मीदें बन सकती हैं कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच भविष्य में होने वाले मतभेदों पर ऑपरेटिंग कंपनियों को कैसा रुख अपनाना चाहिए. माना जाता है कि वे चाहती हैं कि यह मामला टाटा संस के गवर्नेंस फ़्रेमवर्क के अंदर ही सुलझा लिया जाए, न कि अलग-अलग कंपनियों को किसी एक पक्ष को चुनने के लिए कहा जाए.
AGM के लिए तीन महीने का समय
टाटा संस को अपनी सालाना आम बैठक (AGM) करने के लिए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज से तीन महीने का एक्सटेंशन मिला है. इससे पहले 18 अगस्त को होने वाली बैठक कोरम (जरूरी संख्या में सदस्यों की मौजूदगी) न होने की वजह से टाल दी गई थी.
वह बैठक इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने ‘सर रतन टाटा ट्रस्ट’ (SRTT) पर लगी पाबंदियां नहीं हटाई थीं. SRTT उन दो मुख्य ट्रस्ट्स में से एक है जिनकी टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी है. इन पाबंदियों की वजह से ट्रस्ट बैठकें नहीं कर सकता था और न ही कोई फैसला ले सकता था.
नतीजतन, SRTT और ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट’ (SDTT) के संयुक्त रूप से नियुक्त नॉमिनी बैठक में शामिल नहीं हो सके, जिससे कोरम पूरा नहीं हो पाया. टाटा संस अपनी रुकी हुई AGM (सालाना आम बैठक) को जल्द से जल्द बुलाने के तरीकों पर भी विचार कर सकता है.
अनसुलझे मुद्दे
इसमें यह भी शामिल है कि क्या टाटा ट्रस्ट्स के प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) से जुड़े अनसुलझे मुद्दे के बावजूद बैठक करने की इजाजत के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) से संपर्क किया जाए.
कंपनीज एक्ट की धारा 97(1) के तहत, NCLT के पास AGM बुलाने का निर्देश देने की शक्ति है और ऐसा करते समय वह कंपनी की सामान्य कोरम (बैठक के लिए जरूरी सदस्यों की न्यूनतम संख्या) की जरूरतों को दरकिनार कर सकता है. इस कदम से टाटा संस को AGM में SRTT-SDTT के नॉमिनी की भागीदारी के बिना आगे बढ़ने की इजाजत मिल सकती है.