फिर कोर्ट पहुंचा ट्रंप का 10% वाला ग्लोबल टैरिफ, 24 राज्यों ने दी कानूनी चुनौती; जानें अब क्या होगा
अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 10 फीसदी वैश्विक आयात टैक्स पर कानूनी घमासान तेज हो गया है. 24 राज्यों और छोटे कारोबारियों ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी है. अब ट्रेड कोर्ट तय करेगा कि राष्ट्रपति के पास टैरिफ लगाने की सीमा क्या है.

Trump 10% Global Tariff US Trade Court: ट्रंप और उनके टैरिफ से जुड़ी तमाम बातें समय-समय सामने आती रहती हैं. हाल ही में ट्रंप टैरिफ से जुड़ा एक अहम कानूनी चुनौती सामने आई है. इसके तहत अमेरिकी ट्रेड कोर्ट ने शुक्रवार को उस 10 फीसदी वैश्विक आयात टैक्स की वैधता पर सुनवाई करेगा, जिसे ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में लागू किया है. इस फैसले को कई राज्यों और छोटे कारोबारियों ने अदालत में चुनौती दी है, उनका कहना है कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया निर्णय को दरकिनार करता है, जिसमें ट्रंप द्वारा लगाए गए ज्यादातर पुराने टैरिफ को असंवैधानिक ठहराया गया था.
किसने दायर किया मुकदमा?
रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 24 राज्यों, जिनमें ज्यादातर डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले हैं, उनके साथ दो छोटे व्यवसायों ने मिलकर ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है. इनका तर्क है कि 24 फरवरी से लागू किए गए ये नए टैरिफ न केवल कानूनी सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी उचित नहीं हैं. इस मामले की सुनवाई न्यूयॉर्क स्थित यू.एस. कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड की तीन जजों की पीठ द्वारा की जाएगी, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क पेश करेंगे.
ट्रंप ने टैरिफ का बनाया बड़ा हथियार
ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में टैरिफ को विदेश नीति का एक प्रमुख हथियार बना लिया है. उनका दावा है कि अमेरिका में लगातार बढ़ते व्यापार घाटे- जहां आयात, निर्यात से ज्यादा है, को संतुलित करने के लिए ये कदम जरूरी है. प्रशासन का कहना है कि ऐसे हालात में राष्ट्रपति को बिना कांग्रेस की मंजूरी के भी टैरिफ लगाने का अधिकार है. इन नए टैरिफ को ट्रंप ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत लागू किया है. यह प्रावधान राष्ट्रपति को सीमित अवधि (150 दिन तक) और सीमित दर (अधिकतम 15 फीसदी) के भीतर टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, बशर्ते कि देश गंभीर भुगतान संतुलन संकट या डॉलर के अवमूल्यन के खतरे का सामना कर रहा हो.
क्या है पूरी कहानी?
हालांकि, मुकदमा दायर करने वाले राज्यों और व्यवसायों का कहना है कि इस धारा का उद्देश्य केवल अस्थायी और आपातकालीन आर्थिक स्थितियों से निपटना है, न कि नियमित व्यापार घाटे को नियंत्रित करना. उनका यह भी तर्क है कि सामान्य व्यापार घाटा, “balance-of-payments deficit” की कानूनी परिभाषा में नहीं आता. गौरतलब है कि ट्रंप ने इन टैरिफ की घोषणा उसी दिन की थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बड़ा झटका देते हुए IEEPA (International Emergency Economic Powers Act) के तहत लगाए गए उनके कई टैरिफ को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने साफ किया था कि इस कानून के तहत राष्ट्रपति को इतनी व्यापक शक्ति नहीं दी गई है, जितनी ट्रंप दावा कर रहे थे.
क्या होगा कोर्ट का रुख?
इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने IEEPA या ट्रेड एक्ट की धारा 122 का इस्तेमाल कर इतने व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाए हों. हालांकि, इन मुकदमों में ट्रंप द्वारा स्टील, एल्यूमिनियम और कॉपर जैसे उत्पादों पर लगाए गए पारंपरिक टैरिफ को चुनौती नहीं दी गई है, क्योंकि वे अलग कानूनी आधार पर लागू किए गए हैं. अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है. यह फैसला न केवल ट्रंप की आर्थिक नीतियों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि राष्ट्रपति के पास व्यापार नीति में कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए.
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