पिता की हर संपत्ति पर नहीं होता बेटे का अधिकार, केरल हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला, बताया कब नहीं बनती पैतृक संपत्ति
केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि हर पारिवारिक संपत्ति पैतृक नहीं होती. अगर संपत्ति पिता की स्वयं अर्जित है और 1956 के बाद बेटे को मिली है, तो उस पर बेटे के बच्चों को जन्म से अधिकार नहीं मिलेगा. अदालत ने बताया कि ऐसी संपत्ति बेटे की व्यक्तिगत संपत्ति मानी जाएगी.
परिवार में संपत्ति को लेकर अक्सर यह मान लिया जाता है कि पिता के पास जो भी जमीन या घर है, उस पर बेटे का जन्म से अधिकार होता है. लेकिन केरल हाई कोर्ट ने हाल के एक फैसले में साफ किया है कि हर पारिवारिक संपत्ति पैतृक नहीं होती. अगर संपत्ति पिता की स्वयं अर्जित (Self-acquired) है और वह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के बाद बेटे को मिली है, तो उस पर बेटे के बच्चों को जन्म से कोई कोपार्शनरी (Coparcenary) अधिकार नहीं मिलता. अदालत ने कहा कि ऐसी संपत्ति बेटे के पास उसकी व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में ही रहती है.
क्या था पूरा मामला
यह मामला एक जमीन के बंटवारे से जुड़ा था, जिसमें यह दावा किया गया कि विवादित संपत्ति पैतृक है और इसलिए बेटे को उस पर जन्म से हिस्सा मिलता है. जमीन का मूल मालिक एक व्यक्ति था जिसने 1925 में रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए यह जमीन खरीदी थी. यानी शुरुआती तौर पर यह जमीन उसकी स्वयं अर्जित संपत्ति थी.
उसकी मृत्यु के बाद परिवार में बंटवारा हुआ और जमीन का एक हिस्सा उसके बेटे को मिला. बाद में उस बेटे को अपनी बहन से रिलीज डीड के जरिए अतिरिक्त हिस्सा भी मिला, जिससे उसके पास कुल 46 सेंट (435 Sq ft.) जमीन आ गई. इसके बाद उस व्यक्ति ने पूरी जमीन अपनी पत्नी को गिफ्ट डीड के जरिए दे दी.
पति की मृत्यु के बाद पत्नी जमीन की मालिक बनी रहीं और बाद में उन्होंने वसीयत के जरिए संपत्ति कुछ अन्य वारिसों को देने का फैसला किया. इसी दौरान परिवार के एक सदस्य ने यह कहते हुए अदालत में बंटवारे का मुकदमा दायर किया कि यह पैतृक संपत्ति है और उसे जन्म से इसमें हिस्सा मिलना चाहिए.
निचली अदालतों ने क्या कहा
ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत दोनों ने माना कि परिवार मिताक्षरा कानून से संचालित है और संपत्ति को कोपार्शनरी मानते हुए वादी को हिस्सेदारी देने का आदेश दिया. इसके खिलाफ मामला केरल हाई कोर्ट पहुंचा.
हाई कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला
जस्टिस ईश्वरन एस. की एकल पीठ ने कहा कि किसी बेटे को जन्म से हिस्सा तभी मिल सकता है जब यह साबित हो कि संपत्ति वास्तव में पैतृक है. अदालत ने पाया कि इस मामले में जमीन मूल रूप से सेल डीड के जरिए खरीदी गई थी, यानी यह स्वयं अर्जित संपत्ति थी. इसलिए इसे पैतृक नहीं माना जा सकता.
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी हिंदू व्यक्ति को अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति को बेचने, दान देने या वसीयत करने का पूरा अधिकार होता है. ऐसी संपत्ति बेटे को मिलने के बाद भी अपने आप पैतृक नहीं बन जाती.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू परिवार में संयुक्त परिवार होने की एक सामान्य धारणा हो सकती है, लेकिन संपत्ति के संयुक्त होने की ऐसी कोई कानूनी धारणा नहीं होती.
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अदालत का अंतिम फैसला
हाई कोर्ट ने कहा कि जब पिता को खुद इस संपत्ति पर जन्मसिद्ध अधिकार नहीं था और उन्होंने इसे बंटवारे के जरिए हासिल किया था, तो यह उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति ही मानी जाएगी. इसलिए बेटे का उस पर जन्म से कोई अधिकार नहीं बनता.
इसी आधार पर अदालत ने निचली अदालतों के फैसले को गलत बताते हुए उसे रद्द कर दिया और बंटवारे का मुकदमा खारिज कर दिया.
