चेक बाउंस हुआ तो जाना पड़ेगा जेल या जुर्माने से चल जाएगा काम; जानें सेक्शन 138 के नियम

चेक बाउंस होना एक छोटी गलती नहीं बल्कि गंभीर कानूनी मामला बन सकता है. इसमें जेल, जुर्माना और खुद के प्रतिष्ठा को नुकसान तीनों का खतरा रहता है. ऐसे में चेक का इस्तेमाल हमेशा जिम्मेदारी से करें और किसी भी नोटिस को नजरअंदाज न करें. सही समय पर कार्रवाई ही आपको बड़े नुकसान से बचा सकती है.

चेक बाउंस Image Credit: @Tv9

Cheque Bounce Penalty: भारत में आज भी चेक एक भरोसेमंद पेमेंट माध्यम माना जाता है, लेकिन अगर यही चेक बाउंस हो जाए तो मामला सिर्फ पैसों के विवाद तक सीमित नहीं रहता. यह सीधे कानूनी कार्रवाई में बदल सकता है. कई मामलों में चेक बाउंस होने पर आपराधिक केस दर्ज होता है और जेल तक की नौबत आ सकती है. ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि कानून क्या कहता है और इससे कैसे बचा जा सकता है.

क्या है सेक्शन 138 का नियम?

सेक्शन 138, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 138 का अहम प्रावधान है, जो चेक बाउंस को एक आपराधिक अपराध मानता है. यह तब लागू होता है जब चेक इन कारणों से बाउंस हो,

  • खाते में पर्याप्त बैलेंस न होना.
  • चेक क्लियर होने से पहले खाता बंद कर देना.
  • बिना वैध कारण के पेमेंट रोक देना.
  • तकनीकी कारण या सिग्नेचर मिसमैच जैसी समस्याएं.

इसका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चेक देने वाला व्यक्ति पेमेंट की जिम्मेदारी निभाए और लेनदेन में भरोसा बना रहे.

कब लागू होता है सेक्शन 138?

अगर चेक बाउंस होता है, तो एक तय प्रक्रिया फॉलो होती है. अगर फिर भी पेमेंट नहीं होता, तो कोर्ट में केस दर्ज हो सकता है.

  • चेक 3 महीने के अंदर बैंक में लगाया जाना चाहिए.
  • बैंक चेक को ‘रिटर्न मेमो’ के साथ वापस करता है.
  • जिसे पैसा मिलना था, वह 30 दिनों के अंदर लीगल नोटिस भेजता है.
  • चेक देने वाले को 15 दिनों के अंदर पेमेंट करना होता है.

सजा क्या हो सकती है?

सेक्शन 138 के तहत,

  • 2 साल तक की जेल हो सकती है.
  • चेक की राशि का दोगुना तक जुर्माना लग सकता है.
  • या दोनों सजा एक साथ भी हो सकती है.

खुद को कैसे बचाएं?

चेक बाउंस के मामलों से बचने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां अपनानी चाहिए,

  • खाते में पर्याप्त बैलेंस होने पर ही चेक जारी करें.
  • बैंक अकाउंट और चेक क्लियरेंस पर नजर रखें.
  • खाली या पोस्ट-डेटेड चेक बिना सोच-समझ के न दें.
  • लीगल नोटिस मिलने पर तुरंत जवाब दें.
  • जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लें.

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