मानसून की सुस्त चाल से खेती पर संकट! खरीफ बुवाई 22.7% घटी, तिलहन और धान की बुवाई सबसे ज्यादा प्रभावित
ऐसे में अगर जुलाई में भी मानसून कमजोर रहता है तो खरीफ फसलों के उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर ग्रामीण इनकम, खाद्य महंगाई और खासतौर पर दलहन व खाद्य तेलों की उपलब्धता पर पड़ सकता है. वहीं जलाशयों में कम पानी होने से धान, कपास और दलहन जैसी फसलों के लिए सिंचाई का विकल्प भी सीमित हो जाएगा.
Kharif Sowing: मानसून की धीमी रफ्तार अब देश की खेती पर असर दिखाने लगी है. कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश, मानसून की असमान प्रगति और जलाशयों में घटते जलस्तर की वजह से खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले काफी पीछे चल रही है. 25 जून तक खरीफ फसलों की बुवाई 22.7 फीसदी कम रही है. ऐसे में अगर जुलाई में भी बारिश की रफ्तार नहीं बढ़ी तो इसका असर फसल उत्पादन, ग्रामीण इनकम और खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है.
25 जून तक खरीफ बुवाई 22.7% घटी
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 25 जून तक खरीफ फसलों की बुवाई 182.72 लाख हेक्टेयर में हुई है. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 236.46 लाख हेक्टेयर था. यानी इस बार कुल बुवाई क्षेत्र में 53.74 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है. तिलहन, कपास, धान और दलहन समेत लगभग सभी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में कम रही है.
तिलहन की बुवाई में सबसे बड़ी गिरावट
इस बार सबसे ज्यादा असर तिलहन की बुवाई पर देखने को मिला है. तिलहन का रकबा 36.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गया है, यानी इसमें 19.42 लाख हेक्टेयर की कमी आई है. तिलहन फसलों में सोयाबीन की बुवाई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है, जिसमें 13.05 लाख हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई है. इसके बाद मूंगफली की बुवाई 6.42 लाख हेक्टेयर कम रही. भारत पहले से ही क्रूड सोयाबीन ऑयल के आयात पर निर्भर है और मई तक देश के क्रूड सोयाबीन ऑयल आयात में चीन की हिस्सेदारी 8.1 फीसदी रही है.
धान, कपास और दलहन भी पीछे
कपास की बुवाई 15.70 लाख हेक्टेयर घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गई है. वहीं धान की बुवाई में 8.65 लाख हेक्टेयर की कमी आई है और इसका कुल रकबा 25.75 लाख हेक्टेयर रहा. दलहन की बुवाई भी 6.53 लाख हेक्टेयर कम हुई है, जिसमें अरहर और उड़द सबसे ज्यादा प्रभावित फसलें हैं.
बारिश की कमी बनी बड़ी वजह
देशभर में बारिश का वितरण अब भी असमान बना हुआ है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा और विदर्भ में अगले कुछ दिनों के दौरान भारी बारिश का अनुमान जताया है. वहीं बिहार, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में हीटवेव जैसी स्थिति बनी हुई है, जिससे बुवाई की रफ्तार प्रभावित हो रही है.
29 जून तक देश में बारिश की कमी 43 फीसदी तक पहुंच गई थी. वहीं देश के 48 फीसदी हिस्से में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि 26 फीसदी क्षेत्र बड़े वर्षा घाटे की स्थिति में है.
जलाशयों में भी घटा पानी
देश के 166 प्रमुख जलाशयों का जलस्तर भी चिंता बढ़ा रहा है. फिलहाल जलाशय अपनी कुल क्षमता के 26.4 फीसदी तक भरे हैं, जबकि पिछले साल इसी समय यह स्तर 36 फीसदी था. हालांकि यह आंकड़ा पांच साल के औसत से 5 फीसदी अधिक है.
दक्षिण भारत के जलाशय केवल 20.8 फीसदी भरे हैं, जबकि पिछले साल इसी समय यह स्तर 44.7 फीसदी था. कर्नाटक के जलाशयों का स्तर 48.6 फीसदी से घटकर 14.7 फीसदी रह गया है. तमिलनाडु में यह 81 फीसदी से घटकर 34.3 फीसदी पर आ गया है. वहीं ओडिशा के जलाशय केवल 15.3 फीसदी भरे हैं, जबकि पिछले साल यह स्तर 22.4 फीसदी था.
आगे क्यों बढ़ सकती है चिंता?
ऐसे में अगर जुलाई में भी मानसून कमजोर रहता है तो खरीफ फसलों के उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर ग्रामीण इनकम, खाद्य महंगाई और खासतौर पर दलहन व खाद्य तेलों की उपलब्धता पर पड़ सकता है. वहीं जलाशयों में कम पानी होने से धान, कपास और दलहन जैसी फसलों के लिए सिंचाई का विकल्प भी सीमित हो जाएगा, जिससे खेती समय पर होने वाली बारिश पर और ज्यादा निर्भर हो जाएगी.
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