₹25 के Parle बिस्किट पैकेट ने दिलाए ₹50000, 150 ग्राम की जगह निकले 125 ग्राम; जानें पूरा मामला

केरल के कन्नूर में 25 रुपये का Parle 20-20 Butter Cookies का पैकेट एक ग्राहक के लिए बड़ी कानूनी जीत लेकर आया. 150 ग्राम की जगह पैकेट में सिर्फ 125 ग्राम बिस्किट मिलने पर जिला उपभोक्ता आयोग ने Parle Biscuits और रिटेलर को कुल 50000 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. आयोग ने इसे उपभोक्ता अधिकारों का गंभीर मामला माना है.

पार्ले बिस्कुट

Parle Biscuit News: सिर्फ 25 रुपये का एक बिस्किट पैकेट भी कंज्यूमर के अधिकारों की रक्षा के लिए कितना बड़ा मामला बन सकता है, इसका उदाहरण केरल के कन्नूर से सामने आया है. यहां 150 ग्राम वजन का दावा करने वाले Parle 20-20 Butter Cookies के पैकेट में सिर्फ 125 ग्राम बिस्किट निकले. शिकायत सही पाए जाने पर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ((District Consumer Disputes Redressal Commission) ने Parle Biscuits और प्रोडक्ट बेचने वाले रिटेलर को मिलकर ग्राहक को कुल 50000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

दरअसल यह मामला 26 जुलाई 2024 का है. कन्नूर जिले के अंजाराकांडी के कल्लायी निवासी Asique T.P. ने चक्करक्कल स्थित मेट्रो हाइपर मार्केट से 25 रुपये में Parle 20-20 Butter Cookies का एक पैकेट खरीदा. पैकेट पर नेट वजन 150 ग्राम लिखा था.

घर पहुंचने पर उन्हें पैकेट सामान्य से हल्का लगा. इसके बाद उन्होंने पास की एक दुकान पर पैकेट का वजन कराया. वजन कम मिलने पर उन्होंने मामला उपभोक्ता आयोग में पहुंचा दिया.

जांच में क्या सामने आया?

जिला उपभोक्ता आयोग ने बिस्किट के पैकेट को जांच के लिए कन्नूर के लीगल मेट्रोलॉजी विभाग भेजा. विभाग की रिपोर्ट में पैकेट का कुल वजन 126.16 ग्राम दर्ज किया गया.

जबकि पैकेट पर 150 ग्राम नेट वजन लिखा था. यानी घोषित वजन की तुलना में करीब 25 ग्राम की कमी पाई गई. आयोग ने माना कि यह अंतर मामूली नहीं है और भारत के Legal Metrology (Packaged Commodities) Rules का स्पष्ट उल्लंघन है. इन नियमों के तहत पैकेज्ड प्रोडक्ट का वास्तविक नेट वजन वही होना चाहिए जो उसके पैकेट पर लिखा गया हो.

Parle ने क्या दलील दी?

Parle Biscuits ने आयोग के सामने कहा कि उसकी पूरी निर्माण प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटेड है. बिस्किट बनाने से लेकर पैकिंग तक सभी काम मशीनों से होता है और कम वजन वाले पैकेट प्रोडक्ट लाइन में ही अलग कर दिए जाते हैं. कंपनी ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने पहले सीधे कंपनी से संपर्क नहीं किया. बाद में संशोधित जवाब में Parle ने यह भी तर्क दिया कि संबंधित पैकेट असली नहीं हो सकता. कंपनी के मुताबिक पैकेट पर छपी तारीख, बैच कोड और एक्सपायरी का फॉर्मेट उसके मानक पैकेजिंग से मेल नहीं खाता.

आयोग ने Parle की दलील क्यों खारिज की?

आयोग ने Parle की दलीलों को स्वीकार नहीं किया. Metro Hyper Market ने अपने जवाब में साफ कहा था कि संबंधित प्रोडक्ट Parle का ही था.

आयोग ने कहा कि यदि कंपनी को वास्तव में लगता कि यह नकली प्रोडक्ट था और रिटेलर गलत तरीके से इसे Parle का बता रहा था, तो उसे रिटेलर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, इसलिए आयोग ने माना कि प्रोडक्ट Parle का ही था.

रिटेलर भी जिम्मेदारी से नहीं बच सका

Metro Hyper Market ने कहा कि वह केवल प्रोडक्ट बेचने वाला रिटेलर है और अगर निर्माण में कोई कमी है तो इसकी जिम्मेदारी निर्माता की है.

आयोग ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया. आयोग ने कहा कि कोई भी विक्रेता केवल यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसने प्रोडक्ट बनाया नहीं है. विक्रेता की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने यहां बिकने वाले प्रोडक्ट की जांच करे. कम वजन वाला प्रोडक्ट बेचना निर्माता के साथ-साथ विक्रेता की भी अनुचित व्यापारिक गतिविधि माना जाएगा.

आयोग ने क्या आदेश दिया?

21 जुलाई 2026 को पारित आदेश में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दोनों पक्षों को मुआवजा देने का निर्देश दिया. आयोग ने Parle Biscuits को 25000 रुपये मुआवजा और 10000 रुपये मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया. वहीं Metro Hyper Market को 10000 रुपये मुआवजा और 5000 रुपये मुकदमे का खर्च देने के लिए कहा गया. इस तरह शिकायतकर्ता को कुल 50000 रुपये मिलेंगे.

आयोग ने यह भी कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के एक महीने के भीतर पेमेंट नहीं करने पर 35000 रुपये के मुआवजे पर आदेश की तारीख से पेमेंट होने तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा. इसके अलावा आयोग ने Parle Biscuits को कम वजन वाले प्रोडक्ट बेचने की प्रथा रोकने, पैकेट पर लिखे गए वजन के अनुरूप प्रोडक्ट उपलब्ध कराने और मैन्यूफेक्चरिंग लेवल पर जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने का भी निर्देश दिया.

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