4 महीने के निचले स्तर पर पहुंची कच्चे तेल की कीमत, US-Iran युद्ध के बाद पहली बार 75 डॉलर के नीचे फिसला ब्रेंट क्रूड
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा शांति वार्ता में प्रगति की खबरों के बीच ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर प्रति बैरल के नीचे फिसल गया है. US-Iran संघर्ष शुरू होने के बाद यह कच्चे तेल का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है. होर्मुज स्ट्रेट में गतिविधियां सामान्य होने और सप्लाई को लेकर चिंताएं कम होने से तेल बाजार पर दबाव बढ़ा है.
Brent Crude Oil Price: पश्चिमी एशिया में तनाव कम होने के संकेतों के बीच वैश्विक कच्चे तेल बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली है. अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव में नरमी आने तथा शांति वार्ता में प्रगति की खबरों के बाद कच्चे तेल की कीमतें लगातार दबाव में हैं. बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतें US-Iran संघर्ष शुरू होने के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं. इससे एनर्जी आयात पर निर्भर देशों, खासकर भारत के लिए राहत की उम्मीद बढ़ गई है.
75 डॉलर के नीचे फिसला ब्रेंट क्रूड
बुधवार को ब्रेंट क्रूड 74.54 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया. यह स्तर US-Iran संघर्ष शुरू होने के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है. इससे पहले मार्च 2026 में ब्रेंट क्रूड 75.75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा था. वहीं अमेरिकी बेंचमार्क WTI भी 71 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा. दिलचस्प बात यह है कि पिछले कारोबारी सत्र में भी दोनों बेंचमार्क करीब 1 फीसदी टूटे थे. लगातार गिरावट के चलते कच्चे तेल की कीमतें अब चार महीने के निचले स्तर के करीब पहुंच गई हैं.
क्यों आई कच्चे तेल में गिरावट
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीद है. हाल ही में दोनों देशों के बीच शुरुआती शांति वार्ता हुई, जिसके बाद अमेरिका ने ईरान को 60 दिनों की प्रतिबंध छूट देने का फैसला किया. इस कदम को निवेशकों ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया है. इससे बाजार में यह धारणा बनी है कि क्षेत्र में बड़े सैन्य संघर्ष का खतरा फिलहाल कम हो सकता है. यही वजह है कि तेल की कीमतों में पहले से मौजूद रिस्क प्रीमियम तेजी से कम हुआ है.
होर्मुज स्ट्रेट पर सामान्य हो रही गतिविधियां
तेल बाजार को एक और राहत तब मिली जब ओमान और ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में नेविगेशन व्यवस्था को लेकर बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है. वैश्विक तेल और एलएनजी ट्रेड का करीब 20 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है.
US-Iran तनाव के दौरान इस समुद्री मार्ग पर आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिससे तेल सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं. लेकिन अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होते दिखाई दे रहे हैं. कई ऑयल टैंकर फिर से इस मार्ग से नियमित रूप से गुजरने लगे हैं, जिससे सप्लाई बाधित होने की आशंका कम हुई है.
संकट के दौरान 1.4 करोड़ बैरल उत्पादन प्रभावित
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, संकट के चरम पर प्रतिदिन 1.4 करोड़ बैरल से अधिक तेल उत्पादन प्रभावित हुआ था. यह वैश्विक तेल मांग का लगभग 14 फीसदी हिस्सा है. उत्पादन में इस बड़ी बाधा ने बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी थी, जिसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था. हालांकि अब सप्लाई चेन सामान्य होने और जियोपॉलिटिकल जोखिम कम होने से बाजार में राहत लौटती दिख रही है.
भारत को कैसे मिलेगा फायदा
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का अधिकांश तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक मानी जाती है. तेल सस्ता होने से देश का आयात बिल कम हो सकता है. इसके अलावा चालू खाते के घाटे पर दबाव घट सकता है और महंगाई को नियंत्रित रखने में भी मदद मिल सकती है. यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नरम रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी राहत मिलने की संभावना बन सकती है.
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