ऑल टाइम हाई पर कॉपर की कीमतें, टैरिफ उथल-पुथल और खदानों में आ रहीं दिक्कतों से सप्लाई प्रभावित
इस साल कॉपर की कीमत में 17 फीसदी और पिछले 12 महीनों में 47 फीसदी की बढ़त की मुख्य वजह सप्लाई और डिमांड के बीच लंबे समय से चला आ रहा असंतुलन है. दुनिया भर में कुल स्टॉक काफी अधिक है, लेकिन अब यह ज्यादातर अमेरिका में जमा हो गया है.
Highlights
- इस साल कॉपर की कीमत में 17 फीसदी का उछाल.
- ऊंची कीमतें भी खपत के लिए खतरा बन सकती हैं.
- टैरिफ ट्रेड का ग्लोबल इन्वेंट्री पर बुरा असर पड़ा है.
लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर की कीमत अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई. यह तेजी कई हफ्तों से चल रही थी और इसकी वजह यह उम्मीद थी कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रिफाइंड मेटल के इंपोर्ट पर भी US टैरिफ बढ़ा देंगे. LME पर बेंचमार्क तीन महीने के फ्यूचर्स में 0.8% तक की बढ़त हुई और कीमत 14,533 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई. इसने जनवरी में बने पिछले रिकॉर्ड को तोड़ दिया, हालांकि बाद में इसमें थोड़ी गिरावट भी आई.
कीमतों में 47 फीसदी का उछाल
इस साल कॉपर की कीमत में 17 फीसदी और पिछले 12 महीनों में 47 फीसदी की बढ़त की मुख्य वजह सप्लाई और डिमांड के बीच लंबे समय से चला आ रहा असंतुलन है. दुनिया भर में बड़ी खदानें पुरानी हो रही हैं और डेटा सेंटर्स, रिन्यूएबल एनर्जी और पावर ग्रिड्स में कॉपर की बढ़ती खपत के साथ तालमेल बिठाने में उन्हें मुश्किल हो रही है. कॉपर में तेजी की उम्मीद करने वाले (बुल्स) कई साल से इसी बात पर जोर देते रहे हैं.
शॉर्ट टर्म फैक्टर
लेकिन शॉर्ट टर्म वाले कारण सामने आए हैं. खासकर वे लाखों टन कॉपर जो ट्रेडर्स ने मुनाफा कमाने के लिए इस साल अमेरिका भेजा है. मार्केट अभी भी प्राइमरी कॉपर इम्पोर्ट पर टैरिफ लगने की संभावना को ध्यान में रखकर कीमतें तय कर रहा है, जबकि डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स को व्हाइट हाउस को यह सलाह देने वाली रिपोर्ट जारी किए हुए लगभग दो महीने हो चुके हैं कि क्या ये लेवी जरूरी हैं या नहीं.
सप्लाई पर पड़ा असर
हालांकि, दुनिया भर में कुल स्टॉक काफी अधिक है, लेकिन अब यह ज्यादातर अमेरिका में जमा हो गया है, क्योंकि LME के बड़े ग्लोबल नेटवर्क में मेटल की मात्रा कम हो गई है. इससे कम समय के लिए सप्लाई पर असर पड़ा है, शॉर्ट पोजीशन रखने वालों पर दबाव बढ़ा है और मांग कमजोर होने के बावजूद कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं.
ट्रेडिंग सुस्त, लेकिन कीमतों में बढ़त
सोमवार को लंदन में बढ़त तब भी देखने को मिली जब ट्रेडिंग की स्थिति सुस्त थी. लेबर डे की छुट्टी के कारण अमेरिकी एक्सचेंज बंद थे, जिससे फाइनेंशियल मार्केट में रिस्क लेने की इच्छा कम हो गई थी.
ईरान में युद्ध से लेकर अमेरिका में कर्ज लेने की लागत बढ़ने तक, कई मैक्रो-इकोनॉमिक और जियो-पॉलिटिकल चुनौतियों के बावजूद यह रैली जारी है. कर्ज की लागत बढ़ने से दुनिया भर में बड़े पैमाने पर पूंजी लगाने वाले मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस पर दबाव पड़ेगा.
ऊंची कीमतें भी खपत के लिए खतरा बन सकती हैं क्योंकि खरीदार विकल्प तलाशते हैं, लेकिन अब तक मांग से जुड़े ऐसे दबावों ने कॉपर की कीमतों में बढ़ोतरी को बहुत कम ही धीमा किया है.
अमेरिका में रिकॉर्ड-तोड़ इंपोर्ट
अमेरिका में रिकॉर्ड-तोड़ इंपोर्ट की वजह न्यूयॉर्क के Comex पर ट्रेड होने वाले कॉपर फ्यूचर्स के लिए लगातार बना हुआ प्रीमियम है. पिछले साल फरवरी में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा कॉपर पर लेवी (टैरिफ) लगाने का प्रस्ताव पहली बार औपचारिक रूप से रखने के बाद से ट्रेडर्स के लिए आर्बिट्राज का एक बड़ा मौका बन गया है.
ग्लोबल इन्वेंट्री पर बुरा असर
टैरिफ ट्रेड का ग्लोबल इन्वेंट्री पर बुरा असर पड़ा है. पिछले महीने LME पर भारी कमी (Squeeze) देखी गई, क्योंकि कॉपर कॉन्ट्रैक्ट्स में ट्रेडिंग का आधार बनने वाले स्टॉक बहुत कम स्तर पर आ गए थे.
हालांकि, नई डिलीवरी से कुछ राहत मिली है, लेकिन LME पर स्पॉट कीमतें तीन महीने के फ्यूचर्स की तुलना में काफी ऊंचे प्रीमियम पर ट्रेड कर रही हैं. इस स्थिति को ‘बैकवर्डेशन’ कहा जाता है, जो यह संकेत देता है कि मांग सप्लाई से अधिक है.
माइनिंग कंपनियों के लिए फायदेमंद
कॉपर की ऊंची कीमतें दुनिया की सबसे बड़ी माइनिंग कंपनियों के लिए बहुत फायदेमंद रही हैं. ये कंपनियां लंबे समय से ऐसी धातु में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की इच्छा जताती रही हैं जिसकी मांग में लंबे समय तक तेजी आने की उम्मीद है. Rio Tinto Group, BHP Group, Glencore Plc और Zijin Mining Group Co. सभी ने अपनी हालिया अर्निंग्स रिपोर्ट में मुनाफे में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की है, जिसमें उनकी कॉपर यूनिट्स के प्रदर्शन का बड़ा योगदान रहा है.
ऑपरेशनल चुनौतियां
फिर भी, इस साल कई बड़ी माइनिंग कंपनियों को ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. सोमवार को जारी आंकड़ों से पता चला कि अगस्त में टॉप प्रोड्यूसर चिली से कॉपर एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई एक साल से भी अधिक समय के निचले स्तर पर आ गई. अगर इंडस्ट्री साल की दूसरी छमाही में रिकवरी नहीं करती है, तो ग्लोबल माइनिंग सप्लाई में 2017 के बाद पहली बार सालाना गिरावट दर्ज की जाएगी.
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