भारत को मिलने वाले रेमिटेंस पर नहीं पड़ेगा ईरान- US युद्ध का असर, 140 बिलियन डॉलर तक पहुंचेगा आंकड़ा, रिपोर्ट में दावा

भारत में रेमिटेंस का फ्लो मजबूत बना हुआ है और वित्त वर्ष 2026 में यह 137 से 140 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. SBI रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद पैसा भेजने में तेजी आई है. मार्च में इस क्षेत्र से 30 से 35 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है.

मार्च में इस क्षेत्र से 30 से 35 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है. Image Credit: GETTY

Remittances India: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है. विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजा जाने वाला पैसा यानी रेमिटेंस मजबूत बना हुआ है. SBI रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में इसमें और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में यह नया रिकॉर्ड बना सकता है. भारत पिछले कई सालों से दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस पाने वाला देश बना हुआ है. बढ़ती अनिश्चितता के बावजूद यह ट्रेंड आगे भी जारी रहने की उम्मीद है.

140 बिलियन डॉलर तक पहुंचेगा आंकड़ा

SBI रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में रेमिटेंस 137 से 140 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. इसके बाद अगले वित्त वर्ष में यह थोड़ा घटकर 135 से 137 बिलियन डॉलर रह सकता है. वित्त वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 135.4 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 14 फीसदी की बढ़ोतरी को दिखाता है. वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल से दिसंबर के बीच ही 110 बिलियन डॉलर का फ्लो आ चुका है, जो पिछले साल की समान अवधि से ज्यादा है.

तनाव के बावजूद बढ़ा पैसा

पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद मार्च महीने में रेमिटेंस में तेजी देखी गई है. रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र से पैसा भेजने में 30 से 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इसकी वजह यह है कि विदेशों में काम कर रहे लोग अनिश्चितता के बीच पहले ही पैसा भेज रहे हैं, जिसे जोखिम से बचने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. इस तरह के ट्रांसफर आमतौर पर संकट के समय में बढ़ जाते हैं, जिससे कुल रेमिटेंस पर फिलहाल कोई बड़ा असर नहीं दिख रहा है.

गल्फ देशों की बड़ी भूमिका

भारत की बड़ी ताकत उसका विशाल प्रवासी समुदाय है. दुनिया भर में करीब 35 मिलियन भारतीय रहते हैं, जिनमें से 9 से 10 मिलियन लोग गल्फ देशों में काम करते हैं. सऊदी अरब यूएई कतर कुवैत बहरीन और ओमान जैसे देश इसमें शामिल हैं. इन देशों में भारतीय कामगार कंस्ट्रक्शन सर्विस और एनर्जी सेक्टर में काम करते हैं, जिसकी वजह से यह क्षेत्र भारत के लिए सबसे बड़ा रेमिटेंस स्रोत बना हुआ है.

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लंबे समय में रिस्क

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर पड़ सकता है. कंस्ट्रक्शन और तेल से जुड़े सेक्टर में नौकरी पर खतरा बढ़ सकता है और अगर बड़े स्तर पर लोगों की वापसी होती है तो रेमिटेंस अस्थायी रूप से घट सकता है. हालांकि कोरोना काल का उदाहरण बताता है कि बाद में यह तेजी से रिकवर भी करता है. इसलिए लंबे समय में रेमिटेंस पर असर सीमित रहने की उम्मीद है और भारत में इसका ट्रेंड मजबूत बना रह सकता है.

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