महंगी हो जाएगी जरूरी दवाइयां, कीमत में 10-15% की बढ़ोतरी की तैयारी, ईरान युद्ध से कच्चे माल के दाम में इजाफा
पश्चिम एशिया के तनाव का असर अब दवाओं की कीमतों पर दिख सकता है. कच्चे माल की लागत बढ़ने के चलते सरकार जरूरी दवाओं में 10-15 फीसदी तक अस्थायी बढ़ोतरी पर विचार कर रही है, ताकि सप्लाई बनी रहे.

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की आग अब आपकी दवाइयों की डिब्बी तक पहुंच सकती है. दवा कंपनियों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को देखते हुए केंद्र सरकार जरूरी दवाओं की कीमतों में 10 से 15 फीसदी की अस्थाई बढ़ोतरी करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है. अगर यह फैसला लागू होता है, तो आम आदमी की जेब पर इसका सीधा असर 3 से 5 फीसदी तक पड़ेगा. यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है ताकि देश में जीवन रक्षक दवाओं की किल्लत न हो.
कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल
युद्ध की वजह से ग्लोबल सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वैंट्स और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की कीमतों में बेतहाशा इजाफा हुआ है. ET की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्योग जगत के दिग्गजों ने सरकार को बताया है कि कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल से जुड़े रसायनों जैसे अमोनिया, नेफ्था और आइसोप्रोपिल अल्कोहल के दाम महज कुछ हफ्तों में 30 से 100 फीसदी तक बढ़ गए हैं.
सप्लाई जारी रखने के लिए जरूरी कदम
फार्मास्युटिकल्स विभाग के अधिकारी इस प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख अपना रहे हैं. रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सरकार ‘कोविड-19’ महामारी के दौरान अपनाई गई रणनीति की तरह ही इस बार भी अस्थाई तौर पर कीमतों में ढील दे सकती है. अधिकारियों का मानना है कि दवाओं की कमी होने से बेहतर है कि कीमतों में थोड़ा बदलाव कर आपूर्ति सुनिश्चित की जाए.
यह भी पढ़ें: चुनाव के बाद बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम, तेल कंपनियों को प्रति लीटर 18 से 35 रुपये तक का घाटा
केवल 3-4 महीने के लिए बढ़ेंगे दाम
राहत की बात यह है कि यह इजाफा स्थाई नहीं होगा. उद्योग जगत ने केवल 3-4 महीनों के लिए राहत मांगी है. जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतें स्थिर होंगी, दवाओं के दाम वापस पुराने स्तर पर लाने का विकल्प रखा गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बढ़ोतरी के बाद दवाओं के दाम लगभग उसी स्तर पर पहुंच जाएंगे, जो सितंबर के अंत में जीएसटी (GST) दरों में कटौती से पहले थे. वर्तमान में लागत बढ़ने के कारण कई छोटी दवा कंपनियां और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स बंद होने की कगार पर हैं. सचिवों का एक अधिकार प्राप्त समूह इस समय पूरी स्थिति का विश्लेषण कर रहा है ताकि मरीजों और इंडस्ट्री दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके.