NABARD का बड़ा फैसला, 8,000 करोड़ रुपये का बॉन्ड इश्यू किया रद्द; जानें क्या है वजह

निवेशकों की ओर से ऊंची यील्ड की मांग के बाद NABARD ने 8,000 करोड़ रुपये का बॉन्ड इश्यू रद्द कर दिया. यह पिछले एक महीने के सबसे बड़े प्रस्तावित बॉन्ड इश्यू में शामिल था. बढ़ती गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड, वैश्विक तनाव और RBI की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता के चलते निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है. इसी वजह से कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट में फंड जुटाने की रफ्तार धीमी पड़ गई है.

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NABARD Bond Issue: सरकारी वित्तीय संस्था NABARD ने निवेशकों की ओर से ऊंची यील्ड की मांग किए जाने के बाद अपने 8,000 करोड़ रुपये के बॉन्ड इश्यू को रद्द कर दिया है. यह पिछले एक महीने में प्रस्तावित सबसे बड़े बॉन्ड इश्यू में से एक था. इस घटनाक्रम ने साफ संकेत दिया है कि फिलहाल प्राइमरी बॉन्ड मार्केट में निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है और वे बढ़ते जोखिमों के बीच अधिक रिटर्न की मांग कर रहे हैं. मार्केट सूत्रों के मुताबिक, NABARD पांच साल की अवधि के लिए करीब 7.40 फीसदी से 7.45 फीसदी की यील्ड पर फंड जुटाना चाहता था. हालांकि, निवेशकों ने 7.60 फीसदी से अधिक यील्ड की मांग की.

निवेशकों की सतर्कता बनी बड़ी वजह

विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा समय में वैश्विक तनाव और भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता के कारण निवेशक अधिक सतर्क हो गए हैं. हालांकि, बाजार को उम्मीद है कि RBI ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा, लेकिन केंद्रीय बैंक का रुख अपेक्षाकृत सख्त रह सकता है. इसी आशंका के चलते निवेशक लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेश के बदले अधिक यील्ड की मांग कर रहे हैं.

कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट में जारी है सुस्ती

BSE के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में कंपनियों ने केवल 97,053 करोड़ रुपये के कॉरपोरेट बॉन्ड जारी किए हैं. यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग आधा है. पिछले वर्ष इसी अवधि में कॉरपोरेट बॉन्ड इश्यू 1.82 लाख करोड़ रुपये रही थी. इससे साफ है कि ऊंची उधारी लागत और निवेशकों की सतर्कता के कारण कंपनियां बॉन्ड मार्केट से पैसा जुटाने से बच रही हैं.

गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड बढ़ने से महंगा हुआ कर्ज

विशेषज्ञों का कहना है कि गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी भी कंपनियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. 10-ईयर गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड, जिसे कॉरपोरेट बॉन्ड प्राइसिंग का बेंचमार्क माना जाता है, मंगलवार को बढ़कर 6.81 फीसदी पर बंद हुई. वर्ष की शुरुआत में यह करीब 6.60 फीसदी थी.

जब सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तो कंपनियों को भी निवेशकों को अधिक रिटर्न देना पड़ता है. इसका सीधा असर उनकी उधारी लागत पर पड़ता है. यही वजह है कि कई कंपनियां फिलहाल बॉन्ड मार्केट की बजाय बैंकों से कर्ज लेने या फंड जुटाने के अन्य विकल्पों पर विचार कर रही हैं.

बैंक और बॉन्ड मार्केट की लागत में घटा अंतर

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में फिक्स्ड रेट कॉरपोरेट बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने की लागत लगभग बैंक लोन के बराबर पहुंच गई है. State Bank of India की एक वर्ष की MCLR फिलहाल 8.70 फीसदी है. ऐसे में कंपनियों को बॉन्ड के जरिए सस्ता कर्ज मिलने का लाभ पहले जैसा नहीं मिल रहा.

कुल मिलाकर, NABARD का 8,000 करोड़ रुपये का बॉन्ड इश्यू रद्द होना इस बात का संकेत है कि फिलहाल डेट मार्केट में निवेशकों का भरोसा पूरी तरह मजबूत नहीं है. जब तक गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड में नरमी नहीं आती और मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर स्पष्टता नहीं बनती, तब तक कंपनियों के लिए बॉन्ड मार्केट से सस्ती दर पर फंड जुटाना चुनौतीपूर्ण बना रह सकता है.

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