₹2,500 की SIP से ₹1 करोड़ तक का सफर! 3 टेक प्रोफेशनल्स से सीखें दौलत बनाने के 10 सबक
छोटी SIP, बढ़ती सैलरी और नियमित निवेश से करोड़ों की संपत्ति बनाई जा सकती है. पुणे के तीन टेक प्रोफेशनल्स ने दिखाया कि दौलत बनाने के लिए सबसे अच्छे म्यूचुअल फंड या परफेक्ट प्लान की जरूरत नहीं है. खर्च पर कंट्रोल, समय के साथ निवेश बढ़ाना, जोखिम समझना और सही वित्तीय फैसले लेना भी जरूरी है.
Highlights
- मयूरेश जाधव ने 2,500 रुपये की मंथली SIP से निवेश शुरू किया और करीब 1.03 करोड़ रुपये की वित्तीय संपत्ति बनाई.
- सुधीर दंडोतिया के पास करीब 9 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जबकि शुभ पाटिल ने करीब 4 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो बनाया है.
- तीनों की कहानियों से सीख मिलती है कि नियमित निवेश, बढ़ती आमदनी के साथ बचत बढ़ाना, जोखिम समझना और खर्चों पर नियंत्रण रखना दौलत बनाने में मदद कर सकता है.
करोड़ों रुपये का निवेश पोर्टफोलियो बनाने के लिए जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति सबसे अच्छा म्यूचुअल फंड चुने या शुरुआत से ही बड़ी रकम निवेश करे. नियमित निवेश, बढ़ती कमाई, खर्चों पर कंट्रोल और लंबे समय तक निवेश में बने रहना भी बड़ी दौलत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं. पुणे के तीन टेक प्रोफेशनल्स की कहानी बताती है कि अलग-अलग आमदनी और आर्थिक जिम्मेदारियों के बावजूद सही वित्तीय फैसलों से बड़ा निवेश पोर्टफोलियो बनाया जा सकता है.
Financial Express की रिपोर्ट के मुताबिक, इन तीन लोगों में मयूरेश जाधव, सुधीर दंडोतिया और शुभ पाटिल शामिल हैं. 35 साल के मयूरेश ने 2,500 रुपये की मंथली SIP से निवेश शुरू किया और अब उनके पास करीब 1.03 करोड़ रुपये की वित्तीय संपत्ति है. 32 साल के सुधीर ने करीब 9 करोड़ रुपये की संपत्ति जुटाई है, हालांकि देनदारियों को घटाने के बाद उनकी नेटवर्थ इससे कम है. वहीं, 35 साल के शुभ ने करीब 4 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो बनाया है और अब समय से पहले रिटायरमेंट लेने के बारे में सोच रहे हैं. इन तीनों की आमदनी, पारिवारिक जिम्मेदारियां और निवेश के तरीके अलग-अलग हैं. फिर भी उनकी कहानियों से नौकरीपेशा लोगों को पैसे बचाने और दौलत बनाने के 10 जरूरी सबक मिलते हैं.
1. छोटी SIP से भी कर सकते हैं शुरुआत
कई लोग यह सोचकर निवेश शुरू नहीं करते कि उनकी सैलरी कम है. उन्हें लगता है कि 2,000 या 3,000 रुपये महीने की SIP से बहुत ज्यादा पैसा नहीं बनेगा. लेकिन बड़ी सैलरी का इंतजार करने में निवेश शुरू करने का कीमती समय निकल सकता है. मयूरेश जाधव ने हर महीने 2,500 रुपये की SIP से निवेश शुरू किया था. आमदनी बढ़ने के साथ उन्होंने इसे बढ़ाकर करीब 70,000 रुपये महीने कर दिया. आज उनके पास करीब 1.03 करोड़ रुपये की वित्तीय संपत्ति है.
2. अच्छा फंड चुनने जितना ही जरूरी है सैलरी बढ़ाना
निवेशक अक्सर सबसे अच्छा म्यूचुअल फंड खोजने और उसके रिटर्न की तुलना करने में काफी समय लगाते हैं. लेकिन यह भी जरूरी है कि उनके पास निवेश करने के लिए कितनी रकम बच रही है. मयूरेश की करियर के दौरान सैलरी में अच्छी बढ़ोतरी हुई. सुधीर दंडोतिया की सालाना सैलरी 2017 में करीब 4.5 लाख रुपये थी, जो 2026 में बढ़कर 52 लाख रुपये हो गई. शुभ पाटिल का सालाना पैकेज भी 2013 में 3.9 लाख रुपये से बढ़कर करीब 40 लाख रुपये हो गया.
आमदनी बढ़ने से तीनों को बचत और निवेश के लिए ज्यादा पैसा मिला. हालांकि, सिर्फ ज्यादा सैलरी मिलने से कोई अमीर नहीं बनता. अगर बढ़ी हुई कमाई का पूरा पैसा खर्च हो जाए, तो निवेश के लिए कुछ नहीं बचेगा.
3. सैलरी बढ़ते ही खर्च भी न बढ़ाएं
सैलरी बढ़ने पर बेहतर घर, महंगी कार, छुट्टियां और शौक पूरे करने का मन करता है. इन चीजों पर खर्च करना गलत नहीं है, लेकिन हर बार सैलरी बढ़ने के साथ खर्च भी उतना ही बढ़ जाए, तो दौलत बनाने की रफ्तार धीमी पड़ सकती है.
तीनों की कहानियों में बढ़ती आमदनी के साथ बचत और निवेश बढ़ाने की अहमियत दिखाई देती है. मयूरेश ने अपनी SIP बढ़ाई. सुधीर ने म्यूचुअल फंड में नियमित निवेश के साथ होम लोन की जिम्मेदारी भी संभाली. वहीं, करीब 40 लाख रुपये सालाना कमाने वाले शुभ हर महीने लगभग 70,000 रुपये निवेश करते हैं और साथ में घूमने-फिरने और अपने शौक पर भी खर्च करते हैं. सीख यह है कि सैलरी बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा निवेश के लिए अलग रखना चाहिए. इससे समय के साथ बड़ा पोर्टफोलियो बनाने में मदद मिल सकती है.
4. करोड़पति बनने के लिए सबसे अच्छा म्यूचुअल फंड जरूरी नहीं
कई निवेशक लगातार सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले म्यूचुअल फंड की तलाश में रहते हैं. वे बेहतर रिटर्न की उम्मीद में बार-बार फंड बदलते हैं. लेकिन दौलत बनाने में नियमित निवेश और लंबे समय तक निवेश में बने रहना भी अहम है. करीब 9 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाने वाले सुधीर अपनी सफलता का श्रेय किसी एक शानदार म्यूचुअल फंड को नहीं देते. उनकी दौलत बनाने में नियमित निवेश और बढ़ती आमदनी की अहम भूमिका रही है.
शुभ का पोर्टफोलियो भी कई तरह के निवेश से बना है. इसमें म्यूचुअल फंड, भारतीय और अमेरिकी शेयर, कंपनी से मिले शेयर, रिटायरमेंट की बचत और दूसरी संपत्तियां शामिल हैं. उनकी पूरी वित्तीय स्थिति किसी एक निवेश पर निर्भर नहीं है.
इसका मतलब यह नहीं कि म्यूचुअल फंड चुनना जरूरी नहीं है. निवेश से पहले उसके जोखिम, फीस, दूसरे फंड के साथ उसके निवेश में समानता और अपने लक्ष्य को समझना जरूरी है.
5. पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ भी निवेश जारी रखें
हर व्यक्ति के लिए अपनी पूरी कमाई निवेश करना संभव नहीं होता. कई लोगों को माता-पिता की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल खर्च और परिवार की दूसरी जरूरतों पर भी पैसा खर्च करना पड़ता है. मयूरेश ने अपने माता-पिता की मदद की और बहन की शादी में भी योगदान दिया. इसके साथ उन्होंने लोन की किस्तें, घर का खर्च और निवेश भी संभाला.
उनकी कहानी बताती है कि सभी जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद ही निवेश शुरू करने का इंतजार करना सही रणनीति नहीं हो सकती. जरूरी खर्चों और जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए छोटी रकम से भी निवेश जारी रखा जा सकता है.
6. जिस वित्तीय प्रोडक्ट को न समझें, उसमें पैसा न लगाएं
मयूरेश के निवेश सफर में गलतियां भी हुईं. उन्होंने अपने एक परिचित की सलाह पर LIC की पॉलिसी खरीदी थी, लेकिन उस समय उन्हें इसकी शर्तों और फायदे की पूरी जानकारी नहीं थी. करीब 8 से 9 साल तक पॉलिसी रखने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि यह उनके लिए सही विकल्प नहीं थी. आखिरकार उन्होंने पॉलिसी से बाहर निकलने का फैसला किया और उन्हें अपनी ओर से लगाए गए पैसे का करीब 70 फीसदी ही वापस मिला.
इस अनुभव से उन्हें सीख मिली कि किसी भी वित्तीय प्रोडक्ट में पैसा लगाने से पहले उसे अच्छी तरह समझना जरूरी है. चाहे वह बीमा पॉलिसी हो, म्यूचुअल फंड, शेयर या प्रॉपर्टी, निवेश से पहले जोखिम, शुल्क, लॉक-इन अवधि और पैसा निकालने की शर्तों की जानकारी जरूर लें.
7. सिर्फ म्यूचुअल फंड नहीं, पूरी संपत्ति का हिसाब रखें
किसी व्यक्ति की कुल वित्तीय स्थिति सिर्फ उसके म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो से तय नहीं होती. इसमें शेयर, रिटायरमेंट फंड, सोना, चांदी, बैंक में जमा पैसा और दूसरी संपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं. मयूरेश के म्यूचुअल फंड निवेश के साथ EPF में भी अच्छी रकम जमा हुई है. वहीं, शुभ के पोर्टफोलियो में म्यूचुअल फंड, भारतीय और अमेरिकी शेयर, कंपनी से मिले शेयर, EPF, NPS, सोना, चांदी और नकदी शामिल हैं.
इसलिए सिर्फ SIP के रिटर्न पर नजर रखना काफी नहीं है. निवेशकों को अपनी सभी संपत्तियों के साथ लोन और दूसरी देनदारियों का भी हिसाब रखना चाहिए. इससे उनकी असली वित्तीय स्थिति का पता चलता है.
8. बड़ा पोर्टफोलियो होने पर भी जोखिम कम करना जरूरी
करोड़ों रुपये का पोर्टफोलियो बना लेने का मतलब यह नहीं है कि निवेश पूरी तरह सुरक्षित हो गया है. यह भी देखना जरूरी है कि पैसा किन जगहों पर लगा है. शुभ की संपत्ति में अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयरों की अच्छी हिस्सेदारी है. इनमें प्रतिबंधित शेयर यूनिट यानी RSU भी शामिल हैं, जो कंपनी अपने कर्मचारियों को देती है. वह खुद भी टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करते हैं.
ऐसी स्थिति में उनकी नौकरी और निवेश दोनों का एक ही सेक्टर से जुड़ा होना जोखिम बढ़ा सकता है. अगर टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयर लंबे समय तक गिरते हैं, तो उनके निवेश की कीमत घट सकती है. इसी समय सेक्टर में नौकरियों के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं. यह उन कर्मचारियों के लिए अहम सबक है, जिन्हें सैलरी के अलावा अपनी कंपनी के शेयर भी मिलते हैं. निवेश को अलग-अलग जगह बांटकर रखने से किसी एक सेक्टर पर निर्भरता कम की जा सकती है.
9. प्रॉपर्टी खरीदने से पहले उसका मकसद समझें
प्रॉपर्टी किसी व्यक्ति की वित्तीय योजना का अहम हिस्सा हो सकती है. लेकिन इसका फायदा सिर्फ इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि उसकी कीमत कितनी बढ़ी है. कुछ लोग रहने के लिए घर खरीदते हैं, ताकि भविष्य में किराये की चिंता न रहे. कुछ लोग किराये की कमाई के लिए प्रॉपर्टी लेते हैं. वहीं, कुछ के लिए प्रॉपर्टी परिवार की जरूरतों को पूरा करने का जरिया होती है.
मयूरेश के पुणे वाले फ्लैट की कीमत खरीद के समय के मुकाबले बढ़ी है, लेकिन उसकी कीमत में बढ़ोतरी उनके शेयर निवेश के मुकाबले सीमित रही. इस फ्लैट से मिलने वाला किराया उनके माता-पिता की मदद के लिए इस्तेमाल होता है. इसलिए प्रॉपर्टी की तुलना म्यूचुअल फंड से करते समय उसके मकसद, रखरखाव के खर्च, टैक्स, खरीद-बिक्री के खर्च और किराये से होने वाली कमाई को भी ध्यान में रखना चाहिए.
10. आर्थिक आजादी के लिए सिर्फ बड़ा फंड बनाना जरूरी नहीं
शुभ पाटिल ने 35 साल की उम्र में करीब 4 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो बनाया है. अब उनका लक्ष्य अगले पांच साल में 10 करोड़ रुपये का फंड तैयार करना है. इसके बाद वह नौकरी छोड़कर किसी छोटे शहर में रहने और सालाना करीब 12 लाख रुपये खर्च करने की योजना बना रहे हैं. वह घूमने-फिरने और अपने शौक के लिए भी समय निकालना चाहते हैं.
उनकी योजना एक अहम सवाल उठाती है: क्या आर्थिक आजादी के लिए हर व्यक्ति को एक तय रकम, जैसे 10 करोड़ रुपये, जुटाना जरूरी है? इसका जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है. जिन लोगों पर परिवार की जिम्मेदारी नहीं है, लोन की किस्तें नहीं हैं और जिनका खर्च सीमित है, उनकी जरूरत उस व्यक्ति से अलग होगी जो माता-पिता की मदद करता है, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाता है या होम लोन चुका रहा है.
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