लोन लेने से पहले भूलकर भी न करें ये गलतियां, इन 3 तरीकों से करें EMI की प्लानिंग, करें 3 जरूरी टेस्ट

आज के समय में लोन लेना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है, लेकिन EMI की सही प्लानिंग न होने पर यह आर्थिक दबाव भी बन सकता है. पुराने 2-6-10 नियम को अब पूरी तरह पर्याप्त नहीं माना जा रहा. इसलिए लोन लेने से पहले अपनी आय, खर्च, बचत और जोखिम को समझकर EMI तय करना और कुछ जरूरी वित्तीय टेस्ट करना बेहद जरूरी हो गया है.

How to plan EMI Image Credit: Canva/ Money9

How to plan EMI: आज के समय में लोन लेना आसान हो गया है, लेकिन उसे संभालना उतना ही मुश्किल. अक्सर 2-6-10 नियम को उधारी का आसान फॉर्मूला बताया जाता है. इस नियम के मुताबिक, खरीदी गई चीज की कीमत आपकी मासिक सैलरी के आधे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लोन की अवधि छह महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए और EMI आपकी आय के 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. लेकिन बढ़ती महंगाई, कई तरह के लोन और बदलती आय के दौर में यह नियम हर स्थिति पर फिट नहीं बैठता.

2-6-10 नियम क्यों पड़ा कमजोर?

यह नियम मूल रूप से छोटे उपभोक्ता लोन के लिए बनाया गया था, ताकि लोग ज्यादा कर्ज में न फंसें और जल्दी लोन चुका सकें. उस समय ज्यादातर लोग सीमित कर्ज लेते थे. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में घरेलू कर्ज GDP के लगभग 41.3 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. यह बढ़ोतरी धीरे-धीरे हुई है, लेकिन लगातार बढ़ रही है.

खासतौर पर पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. अक्टूबर 2025 तक क्रेडिट कार्ड बकाया करीब 3.03 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी ज्यादा है. ऐसे में केवल 10 प्रतिशत EMI की सीमा तय करना आज के समय में हकीकत को पूरी तरह नहीं दर्शाता.

सैलरी नहीं, असली मायने रखता है बचा हुआ पैसा

EMI प्लानिंग में सबसे बड़ी गलती यह है कि लोग कुल सैलरी को आधार बना लेते हैं, जबकि असल मायने मासिक बचत या सरप्लस का होता है. मान लीजिए दो लोग हर महीने 1 लाख रुपये कमाते हैं.

  • पहले व्यक्ति का मासिक खर्च 35,000 रुपये है.
  • दूसरे व्यक्ति का मासिक खर्च 70,000 रुपये है.

अगर दोनों 30,000 रुपये EMI में देते हैं, तो पहले व्यक्ति के पास बचत और आपात स्थिति के लिए पर्याप्त पैसा बचेगा. लेकिन दूसरे व्यक्ति के पास बहुत कम गुंजाइश बचेगी. यानी असली ताकत आपकी नेट बचत में है, न कि केवल सैलरी के आंकड़े में.

EMI की सीमा क्या होनी चाहिए?

  • कुल EMI, नेट टेक-होम सैलरी के 30-35 प्रतिशत से अधिक न हो.
  • बचत के बाद जो हर महीने सरप्लस बचे, उसकी 60-70 प्रतिशत से ज्यादा EMI में न जाए.
  • EMI चुकाने के बाद भी आमदनी का 15-20 प्रतिशत हिस्सा बचत में जरूर जाए.
  • यदि EMI के कारण बचत पूरी तरह बंद हो रही है, तो समझिए बोझ ज्यादा है.

बैंक कई बार 50 प्रतिशत तक आय पर लोन दे देते हैं, लेकिन लोन मिल जाना और उसे आराम से चुका पाना दो अलग बातें हैं. डेटा बताता है कि जब EMI आय के 40 प्रतिशत से ऊपर चली जाती है, तो थोड़ी सी भी आय में रुकावट परेशानी पैदा कर सकती है.

लोन लेने से पहले करें तीन जरूरी टेस्ट

सिर्फ फॉर्मूला देखने के बजाय कुछ आसान टेस्ट जरूर करें:

छह महीने का सुरक्षा टेस्ट
क्या आपके पास कम से कम छह महीने के खर्च और EMI कवर करने लायक इमरजेंसी फंड है? अगर नहीं, तो जोखिम ज्यादा है.

ब्याज दर बढ़ने का टेस्ट
ब्याज दर में 1-2 प्रतिशत की बढ़ोतरी मानकर EMI दोबारा निकालें. अगर नई EMI से बजट बिगड़ता है, तो लोन बड़ा है.

आय की स्थिरता का टेस्ट
बोनस, इंसेंटिव या वैरिएबल पे पर EMI प्लान न करें. फिक्स्ड EMI के लिए फिक्स्ड आय जरूरी है.

आज के दौर में कॉन्ट्रैक्ट जॉब, स्टार्टअप कल्चर और प्रदर्शन आधारित वेतन आम हो चुका है. ऐसे में आय की स्थिरता पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है.

क्या 2-6-10 नियम गलत है?

2-6-10 नियम पूरी तरह गलत नहीं है. यह सावधानी का संदेश देता है, जो आज भी जरूरी है. लेकिन 2026 के दौर में EMI की योजना केवल एक फॉर्मूले से तय नहीं की जा सकती. सही फैसला वही है जिसमें बचत जारी रहे, इमरजेंसी फंड मौजूद हो, और आपात परिस्थितियों के लिए जगह बची हो.