गिरते ट्रेडिंग वॉल्यूम के बीच NSE की नई रणनीति, RBI से मांगी क्वांटो डेरिवेशन की मंजूरी; निवेशकों को क्या होगा फायदा?
घरेलू करेंसी डेरिवेटिव्स बाजार में गिरते कारोबार को फिर से रफ्तार देने के लिए एनएसई ने बड़ा कदम उठाया है. एक्सचेंज ने आरबीआई से क्वांटो क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव्स लॉन्च करने की मंजूरी मांगी है. अगर अनुमति मिलती है, तो निवेशकों को विदेशी करेंसी पेयर्स में बिना करेंसी एक्सचेंज रिस्क के ट्रेडिंग करने का नया विकल्प मिलेगा.
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) अपने करेंसी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में दोबारा जान फूंकने के लिए एक बड़ा दांव खेलने जा रहा है. एनएसई ने ‘क्वांटो क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव्स’ (Quanto Derivatives) लॉन्च करने की योजना बनाई है और इसके लिए रिजर्व बैंक (RBI) से हरी झंडी मांगी है. इसका खुलासा एनएसई द्वारा आईपीओ (IPO) के लिए सेबी के पास जमा किए गए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रोस्पेक्टस (DRHP) से हुआ है.
इस कदम का मुख्य मकसद घरेलू एक्सचेंज पर ट्रेडिंग वॉल्यूम को वापस बढ़ाना है, जो पिछले कुछ समय में नए नियमों की वजह से काफी नीचे आ गया था.
क्या हैं क्वांटो डेरिवेटिव्स और कैसे करते हैं काम?
आसान शब्दों में कहें तो क्वांटो डेरिवेटिव्स एक ऐसा फाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट है, जो निवेशकों को भारतीय रुपये से बाहर निकलकर ग्लोबल करेंसी पेयर्स (जैसे यूरो-यूएस डॉलर या पाउंड-यूएस डॉलर) के उतार-चढ़ाव में ट्रेड करने का मौका देता है.
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें ट्रेड करते समय निवेशकों को सेटलमेंट वाली करेंसी के उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं उठाना पड़ता. इसमें सेटलमेंट के लिए एक्सचेंज रेट पहले से फिक्स (तय) होता है. यानी, निवेशक को दो विदेशी मुद्राओं के मूवमेंट का पूरा फायदा तो मिलता है, लेकिन मुनाफे या नुकसान को घरेलू करेंसी में बदलते समय होने वाले नुकसान का डर नहीं रहता.
नए नियमों से आई थी बाजार में भारी गिरावट
एनएसई को यह नया प्रॉडक्ट लाने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि डोमेस्टिक करेंसी डेरिवेटिव्स मार्केट में ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत तेजी से गिरा है. मार्च 2024 में जहां एनएसई पर यह वॉल्यूम ₹33,165 करोड़ था, वहीं जून 2026 तक यह घटकर महज ₹5,000 करोड़ के आसपास रह गया.
इस भारी गिरावट की वजह आरबीआई का वह नियम था, जिसके तहत निवेशकों के लिए करेंसी डेरिवेटिव्स में ट्रेड करने के लिए अंडरलाइंग फॉरेन करेंसी एक्सपोजर (विदेशी मुद्रा का वास्तविक लेनदेन या जरूरत) का दस्तावेजी सबूत देना अनिवार्य कर दिया गया था. इस नियम से पहले सट्टेबाज (स्पेक्युलेटर्स) और आम निवेशक बहुत आसानी से ट्रेड कर पाते थे. सख्ती का असर यह हुआ कि जनवरी 2025 से बीएसई (BSE) के करेंसी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में कारोबार लगभग शून्य हो चुका है.
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बाजार को फिर से चमकाने की कोशिश
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, अब एनएसई को उम्मीद है कि बिना करेंसी रिस्क वाले इन ‘क्वांटो कॉन्ट्रैक्ट्स’ के आने से बड़े संस्थागत और अंतरराष्ट्रीय निवेशक दोबारा भारतीय बाजारों का रुख करेंगे. अगर आरबीआई से इसकी मंजूरी मिलती है, तो यह सेगमेंट एक बार फिर रफ्तार पकड़ सकता है.
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