नया क्लोजिंग सिस्टम पड़ा भारी? 5% तक घट सकती है ब्रोकरेज की कमाई, NSE की भी बढ़ी टेंशन

शेयर बाजार में क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए लागू किए गए नए Closing Auction System (CAS) के पहले सप्ताह में भारी भ्रम और उतार-चढ़ाव देखने को मिला. कई ट्रेडर्स और ब्रोकरेज ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए, लेकिन SEBI ने स्पष्ट कर दिया है कि यह प्रणाली वापस नहीं ली जाएगी और समय के साथ इसमें सुधार होगा.

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Highlights

  • शेयर बाजार में क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए लागू किए गए नए CAS के पहले सप्ताह में भारी को मिला.
  • कई ट्रेडर्स और ब्रोकरेज ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए.
  • SEBI ने स्पष्ट कर दिया है कि यह प्रणाली वापस नहीं ली जाएगी और समय के साथ इसमें सुधार होगा.

SEBI Closing Auction System: भारतीय शेयर बाजार में क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए लागू किए गए नए Closing Auction System (CAS) के पहले ही सप्ताह में काफी हलचल देखने को मिली. शुरुआती दो कारोबारी सत्रों में कई शेयरों के क्लोजिंग प्राइस में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव आया, जिससे ट्रेडर्स, ब्रोकरेज और रिटेल निवेशकों के बीच भ्रम की स्थिति बन गई. हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने साफ कर दिया है कि यह नई व्यवस्था जारी रहेगी और इसे वापस नहीं लिया जाएगा.

SEBI ने क्या कहा?

Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक, SEBI के वरिष्ठ अधिकारियों, जिनमें बोर्ड सदस्य के.वी.आर. मूर्ति भी शामिल थे, ने प्रमुख ब्रोकरेज कंपनियों के साथ बैठक की. इसमें उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था फिलहाल शुरुआती चुनौतियों से गुजर रही है. जैसे-जैसे इसमें अधिक भागीदारी बढ़ेगी, यह प्रणाली बेहतर तरीके से काम करेगी.

SEBI ने ब्रोकरेज कंपनियों से तकनीकी ढांचे को तेजी से मजबूत करने और क्लोजिंग ऑक्शन में अधिक ऑर्डर लाने के लिए भी कहा है.

क्यों मचा विवाद?

नए सिस्टम के तहत 200 से अधिक डेरिवेटिव वाले शेयरों का आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस अब Closing Auction के जरिए तय किया जा रहा है. पहले दो कारोबारी दिनों में यह क्लोजिंग प्राइस कई मामलों में 3:15 बजे तक के अंतिम ट्रेडिंग भाव से काफी अलग रहा. इससे निवेशकों के बीच भ्रम बढ़ गया और सोशल मीडिया पर भी कई सवाल उठने लगे.

CAS क्यों लाया गया?

SEBI ने इस व्यवस्था का प्रस्ताव वर्ष 2024 में रखा था. इसका मकसद शेयरों की बेहतर Price Discovery सुनिश्चित करना और भारतीय बाजार को दुनिया के प्रमुख शेयर बाजारों की व्यवस्था के अनुरूप बनाना है. इसके अलावा, इंडेक्स आधारित फंड्स की Tracking Error कम करने में भी यह प्रणाली मदद करेगी.

कम भागीदारी बनी बड़ी वजह

शुरुआती दिनों में क्लोजिंग ऑक्शन में पर्याप्त भागीदारी नहीं होने से लिक्विडिटी कमजोर रही. कई Proprietary Trading Firms और High Frequency Traders (HFTs) ने या तो ऑक्शन में हिस्सा नहीं लिया या अपनी गतिविधियां कम कर दीं. इसका असर यह हुआ कि छोटे-छोटे खरीद और बिक्री के ऑर्डर भी क्लोजिंग प्राइस में बड़ा बदलाव करने लगे.

ब्रोकरेज कारोबार पर भी असर

नई व्यवस्था का असर ब्रोकरेज कंपनियों की कमाई पर भी पड़ सकता है. Zerodha का अनुमान है कि इससे पूरे उद्योग की आय में 1% से 5% तक की कमी आ सकती है. वहीं Jefferies का मानना है कि एक्सपायरी डे पर कॉन्ट्रैक्ट्स में 10% से 20% की गिरावट आने पर कुल ऑप्शंस वॉल्यूम में 5% से 10% तक कमी हो सकती है.

NSE पर भी पड़ सकता है असर

यह बदलाव IPO की तैयारी कर रहे NSE के लिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि एक्सचेंज की आय का बड़ा हिस्सा डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग से आता है. जुलाई में ही फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग 17 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई थी.

फिलहाल जारी रहेगा नया सिस्टम

हालांकि शुरुआती दिनों में बाजार में काफी असमंजस देखने को मिला, लेकिन SEBI का रुख साफ है. नियामक का मानना है कि जैसे-जैसे क्लोजिंग ऑक्शन में भागीदारी और लिक्विडिटी बढ़ेगी, यह व्यवस्था अधिक स्थिर होगी और बाजार के लिए लंबे समय में फायदेमंद साबित होगी.

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