F&O पर SEBI का साफ संदेश; फ्यूचर्स से दिक्कत नहीं, लेकिन शॉर्ट-डेटेड ऑप्शंस पर कड़ी नजर

सेबी ने स्पष्ट किया है कि फ्यूचर्स सेगमेंट को लेकर कोई चिंता नहीं है, लेकिन बेहद कम अवधि वाले ऑप्शंस खासकर जीरो-डे-टू-एक्सपायरी कॉन्ट्रैक्ट्स पर नियामक की पैनी नजर बनी हुई है. डेटा के आधार पर उठाए गए कदमों के असर की समीक्षा जारी है और जरूरत पड़ने पर आगे भी लक्षित हस्तक्षेप किए जा सकते हैं.

शेयर मार्केट Image Credit: FreePik

Derivative Market and SEBI: पूंजी बाजार नियामक सेबी ने साफ कर दिया है कि उसे फ्यूचर्स सेगमेंट को लेकर कोई चिंता नहीं है, लेकिन बेहद कम अवधि वाले ऑप्शंस खासकर शॉर्ट-टेनर और जीरो-डे-टू-एक्सपायरी कॉन्ट्रैक्ट्स पर वह लगातार निगरानी रखे हुए है. सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने संकेत दिया कि हाल के रेगुलेटरी कदम किसी व्यापक F&O कार्रवाई का हिस्सा नहीं, बल्कि चुनिंदा जोखिम वाले हिस्से पर केंद्रित हैं.

फ्यूचर्स पर नहीं, शॉर्ट-डेटेड ऑप्शंस पर फोकस

पांडे ने स्पष्ट किया कि फ्यूचर्स बाजार को लेकर सेबी को कभी संरचनात्मक समस्या नहीं दिखी. चिंता उन ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स को लेकर है जिनकी मियाद बेहद छोटी होती है, कई बार उसी दिन खत्म होने वाले सौदे. ये कॉन्ट्रैक्ट्स कम प्रीमियम में ऊंचा लीवरेज देते हैं, जिससे खुदरा निवेशक बहुत कम पूंजी में बड़े दांव लगा पाते हैं. लेकिन यही लीवरेज तेज उतार-चढ़ाव और तेज प्रीमियम क्षरण (टाइम डिके) के कारण भारी नुकसान का कारण भी बन सकता है.

नियामक ने अक्टूबर 2024 और मई 2025 में ऐसे ट्रेडिंग प्रैक्टिस पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाए थे, जिन्हें सिलसिलेवार तरीके से लागू किया गया. अब सेबी इन उपायों के असर का डेटा-बेस्ड आकलन कर रही है. अगर जरूरत पड़ी तो आगे भी परामर्श प्रक्रिया के जरिए अतिरिक्त कदम उठाए जा सकते हैं.

‘ब्रॉड-ब्रश’ कार्रवाई नहीं, कैलिब्रेटेड अप्रोच

सेबी प्रमुख ने यह भी कहा कि नियामक “फ्लिप-फ्लॉप” या एक झटके में व्यापक प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है. उसकी रणनीति समस्या-विशेष की पहचान कर टारगेटेड हस्तक्षेप करना है, ताकि बाजार में प्राइस डिस्कवरी और लिक्विडिटी जैसी अहम भूमिकाएं प्रभावित न हों. दरअसल, डेरिवेटिव्स बाजार खासकर फ्यूचर्स संस्थागत निवेशकों, हेजर्स और आर्बिट्राजर्स के लिए जोखिम प्रबंधन का अहम साधन है. ऐसे में सेबी का उद्देश्य पूरे सेगमेंट को बाधित करना नहीं, बल्कि अत्यधिक सट्टा गतिविधियों को संतुलित करना है.

90 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान, फिर भी बढ़ रहा आकर्षण

सेबी के आंकड़ों के मुताबिक डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में 90 फीसदी से ज्यादा रिटेल ट्रेडर्स को नुकसान होता है. इसके बावजूद अल्ट्रा-शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स का आकर्षण बढ़ा है. यही कारण है कि हाल में नियामक ने चेतावनी जारी कर कहा था कि अत्यधिक सट्टेबाजी पूंजी बाजार की सेहत के लिए लॉन्ग टर्म में जोखिम बन सकती है. एनएसई के एमडी और सीईओ आशीष कुमार चौहान ने भी सुझाव दिया था कि डेरिवेटिव्स में भागीदारी के लिए न्यूनतम पात्रता मानदंड (minimum qualifying criteria) तय किए जाने चाहिए, ताकि कम इनकम वर्ग के निवेशक बिना समझ के जोखिम भरे सौदों में पैसा न गंवाएं. हालांकि सेबी ने इस पर कोई तत्काल निर्णय का संकेत नहीं दिया है.

ये भी पढ़ें- टाटा ग्रुप की इन 6 कंपनियों में बढ़ी FII की दिलचस्पी, Q3 में इतनी बढ़ाई हिस्सेदारी; देखें लिस्ट

Latest Stories

70% तक ROE और जीरो कर्ज, इन 5 स्टॉक्स पर रख सकते हैं नजर; क्या आपके पोर्टफोलियो में हैं ये शेयर?

होली पर बिगड़ेगा बाजार का मूड! USA मार्केट क्रैश, Gift Nifty और एशियाई इंडेक्स भी धड़ाम, जानें क्यों बढ़ी टेंशन

इस डिफेंस कंपनी पर बुधवार को एक बार फिर रहेगी नजर, 2901 करोड़ के हेलीकॉप्टर कॉन्ट्रैक्ट के बाद चर्चा में रहेंगे शेयर

टाटा ग्रुप की इन 6 कंपनियों में बढ़ी FII की दिलचस्पी, Q3 में इतनी बढ़ाई हिस्सेदारी; देखें लिस्ट

मिडिल ईस्ट तनाव से हिला शेयर मार्केट, 2 दिन में निवेशकों के ₹11 लाख करोड़ डूबे; क्या और गिरावट का खतरा?

Iran-Israel टकराव से बाजार में टेंशन, BEL, BHEL समेत ये 4 स्टॉक्स पर सीधा असर; मिडिल ईस्ट में करते हैं ये काम