कमजोर मॉनसून फसलों और पावर ग्रिड के लिए कैसे बन रहा खतरा, क्यों बदल रहा देश में बारिश का पैटर्न?
इस साल मॉनसून की शुरुआत रिकॉर्ड के हिसाब से भारत में पांचवें सबसे सूखे जून महीने से हुई, जिसमें बारिश सामान्य से लगभग 40 फीसदी कम रही. दक्षिण भारत के बेंगलुरु में पिछले हफ्ते 112 साल में जुलाई का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया.

तेज होते अल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भारत में मॉनसून की बारिश का पैटर्न बदल रहा है. इससे मौसम का मिजाज अनिश्चित हो रहा है, जिससे खेती की पैदावार पर बुरा असर पड़ने और पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है.
कितनी कम हुई बारिश?
इस साल मॉनसून की शुरुआत रिकॉर्ड के हिसाब से भारत में पांचवें सबसे सूखे जून महीने से हुई, जिसमें बारिश सामान्य से लगभग 40 फीसदी कम रही. इसके बाद, इस महीने की शुरुआत में अचानक भारी बारिश हुई, जब मुंबई जैसे शहरों में एक हफ्ते के अंदर ही लगभग एक महीने जितनी बारिश हो गई. तब से, मौसम का सिस्टम फिर से रुक गया है और 19 जुलाई तक देश में बारिश इस समय के सामान्य स्तर से लगभग 24 फीसदी कम रही है.
फसल की बुवाई में रुकावट और बिजली की बढ़ती मांग
ईटी के अनुसार, देश की लगभग आधी खेती की जमीन सिंचाई के लिए अभी भी बारिश पर निर्भर है. ऐसे में, कभी सूखा तो कभी जोरदार बारिश का दौर गर्मियों की फसल की बुवाई में रुकावट डाल रहा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में कमाई पर असर पड़ रहा है और खाने-पीने की चीज़ें महंगी होने का खतरा बढ़ रहा है. साथ ही, मॉनसून में अचानक आने वाले ठहराव की वजह से शहरों में उमस बढ़ रही है, जिससे ठंडक के लिए बिजली की मांग भी बढ़ रही है.
रहस्यमय मॉनसून
ईटी ने प्राइवेट फोरकास्टर ‘स्काईमेट वेदर सर्विसेज’ में मौसम विज्ञान के प्रेसिडेंट जी.पी. शर्मा के हवाले से लिखा, ‘भारत का मॉनसून एक लंबा सीजन है, इसलिए जाहिर है कि इसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन इस बार इसका व्यवहार कुछ अधिक ही अजीब है. यह थोड़ा रहस्यमय हो गया है.’
मौसम में उतार-चढ़ाव क्यों?
मौसम में ये उतार-चढ़ाव समुद्र तल से 20,000 से 25,000 फीट की ऊंचाई पर चलने वाली हवाओं (स्टीयरिंग करेंट्स) की वजह से हो रहे हैं. शर्मा के मुताबिक, बारिश लाने वाले सिस्टम को उस ऊंचाई पर हवा के बहाव में रुकावट (एटमॉस्फेरिक ब्लॉकिंग पैटर्न) का सामना करना पड़ रहा है, जिससे मॉनसून डिप्रेशन या तो रुक जाते हैं या अपने रास्ते से भटक जाते हैं.
मॉनसून पर अल नीनो का असर
रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो के असर से मॉनसून की बारिश में लंबे समय तक रुकावटें और बढ़ रही हैं. अल नीनो उपमहाद्वीप के ऊपर हवा को ऊपर उठने के बजाय नीचे बैठने पर मजबूर करता है. भले ही मॉनसून की हवाएं अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आती हैं, लेकिन हवा का नीचे की ओर बैठना एक ढक्कन की तरह काम करता है जो बारिश वाले बादलों को बनने से रोकता है, जिससे आसपास की नमी दमघोंटू गर्मी में बदल जाती है.
बारिश का अनुमान
दक्षिण भारत के बेंगलुरु में पिछले हफ्ते 112 साल में जुलाई का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया. साथ ही, भारत मौसम विज्ञान विभाग ने चेतावनी दी है कि कई इलाकों में दिन का तापमान सामान्य से लगभग 3°C से 5°C ज़्यादा चल रहा है.
यह भी साफ नहीं है कि मॉनसून सीजन के बाद के समय में बारिश सामान्य होगी या नहीं. जहां IMD का लंबे समय का अनुमान है कि कुल मौसमी बारिश लंबे समय के औसत का लगभग 94 फीसदी होगी, वहीं प्राइवेट मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मॉनसून के दूसरे हिस्से में बारिश में अधिक कमी देखी जा सकती है.