Mega PSB Merger: ग्लोबल बनेंगे बैंक, लेकिन बंद होंगी शाखाएं और गहराएगा नौकरी संकट

भारत सरकार एक बार फिर बैंकिंग सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी में है. नीति आयोग की सिफारिश पर छोटे सरकारी बैंकों का विलय बड़े बैंकों में किया जा सकता है. इससे देश में सिर्फ चार बड़े सरकारी बैंक बचेंगे, लेकिन सवाल है कि इस मर्जर के साथ किन किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

बैंक मर्जर Image Credit: Money9 Live

अश्वनी राणा | भारत सरकार बैंकिंग सेक्टर में बड़े बदलाव की योजना पर काम कर रही है. सरकार का बैंकों के मेगा मर्जर की योजना है. नीति आयोग की सिफारिश पर सरकार छोटे सरकारी बैंकों को बड़े सरकारी बैंकों में विलय कर सकती है. इस समय 12 सरकारी बैंक हैं जिनमें से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा को छोड़कर बाकि 8 बैंकों को इन बड़े बैंकों में मर्ज कर सकती है. जिससे देश में सिर्फ चार बड़े सरकारी बैंक ही बचे रह जाएंगे. बाकी छोटे बैंकों को इन दिग्गज बैंकों में मिलाने की रूपरेखा तैयार की जा रही है. सरकार चाहती हैं कि, बैंकों का विलय किया जाए, जिससे बैंकिंग सिस्टम मजबूत बने और वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके. सरकार का सोचना है कि मर्जर से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता बढ़ेगी, उनकी बैलेंस शीट मजबूत होगी और बैंक ज्यादा प्रभावी तरीके से काम कर पायेंगे.

इससे पहले भी सरकार ने 1 अप्रैल 2020 से 6 बैंक, सिंडीकेट बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, कारपोरेशन बैंक और आंध्रा बैंक का अस्तित्व समाप्त कर इन बैंकों को 4 बैंकों, केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में मर्जर कर दिया गया था. केन्द्र सरकार ने सबसे पहले 2008 में स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र, 2010 में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर और 2017 में बाकि 5 एसोसिएट बैंकों का स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय के बाद 2019 में तीन बैंकों, बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक का विलय करने के बाद एक और बड़े सरकारी बैंकों के विलय किया था .

1991 के आर्थिक संकट के उपरान्त बैंकिंग क्षेत्र के सुधार के दृष्टि से जून 1991 में एम. नरसिंहम् की अध्यक्षता में नरसिंहम् समिति अथवा वित्तीय क्षेत्रीय सुधार समिति की स्थापना की गई जिसने अपनी संस्तुतियां दिसंबर 1991 में प्रस्तुत कीं. नरसिंहम् समिति की द्वितीय में स्थापना 1998 में हुई. नरसिंहम् समिति की सिफारिशों ने भारत में बैंकिंग क्षमता को बढ़ने में मदद की है. इसने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये व्यापक स्वायत्तता प्रस्तावित की गई थी. समिति ने बड़े भारतीय बैंकों के विलय के लिये भी सिफारिश की थी. इसी समिति ने नए निजी बैंकों को खोलने का सुझाव दिया जिसके आधार पर 1993 में सरकार ने इसकी अनुमति प्रदान की. भारतीय रिजर्व बैंक की देखरेख में बैंक के बोर्ड को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने की सलाह भी नरससहिंम् समिति ने दी थी.

इन बैंकों के विलय के बाद एक ही सड़क पर यदि मर्ज होने वाले बैंकों की शाखाएं हैं तो निश्चित रूप से एक शाखा को बंद किया जायेगा. एक ही प्रदेश में बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों में से एक या दो कार्यालय भी बंद करने पड़ेंगे. जिससे उन शाखाओं और प्रशासनिक कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों की दूर दूर ट्रांस्फर और छटनी होगी. यानि कुल मिलकार पेपर पर तो बैंकों का विलय हो जायेगा लेकिन अलग अलग संस्कृति प्रौद्योगिक प्लेटफार्म एवं मानव संसाधन का एकीकरण कैसे संभव होगा एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि सभी बैंकों का अपना अपना सांस्कृतिक वातावरण होता है. सभी बैंकों का अपना अपना प्रौद्योगिक प्लेटफार्म होता है और कर्मचारियों की सेवा शर्तें और नियम भी अलग अलग होते हैं. सभी बैंकों के द्वारा अपने ग्राहकों को अलग अलग तरह के उत्पाद उपलब्ध कराये जाते हैं.

ग्राहकों का भी लम्बे समय से एक बैंक से रिश्ता होने के कारण एक भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है जिसका असर भी विलय के पश्चात् देखने को मिल सकता है. मर्जर के बाद हो सकता है उनके बैंक की ब्रांच बंद हो जाये और दूसरे बैंक की ब्रांच में मर्ज होकर उनको दूर जाना पड़े. मर्जर के बाद नई पासबुक, चेकबुक और नया खाता नंबर भी हो सकता है .

सरकार भले ही कहे कि किसी भी कर्मचारी को निकाला नहीं जायेगा लेकिन पहले हुए सभी बैंकों के विलय में देखने में आया है कि विलय होने वाले बैंक कर्मचारियों को दूसरे नागरिक की नजर से देखा जाता है और उनसे सही तरह का बर्ताव भी नहीं होता है जिससे ना चाहते हुए भी कर्मचारी नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं. इन बैंकों में कर्मचारियों की प्रोमोशन, ट्रान्सफर और अन्य सुविधाओं के अलग अलग नियम होंगे. ऐसे में विलय के बाद किस बैंक के नियम लागू होंगे यह कहना भी मुश्किल है. जो लोग अपनी प्रमोशन का इंतजार कर रहे होंगे विलय के बाद सिनिओरिटी की समस्या भी आएगी.

सरकार ने जबसे यह फैसला लिया है कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों का विलय करके इनकी संख्या कम की जाएगी बैंकों में हो रही भर्ती पर भी इसका असर शुरू हो गया है. इस विलय के निर्णय को देखते हुए बैंकों ने नई भर्ती में भी कमी करनी शुरू कर दी है. सरकारी क्षेत्र के इन बैंकों में अच्छी खासी संख्या में भर्तियां हो सकती थीं और बेरोजगार युवकों को रोजगार की उम्मीद थी वह भी इस विलय से समाप्त हो जाएगी.

ऐसे में क्या सरकार ऐसा भरोसा दिला सकती है की विलय के पश्चात बैंकों की बंद होने वाली शाखाओं को दूसरी जगह पर खोला जायेगा . और नई भर्तियां जारी रखी जाएंगी. इससे पहले के विलय के पश्चात जिस प्रकार से शाखाओं को बंद किया गया उससे ग्राहकों को भी असुविधा का सामना करना पड़ा है. उनकी पहले जो शाखा घर के पास थी वह दूर चली गई है और एक ही शाखा में 2 से 3 शाखाओं के विलय के पश्चात शाखा में भीड़ भी बढ़ गई है.

सरकार का बैंकों की संख्या कम करने का फैसला बैंकों को किस ओर ले जायेगा ये कहना मुश्किल है. आज सभी बैंक अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे हैं और सरकार को भी डिविडेंट दे रहे हैं. समय के अनुसार किसी भी क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता होती है लेकिन, हम 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट को भूले नहीं, जिसमें विकाशील देशों के बड़े बड़े बैंक धराशायी हो गए थे. सिर्फ बैंक के बड़े होने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. बड़े बैंकों को चलाने के लिए अनुभवी लीडरशिप भी होनी चाहिए . इसलिए सरकार को इस मेगा मर्जर से पहले पहलुओं पर अलग अलग हित धारकों से बात करनी चाहिये .

(लेखक, वॉयस ऑफ बैंकिंग के फाउंडर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं. )

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