इंडियन क्रूड ऑयल बास्केट में 146 डॉलर पहुंची कच्चे तेल की कीमत, कंपनियों के छूटे पसीने, पेट्रोल-डीजल महंगे होने का खतरा
इंडियन क्रूड ऑयल बास्केट 46 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से भारत की सरकारी ऑयल कंपनियों IOC, BPCL और HPCL पर भारी दबाव बढ़ गया है. अगर यह तेजी लंबे समय तक बनी रही, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं या सरकार को कंपनियों को राहत देनी पड़ सकती है. तेल की महंगाई से भारत का आयात बिल, महंगाई, रुपये पर दबाव और पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने का खतरा बढ़ गया है.
Crude Oil Crisis: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतें सातवें आसमान पर पहुंचा दी है. इसने भारत की टेंशन बढ़ा दी है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें अब सिर्फ एक ऊर्जा संकट नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव की बड़ी घंटी बनता जा रहा है. घरेलू रिफाइनरियां जिस औसत कीमत पर तेल आयात करती हैं, यानी इंडियन क्रूड ऑयल बास्केट, 17 मार्च को 146.09 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. यह फरवरी के औसत 69.01 डॉलर प्रति बैरल के मुकाबले 111.7 फीसदी की तेज उछाल है. इस तेजी ने उद्योगों की लागत, सरकारी वित्त और आम लोगों की जेब, तीनों पर दबाव बढ़ाने के संकेत दे दिए हैं. इतना ही नहीं इससे आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के महंगे होने का भी खतरा मंडराने लगा है.

दबाव में तेल कंपनियां
कच्चे तेल के महंगे होने का असर भारत की सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों जैसे- IOC, BPCL और HPCL पर पड़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा स्तर पर तेल की कीमतें उस सीमा से काफी ऊपर निकल चुकी हैं, जहां तक कंपनियां आसानी से दबाव झेल सकती थीं. अगर कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहता है, तो सेक्टर का गणित बिगड़ने लगता है. ऐसे में OMCs की पेट्रोल और डीजल पर मार्केटिंग मार्जिन 6.3 रुपये प्रति लीटर तक घट सकती है, जबकि LPG पर नुकसान 10.2 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ सकता है. इससे सालाना 32,800 करोड़ रुपये की अतिरिक्त LPG अंडर-रिकवरी हो सकती है.
क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?
विश्लेषकों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो सरकार या तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने की इजाजत देगी या फिर वित्तीय मदद देनी पड़ेगी. नहीं तो IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों के कैश फ्लो और मुनाफे पर गहरा दबाव पड़ेगा. अगर कीमतें नहीं बढ़ाई गई, तो ऑटो फ्यूल पर मार्केटिंग लॉस की वजह से OMCs के मुनाफे पर सीधा असर पड़ेगा. फिलहाल उद्योग जगत का अनुमान है कि 31 मार्च से पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव की संभावना कम है. इसकी बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि सरकार बजट लक्ष्यों के अनुरूप टैक्स कलेक्शन और राजकोषीय संतुलन बनाए रखना चाहती है.
हिल सकती है अर्थव्यवस्था
तेल की बढ़ती कीमतों की आग सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं है, इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. तेल कीमतों में उछाल भारत के लिए एक बड़ा बाहरी आर्थिक झटका बन रहा है. इससे रिफाइनरी विस्तार योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं, कुछ परियोजनाएं साल के अंत तक टल सकती हैं, और इसका असर रुपये की कमजोरी तथा विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के रूप में भी दिख सकता है.चूंकि पेट्रोल की कीमत में 40 से 45 फीसदी और डीजल में 35 से 40 फीसदी हिस्सा एक्साइज ड्यूटी और सेस का होता है. ऐसे में अगर सरकार पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डालती, तो उसकी खुद की कमाई घटेगी और राजकोषीय दबाव बढ़ेगा. भारत की मुश्किल यह भी है कि वह कच्चे तेल के लिए दुनिया पर बहुत ज्यादा निर्भर है. देश अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा हॉर्मुज के रास्ते आता है. इसलिए पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का तनाव भारत के लिए सीधा जोखिम बन जाता है.
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