मछुआरों की अर्जी रंग लाई! सरकार ने वापस लिए डीजल के बढ़े दाम, संकट में थी ₹6000 करोड़ की ब्लू इकोनॉमी

डीजल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने मछुआरों की लागत बढ़ाकर उनके कारोबार को संकट में डाल दिया था. नाव चलाने से लेकर हर काम डीजल पर निर्भर है. ऐसे में सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और खास राहत देनी पड़ी.

मछुआरों को डीजल सब्सिडी Image Credit: Money9 Live

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार चली गईं. इसी के असर में प्रीमियम पेट्रोल ₹2 प्रति लीटर महंगा हुआ, जबकि इंडस्ट्रियल यूज के लिए मिलने वाला बल्क डीजल ₹22.43 प्रति लीटर तक बढ़ा दिया गया था. डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच मछली पकड़ने के कारोबार पर दबाव लगातार बढ़ रहा था. ऐसे में सरकार के एक फैसले ने इस दबाव को काफी हद तक कम कर दिया है. सरकार ने मछुआरों को राहत देने के उद्देश्य से बढ़े हुए बल्क डीजल दाम को वापस लेने का फैसला किया है. हालांकि यह राहत केवल गुजरात के मछुआरों को मिली है.

संगठनो ने बढ़े डीजल दाम पर जताई चिंता

गुजरात के मछुआरों और उनसे जुड़े संगठनों ने बढ़ते डीजल के दाम पर चिंता जताई. स्वर जब राज्य के मत्स्य पालन मंत्री जीतू वाघाणी तक पहुंची तो उन्होंने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की. सीएम भूपेंद्र पटेल ने भी सरकार के सामने अर्जी डाली.

केंद्र सरकार ने इस मांग को स्वीकार करते हुए बल्क डीजल पर ₹22.43 प्रति लीटर की बढ़ोतरी को वापस लेने का फैसला किया है. भारत पेट्रोलियम (BPCL) को निर्देश दिया कि मछुआरों के लिए डीजल की कीमत में की गई बढ़ोतरी को तुरंत वापस लिया जाए. अब मछुआरों को पहले की तरह रियायती दर पर डीजल मिलेगा.

मछुआरों के लिए क्यों महंगा डीजल है संकट

भारत में मछली पकड़ने का कारोबार पूरी तरह डीजल पर निर्भर होता है, नाव चलाने से लेकर समुद्र में कई दिनों तक रहने तक हर काम में ईंधन ही सबसे बड़ा खर्च होता है. ऐसे में जब डीजल के दाम अचानक बढ़ते हैं, तो मछुआरों की लागत सीधी बढ़ जाती है और मुनाफा घट जाता है. कई मामलों में तो हालात ऐसे हो जाते हैं कि एक ट्रिप का खर्च ही कमाई के बराबर पहुंच जाता है, जिससे मछुआरों को समुद्र में जाना ही घाटे का सौदा लगने लगता है.

गुजरात मछली बाजार क्यों है अहम

भारत का फिशरीज सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है. यह सेक्टर करीब 3 करोड़ लोगों को रोजगार देता है और देश के कुल GVA में भी योगदान करता है. ऐसे में इस सेक्टर पर दबाव बढ़ने का असर सिर्फ मछुआरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सप्लाई, कीमतों और एक्सपोर्ट पर भी पड़ता है.

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गुजरात की बात करें तो यह राज्य देश का दूसरा सबसे बड़ा मरीन फिश प्रोड्यूसर है. राज्य में हर साल करीब 10-11 लाख मीट्रिक टन मछली उत्पादन होता है. सिर्फ फिश एक्सपोर्ट वैल्यू ही ₹6,000 करोड़ से ज्यादा पहुंच चुकी है और यहां का फिशरीज सेक्टर हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है.

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