23 साल के निचले स्तर पर पहुंचा तेल भंडार, 38 देशों का सामने आया रिकॉर्ड; होर्मुज से हाहाकार!
होर्मुज स्ट्रेट संकट के बीच दुनिया के 38 विकसित देशों के तेल भंडार 23 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. OECD देशों में 2003 के बाद पहली बार तेल स्टॉक इतना कम हुआ है. EIA की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व से सप्लाई बाधित होने के कारण वैश्विक भंडार तेजी से घट रहे हैं और अमेरिका आपातकालीन सप्लायर की भूमिका निभा रहा है.

Global Oil Reserves: दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. ग्लोबल एनर्जी मार्केट में उथल-पुथल के बीच दुनिया के सबसे विकसित 38 देशों के तेल भंडार पिछले 23 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से मध्य पूर्व से तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है. इसके कारण वैश्विक भंडार तेजी से घट रहे हैं और अमेरिका को आपातकालीन सप्लायर की भूमिका निभानी पड़ रही है.
2003 के बाद पहली बार सबसे निचले स्तर पर पहुंचे भंडार
रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के सदस्य देशों में तेल भंडार वर्ष 2003 के बाद पहली बार इतने निचले स्तर पर पहुंचे हैं. इनमें अमेरिका, कनाडा, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख देश शामिल हैं. विशेषज्ञों का अनुमान है कि मौजूदा तिमाही में वैश्विक तेल भंडार प्रतिदिन 6.3 मिलियन बैरल की दर से घट सकते हैं, जबकि तीसरी तिमाही में यह गिरावट बढ़कर 7.66 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है.
होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से बढ़ा संकट
ग्लोबल ऑयल मार्केट में मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना माना जा रहा है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऑयल सप्लाई मार्गों में से एक है. वर्ष 2025 में इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की ढुलाई होती थी, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का करीब 25 फीसदी और दुनिया की कुल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा था.
हालांकि, वर्ष 2026 की पहली तिमाही में इस मार्ग से तेल परिवहन घटकर 14.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जो एक वर्ष पहले की तुलना में लगभग 30 फीसदी कम है. इससे वैश्विक बाजार में सप्लाई का बड़ा अंतर पैदा हो गया है.
भारत और चीन पर सबसे ज्यादा असर
संघर्ष शुरू होने से पहले होर्मुज स्ट्रेट से होने वाले कुल तेल निर्यात का लगभग 75 फीसदी हिस्सा एशियाई देशों को जाता था. इनमें भारत और चीन की हिस्सेदारी सबसे अधिक थी. दोनों देश मिलकर इस मार्ग से होने वाले कुल तेल निर्यात का 44 फीसदी उपभोग करते थे.
हालांकि, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग मौजूद हैं, लेकिन उनकी क्षमता इतनी नहीं है कि वे होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई की भरपाई कर सकें. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) को मार्च 2026 में सदस्य देशों के आपातकालीन भंडार से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने का फैसला लेना पड़ा, जिसे संगठन के इतिहास का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है.
भारत के पास केवल 4 से 5 दिन का रणनीतिक भंडार
ईवाई (EY) की एक रिपोर्ट ने भारत के लिए चिंता और बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत के रणनीतिक कच्चे तेल भंडार देश की केवल 4 से 5 दिनों की खपत को पूरा करने के लिए पर्याप्त हैं. ऐसे समय में, जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है, यह स्थिति भारत के लिए जोखिमपूर्ण मानी जा रही है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल 2026 में वैश्विक कच्चे तेल की औसत कीमत 103.9 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई, जो जुलाई 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कच्चे तेल, एलपीजी, उर्वरक, रेयर अर्थ मटेरियल, आवश्यक दवाओं और मेडिकल उपकरणों का बड़ा रणनीतिक भंडार तैयार करना चाहिए, ताकि भविष्य में सप्लाई संकट का सामना किया जा सके.
अमेरिका बना दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन सप्लायर
मध्य पूर्व से सप्लाई प्रभावित होने के बाद दुनिया भर के देशों ने अमेरिकी तेल पर निर्भरता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का निर्यात बढ़कर 13.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन पहुंच गया है, जो रिकॉर्ड स्तर के करीब है.
हालांकि, इसका असर अमेरिकी भंडार पर भी दिखाई दे रहा है. अमेरिका का कुल तेल और पेट्रोलियम भंडार घटकर 1.57 बिलियन बैरल रह गया है, जो वर्ष 2004 के बाद का सबसे निचला स्तर है. वहीं, अमेरिकी रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व भी लगातार घट रहा है और अब 357 मिलियन बैरल पर पहुंच गया है.
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