चीन का ’90 फीसदी मॉडल’ घातक, भारत के इन सेक्टर पर सीधा खतरा, प्रोफेसर ने बताया निपटने का फॉर्मूला

प्रोफेसर राम चरण ने भारत-चीन आर्थिक संबंधों पर चेतावनी देते हुए कहा कि चीन की रणनीति भारतीय उद्योगों के लिए बड़ा खतरा है. उन्होंने बताया कि बढ़ता व्यापार घाटा और रुपये की गिरावट चिंता का विषय है. भारत को आत्मनिर्भरता, संतुलित व्यापार और मजबूत नीतियों के जरिए 2047 तक वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने पर फोकस करना होगा.

भारत चीन अर्थव्यवस्था Image Credit: tv9

TV9 नेटवर्क के WITT Summit 2026 में विदेश मामलों के जानकार प्रोफेसर राम चरण ने भारत की अर्थव्यवस्था और चीन के साथ उसके आर्थिक संबंधों को लेकर एक अहम और चेतावनी भरा दृष्टिकोण रखा है. उन्होंने अपने संबोधन में भारत के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों, वैश्विक संघर्षों और चीन की रणनीति को विस्तार से समझाया. आइये विस्तार से जानते हैं.

भारत की आर्थिक चुनौतियां और वैश्विक माहौल

प्रोफेसर राम चरण ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने वैश्विक महंगाई और रुपये की कमजोरी के बीच अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की है. रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित किया है. रूस से तेल खरीदने पर दबाव और अन्य बाहरी कारकों के कारण रुपये की कीमत 76 से गिरकर 92 प्रति डॉलर तक पहुंच गई, जिससे महंगाई बढ़ी और सट्टेबाजों को फायदा मिला.

जियो-इकोनॉमिक वॉर: चीन की रणनीति

उन्होंने “जियो-इकोनॉमिक वॉर” की बात करते हुए बताया कि अब युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के जरिए लड़ा जा रहा है. भारत का आयात 2020 में 65 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 126 अरब डॉलर हो गया है और मौजूदा रफ्तार जारी रही तो 2030 तक यह 739 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. चीन बाजारों पर कब्जे के लिए अपने घातक ‘90% मॉडल’ का इस्तेमाल कर रहा है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रणनीति के तहत चीन वैश्विक मांग का करीब 90% उत्पादन क्षमता तैयार कर सस्ते दामों पर सामान बेचता है. करेंसी को कमजोर रखना और सब्सिडी देना इस मॉडल का हिस्सा है, जिससे अन्य देशों के उद्योग प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते.

किन भारतीय सेक्टरों पर खतरा?

प्रोफेसर राम चरण ने कई सेक्टरों को खतरे में बताया:

  • सोलर एनर्जी सेक्टर में चीन बेहद सस्ते दाम पर उत्पादन कर रहा है, जहां लागत करीब 1 डॉलर है, जबकि भारत में यही लागत लगभग 3 डॉलर तक पहुंचती है, जिससे प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो रही है.
  • इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में भारत ने मैन्युफैक्चरिंग की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन अभी भी चीन के मुकाबले चुनौतियां बनी हुई हैं.
  • फार्मा सेक्टर पर आने वाले समय में दबाव बढ़ने की आशंका है, खासकर कच्चे माल और कीमतों को लेकर.
  • स्टील सेक्टर में विशेष स्टील फिलहाल सुरक्षित माना जा रहा है, लेकिन बाकी सेगमेंट पर प्रतिस्पर्धा का खतरा बना हुआ है.
  • ऑटो इंडस्ट्री में चीन की करीब 10,000 डॉलर कीमत वाली सस्ती कारें भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकती हैं और घरेलू कंपनियों के लिए चुनौती बन सकती हैं.

व्यापार घाटा और रुपये की गिरावट

भारत-चीन व्यापार असंतुलन बढ़ता जा रहा है। भारत का निर्यात सीमित है, जबकि आयात तेजी से बढ़ रहा है। आने वाले 5 वर्षों में 740 अरब डॉलर का ट्रेड डेफिसिट विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल सकता है. 2014 से अब तक रुपये की कीमत 59 से गिरकर 92 प्रति डॉलर हो गई है, जो भारत की आर्थिक प्रगति में बड़ी बाधा बन सकती है.

चीन पर निर्भरता: सबसे बड़ा जोखिम

राम चरण ने चेतावनी दी कि चीन पर अत्यधिक निर्भरता भारत के लिए खतरा बन सकती है. 2025 में मैग्नेट सप्लाई रोकने जैसी घटनाएं इस जोखिम को दिखाती हैं. चीन ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और केमिकल्स जैसे कई क्षेत्रों की सप्लाई चेन पर नियंत्रण रखता है.

आगे का रास्ता

उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को अगले 5–6 वर्षों में रुपये की मजबूती और व्यापार संतुलन पर फोकस करना होगा. चीन के साथ संबंधों को संतुलित रखते हुए रणनीतिक फैसले लेना जरूरी है, तभी भारत 2047 तक वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने का लक्ष्य हासिल कर सकता है.

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