RBI Rate Hike: आखिर 44 महीने बाद RBI ने क्यों बढ़ाया रेपो रेट, किसे बताया ग्रोथ की रुकावट में चुनौतियां?

RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया है. यह फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी है. इस फैसले के पीछे मजबूत आर्थिक ग्रोथ, बढ़ती महंगाई और ग्लोबल ब्याज दरों का दबाव प्रमुख कारण हैं. जून तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही, जबकि अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी पहुंच गई. महंगा कच्चा तेल, कमजोर रुपये और विदेशी निवेश पर दबाव ने भी RBI की चिंता बढ़ाई है.

मजबूत GDP ग्रोथ के बावजूद बढ़ती महंगाई ने RBI की चिंता बढ़ाई है. Image Credit: Sudipta Das/NurPhoto via Getty Images)

Highlights

  • RBI ने रेपो रेट 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया है.
  • मजबूत GDP ग्रोथ के बावजूद बढ़ती महंगाई ने RBI की चिंता बढ़ाई है.
  • महंगे कच्चे तेल और ग्लोबल ब्याज दरों के दबाव से भी RBI ने रेट बढ़ाया है.

RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया है. यह फरवरी 2023 के बाद पहली बार है जब RBI ने ब्याज दर बढ़ाई है. इस फैसले के पीछे तीन बडे़ कारण बताए गए हैं. पहला कारण है कि देश की आर्थिक ग्रोथ उम्मीद से बेहतर बनी हुई है. दूसरा कारण महंगाई का फिर से बढ़ता रिस्क है. तीसरा कारण ग्लोबल ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी निवेश पर बढ़ता दबाव है. RBI का मानना है कि अर्थव्यवस्था अब कुछ सख्त मौद्रिक नीति का असर सह सकती है.

देश की आर्थिक ग्रोथ उम्मीद से बेहतर

भारत की GDP ग्रोथ जून तिमाही में 7.8 फीसदी रही है. यह RBI के अनुमान से 80 बेसिस प्वाइंट ज्यादा है. जुलाई और अगस्त के आंकड़ों में कुछ नरमी जरूर दिखी है लेकिन आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं. घरेलू खपत, सरकारी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की एक्टिविटी से अर्थव्यवस्था को सपोर्ट मिला है. इससे RBI को महंगाई पर ध्यान देने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिली है.

कच्चे तेल की कीमत से बढ़ा दबाव

महंगाई बढ़ने में कच्चे तेल की कीमत अहम भूमिका निभा सकती है. अगस्त में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव करीब 91 डॉलर प्रति बैरल था. सितंबर की शुरुआत में यह 100 डॉलर के पार चला गया और 9 सितंबर को करीब 113 डॉलर तक पहुंच गया. सितंबर के अंत में भी यह करीब 103 डॉलर रहा. महंगा तेल ट्रांसपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ा सकता है और इससे महंगाई का दबाव लंबे समय तक रह सकता है.

ग्लोबल ब्याज दरों से भी चुनौती

RBI के फैसले के पीछे ग्लोबल ब्याज दरों का माहौल भी एक बडा कारण है. अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने सितंबर में ब्याज दर बढ़ाई और अक्टूबर में भी सख्ती की उम्मीद है. भारत और अमेरिका की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड में अंतर घटकर करीब 189 बेसिस प्वाइंट रह गया है. कम अंतर से विदेशी निवेशकों के लिए विकसित देशों की संपत्तियां ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं. इससे उभरते बाजारों की करेंसी और फॉरेन कैपिटल पर दबाव बढ़ सकता है.

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RBI ने अभी ही क्यों बढ़ाई दर

RBI के लिए इस समय ग्रोथ और महंगाई दोनों तस्वीरें बदल गई हैं. जब ग्रोथ कमजोर थी तब केंद्रीय बैंक अस्थायी महंगाई के दबाव को नजरअंदाज कर सकता था. लेकिन अब ग्रोथ उम्मीद से बेहतर है और महंगाई का जोखिम भी बढ़ रहा है. ET के सर्वे में 21 में से 20 अर्थशास्त्रियों और बैंक अधिकारियों ने 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया था. ऐसे में RBI का फैसला ग्रोथ रोकने से ज्यादा महंगाई के दबाव को लंबे समय तक बने रहने से रोकने पर केंद्रित माना जा रहा है.