UPI पर MDR से फायदा या नुकसान? 24.51 बिलियन ट्रांजैक्शन के बाद उठ रहे सवाल
UPI पर MDR लागू करने को लेकर बहस तेज हो गई है. अगस्त 2026 में UPI पर 24.51 बिलियन ट्रांजैक्शंस हुए, जिनकी कुल वैल्यू 29.82 लाख करोड़ रुपये रही. ऐसे में सवाल है कि MDR से UPI इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी या मर्चेंट्स की कॉस्ट बढ़ेगी.
Highlights
- अगस्त 2026 में UPI पर 24.51 बिलियन ट्रांजैक्शंस हुए, जिनकी कुल वैल्यू 29.82 लाख करोड़ रुपये रही.
- 2,000 रुपये से ज्यादा के मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर MDR लागू होगा.
- कंज्यूमर्स और Person-to-Person पेमेंट्स को चार्ज से बाहर रखने की बात है.
UPI MDR: भारत में डिजिटल पेमेंट्स के लिए UPI सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पेमेंट मैकेनिज्म में शामिल हो चुका है. 2020 से UPI ट्रांजैक्शंस पर कंज्यूमर और मर्चेंट से कोई चार्ज नहीं लिया जा रहा है. इसी वजह से छोटे कारोबारियों से लेकर बड़े बिजनेसेज तक UPI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. अब UPI के लंबे समय तक सस्टेनेबल रहने को लेकर MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू करने पर बहस तेज हो गई है.
24.51 बिलियन ट्रांजैक्शंस का आंकड़ा
UPI की शुरुआत NPCI ने जुलाई 2016 में की थी. शुरुआत में पहले महीने सिर्फ 90,000 ट्रांजैक्शंस हुए थे, जिनकी कुल वैल्यू 38 लाख रुपये थी. इसके बाद UPI के इस्तेमाल में तेजी से बढ़ोतरी हुई. अगस्त 2026 में UPI पर 24.51 बिलियन ट्रांजैक्शंस हुए और इनकी कुल वैल्यू 29.82 लाख करोड़ रुपये रही. FY26 में सालाना ट्रांजैक्शन वॉल्यूम बढ़कर 241.62 बिलियन हो गया, जबकि FY17 में यह 17.8 मिलियन था.
UPI के फ्री मॉडल को इसकी तेज एडॉप्शन का एक प्रमुख कारण माना जाता है. 2020 से पहले Person-to-Merchant ट्रांजैक्शंस पर 0.3% तक MDR लागू था. बाद में इसे हटा दिया गया और छोटे वैल्यू वाले ट्रांजैक्शंस को फ्री रखने के लिए गवर्नमेंट की ओर से कुछ फाइनेंशियल सब्सिडी भी दी जाती है.
MDR लागू करने की क्यों हो रही चर्चा?
UPI का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ा है, उसके साथ इसके इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार अपग्रेड करने और नए रिस्क से निपटने की जरूरत भी बढ़ी है. इसी वजह से पेमेंट्स इकोसिस्टम के एक हिस्से का मानना है कि UPI पर सीमित MDR लगाया जा सकता है. इससे मिलने वाली फीस का इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड और UPI के डेवलपमेंट में किया जा सकता है.
हालांकि, गवर्नमेंट ने स्पष्ट किया है कि UPI इस्तेमाल करने वाले कंज्यूमर्स से ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा और Person-to-Person ट्रांजैक्शंस भी फ्री रहेंगे. अगर भविष्य में चार्ज लागू होता है, तो यह केवल कुछ मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर, एक निश्चित थ्रेशोल्ड से ऊपर और नॉमिनल रेट पर लागू हो सकता है.
2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर MDR?
एक संभावित मॉडल के तहत 2,000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजैक्शंस पर MDR लागू होने की चर्चा है. इसमें चार्ज कस्टमर के बजाय मर्चेंट को देना पड़ सकता है. हालांकि, इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या छोटे और मीडियम मर्चेंट्स इस अतिरिक्त कॉस्ट को स्वीकार करेंगे या कैश पेमेंट की ओर वापस जा सकते हैं.
LocalCircles के एक सर्वे में करीब 33,000 रिस्पॉन्डेंट्स में से सिर्फ 17% मर्चेंट्स और बिजनेसेज ने 2,000 रुपये से ज्यादा के UPI पेमेंट्स पर 0.3% या उससे ज्यादा MDR देने की इच्छा जताई.
UPI की हिस्सेदारी कितनी बड़ी?
CareEdge के आंकड़ों के मुताबिक, FY26 में कुल रिटेल पेमेंट वॉल्यूम में UPI की हिस्सेदारी 85.9% थी. FY27 की अप्रैल-जून तिमाही में यह बढ़कर 87.3% हो गई. वहीं FY26 में NEFT और IMPS की संयुक्त हिस्सेदारी 5.3% रही. क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड की हिस्सेदारी क्रमशः 2.1% और 0.5% थी.
वैल्यू के लिहाज से भी UPI की हिस्सेदारी बढ़ी है. FY26 में कुल पेमेंट वैल्यू में UPI का हिस्सा 32.2% था, जो Q1FY27 में बढ़कर 33.6% हो गया. UPI की पहुंच भारत के बाहर भी बढ़ी है. सिंगापुर, UAE, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्रांस, मॉरीशस, कतर और कंबोडिया में मर्चेंट पेमेंट्स के लिए UPI स्वीकार किया जाता है.
MDR से बढ़ सकती है पेमेंट कॉस्ट
MDR लागू करने के पक्ष में तर्क है कि इससे UPI के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की कॉस्ट को सपोर्ट करने के लिए रेवेन्यू स्ट्रीम तैयार हो सकती है. वहीं दूसरी ओर, MDR के कारण छोटे मर्चेंट्स पर अतिरिक्त कॉस्ट बढ़ने और UPI की एडॉप्शन पर असर पड़ने की चिंता भी जताई गई है.
Grant Thornton Bharat के 2025 के एक व्हाइट पेपर के मुताबिक, UPI पर MDR दोबारा लागू करने से 50 मिलियन से ज्यादा मर्चेंट्स की कॉस्ट बढ़ सकती है, खासकर छोटे और मीडियम बिजनेसेज की. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि UPI ने कई अनऑर्गनाइज्ड वेंडर्स को फॉर्मल फाइनेंशियल इकोसिस्टम से जोड़ने में भूमिका निभाई है.
ऐसे में MDR का मॉडल किस तरह तैयार किया जाता है, यह अहम होगा. एक सुझाव यह है कि केवल ट्रांजैक्शन वैल्यू के आधार पर MDR लगाने के बजाय मर्चेंट कैटेगरी के आधार पर इसे लागू किया जाए. इससे माइक्रो और स्मॉल मर्चेंट्स पर पड़ने वाले संभावित बोझ को सीमित किया जा सकता है.
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