तुर्की जैसे देशों को डीजल क्यों बेच रहा भारत, जुलाई में बना फ्यूल एक्सपोर्ट का रिकॉर्ड; RIL-नायरा एनर्जी का दबदबा

2017 में Kpler के रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से किसी भी जुलाई महीने में यह मात्रा सबसे अधिक थी. पश्चिमी एशिया और यूरोप में चल रहे युद्धों ने ग्लोबल फ्यूल ट्रेड के तौर-तरीकों को बदल दिया है, जिससे कीमतें बढ़ी हैं और एक्सपोर्टर्स के लिए मौके बने हैं.

फ्यूल का एक्सपोर्ट.

Highlights

  • भारतीय रिफाइनरियों के लिए एक्सपोर्ट बढ़ाने के अनुकूल हालात बने.
  • युद्धों ने ग्लोबल फ्यूल ट्रेड के तौर-तरीकों को बदल दिया है.
  • रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट में RIL की हिस्सेदारी लगभग तीन-चौथाई है.

पिछले महीने देश का फ्यूल एक्सपोर्ट एक साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. इसकी वजह थी डीजल से होने वाला अच्छा मुनाफा, रूस द्वारा डीजल एक्सपोर्ट पर रोक और ईरान युद्ध के दौरान थोड़े समय के लिए हुई शांति के कारण कच्चे तेल की भरपूर सप्लाई से भारतीय रिफाइनरियों के लिए एक्सपोर्ट बढ़ाने के अनुकूल हालात बने.

एनालिटिक्स फर्म Kpler के शिपिंग डेटा के अनुसार, भारत ने जुलाई में 1.53 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट किया, जो पिछले 12 महीनों के औसत से 27 फीसदी ज्यादा है.

क्यों बढ़ा डीजल का एक्सपोर्ट?

2017 में Kpler के रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से किसी भी जुलाई महीने में यह मात्रा सबसे अधिक थी. रूसी डीजल एक्सपोर्ट पर रोक के बाद डीजल से होने वाले मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी ने (भारत से) एक्सपोर्ट को बढ़ावा दिया. सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए उन इलाकों में कार्गो भेजे गए, जहां पहले पश्चिमी एशिया और रूस से सप्लाई होती थी.

एक्सपोर्टर्स के लिए बने मौके

पश्चिमी एशिया और यूरोप में चल रहे युद्धों ने ग्लोबल फ्यूल ट्रेड के तौर-तरीकों को बदल दिया है, जिससे कीमतें बढ़ी हैं और एक्सपोर्टर्स के लिए मौके बने हैं. इन संघर्षों ने रूस और खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई में रुकावट डाली है, जो ग्लोबल मार्केट के लिए रिफाइंड फ्यूल के दो मुख्य स्रोत हैं.

रूस ने क्यों रोका डीजल का एक्सपोर्ट?

यूक्रेन द्वारा रूसी रिफाइनरियों पर किए गए हमलों के कारण मॉस्को को पेट्रोल और डीजल के एक्सपोर्ट पर रोक लगानी पड़ी है, जिससे उसे घरेलू फ्यूल की मांग पूरी करने के लिए भारत समेत अन्य देशों से इंपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ रहा है. तुर्की जैसे देश, जो पारंपरिक रूप से रूस से फ्यूल लेते थे, अब विकल्प के तौर पर भारतीय कार्गो खरीद रहे हैं.

पश्चिमी एशिया पर निर्भर यूरोप

केप्लर (Kpler) में रिफाइनिंग के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे ने कहा, ‘यूरोप में डीजल की सप्लाई कम है और वह आम तौर पर पश्चिमी एशिया से इंपोर्ट पर निर्भर रहता है. हालांकि, क्षेत्रीय उथल-पुथल के कारण अभी वहां से सप्लाई सीमित है. उन्होंने आगे कहा कि डीजल क्रैक (डीजल और कच्चे तेल की कीमतों के बीच का अंतर) के रिकॉर्ड स्तर पर होने से यूरोप को एक्सपोर्ट की मात्रा बढ़ाने में मदद मिली.

रिलायंस और नायरा एनर्जी करती हैं एक्सपोर्ट

दुबे ने कहा कि एक्सपोर्ट बढ़ने की एक और वजह ईरान-अमेरिका के बीच थोड़े समय की शांति के दौरान रुके हुए कार्गो के आने से कच्चे तेल की भरपूर उपलब्धता थी, जिससे रिफाइनरियों में कामकाज का स्तर ऊंचा बनाए रखने में मदद मिली. उन्होंने कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और नायरा एनर्जी द्वारा संचालित रिफाइनरियों में मेंटेनेंस का काम पूरा होने से भी वे अधिक मात्रा में कच्चे तेल की प्रोसेसिंग कर पाईं.

भारत के रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट में RIL की हिस्सेदारी लगभग तीन-चौथाई है. एक अन्य प्रमुख एक्सपोर्टर, रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी ने भी कथित तौर पर पिछले महीने रूस को फ्यूल भेजा.

यह भी पढ़ें: Stocks to Watch: Paytm, Meesho, Nykaa और कल्याण ज्वैलर्स के शेयरों पर रखें नजर, आज दिख सकती है हलचल