एक ही SIP, एक ही म्यूचुअल फंड, फिर भी ₹3 लाख का फर्क! जानें कैसे Expense Ratio चुपचाप घटा देता है आपकी कमाई

अगर दो लोग एक ही म्यूचुअल फंड में समान SIP करें, फिर भी एक निवेशक को दूसरे से 3 लाख रुपये से ज्यादा रिटर्न मिल सकता है. इसकी वजह बाजार नहीं, बल्कि एक्सपेंस रेशियो है. डायरेक्ट म्यूचुअल फंड में खर्च कम होने से लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न मिलता है, जबकि रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन के कारण एक्सपेंस रेशियो अधिक होता है.

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Highlights

  • एक ही SIP पर भी ₹3 लाख से ज्यादा रिटर्न का अंतर हो सकता है.
  • Direct Plan में कम Expense Ratio होने से लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न मिलता है.
  • Regular Plan में डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन जुड़ने से Expense Ratio बढ़ जाता है.

अगर दो निवेशक एक ही म्यूचुअल फंड में हर महीने 10000 रुपये की SIP करें, दोनों 10 साल तक निवेश करें और दोनों को बाजार से समान रिटर्न मिले, तब भी एक निवेशक के पास दूसरे से 3 लाख रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त निवेश कोष हो सकता है. इसकी वजह बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक्सपेंस रेशियो है.

यही कारण है कि म्यूचुअल फंड चुनते समय सिर्फ रिटर्न देखना पर्याप्त नहीं होता. निवेशकों को यह भी देखना चाहिए कि वे डायरेक्ट प्लान में निवेश कर रहे हैं या रेगुलर प्लान में.

क्या होता है Expense Ratio?

एक्सपेंस रेशियो वह वार्षिक शुल्क है, जो एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) निवेशकों का पैसा मैनेज करने के बदले लेती है. इसी रकम से फंड मैनेजर की फीस, रिसर्च, प्रशासनिक खर्च, रजिस्ट्रार फीस, मार्केटिंग और दूसरी परिचालन खर्च पूरे किए जाते हैं.

यह शुल्क अलग से आपके अकाउंट से नहीं काटा जाता, बल्कि हर दिन फंड की कुल संपत्ति (AUM) से थोड़ा-थोड़ा घटाया जाता है. इसके बाद जो NAV तय होती है, उसमें यह खर्च पहले ही शामिल होता है. यानी जितना ज्यादा Expense Ratio होगा, उतना ही कम रिटर्न निवेशक को मिलेगा.

क्यों बदलता रहता है Expense Ratio?

किसी भी म्यूचुअल फंड का Expense Ratio स्थायी नहीं होता. यह समय-समय पर बदल सकता है.

इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं.

  • फंड का AUM बढ़ना या घटना.
  • SEBI की नई गाइडलाइन या TER नियमों में बदलाव.
  • Regular Plan में डिस्ट्रीब्यूटर को मिलने वाले कमीशन में बदलाव.

Direct और Regular Plan में क्या अंतर है?

Regular Mutual Fund किसी एजेंट, बैंक, ब्रोकर या वित्तीय सलाहकार के जरिए खरीदा जाता है. AMC इन डिस्ट्रीब्यूटर्स को कमीशन देती है, जिसका खर्च Expense Ratio में जुड़ जाता है. वहीं Direct Mutual Fund सीधे AMC से खरीदा जाता है. इसमें किसी बिचौलिये का कमीशन नहीं होता, इसलिए Expense Ratio कम रहता है और निवेशक को अधिक रिटर्न मिलता है.

10 साल में कितना पड़ता है फर्क?

उदाहरण के तौर पर, अगर किसी निवेशक ने Quant Small Cap Fund के Direct Plan में 10 साल तक हर महीने 10000 रुपये की SIP की होती, तो पिछले 10 साल के औसत 25.65% सालाना रिटर्न के आधार पर उसका निवेश करीब 46.69 लाख रुपये हो जाता. वहीं Regular Plan में 24.51% सालाना रिटर्न के आधार पर यही रकम करीब 43.25 लाख रुपये बनती है यानी सिर्फ Expense Ratio के अंतर से करीब 3.44 लाख रुपये का फर्क पड़ जाता.

Expense Ratio में इतना बड़ा फर्क क्यों आता है?

उदाहरण के लिए Quant Small Cap Fund के Regular Plan का Expense Ratio 1.33% है, जबकि Direct Plan में यह 0.63% है. यानी दोनों के बीच सिर्फ 0.70% का अंतर है, लेकिन यही छोटा-सा अंतर 10 साल में लाखों रुपये की अतिरिक्त संपत्ति बना देता है.

क्या हमेशा Direct Plan ही चुनना चाहिए?

यह पूरी तरह निवेशक के अनुभव और जरूरत पर निर्भर करता है. अगर निवेशक खुद रिसर्च कर सकता है, सही फंड चुन सकता है और समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा कर सकता है, तो Direct Plan बेहतर विकल्प हो सकता है क्योंकि इसमें खर्च कम होता है.

लेकिन जिन लोगों को निवेश की ज्यादा जानकारी नहीं है या वे पेशेवर सलाह चाहते हैं, उनके लिए Regular Plan भी उपयुक्त हो सकता है. इसमें थोड़ा ज्यादा Expense Ratio जरूर होता है, लेकिन इसके बदले निवेश सलाह, पोर्टफोलियो बनाने और समय-समय पर समीक्षा जैसी सेवाएं मिलती हैं.

निवेशकों के लिए क्या है सीख?

SIP में सिर्फ अच्छा रिटर्न देने वाला फंड चुनना ही काफी नहीं है. Expense Ratio भी उतना ही महत्वपूर्ण है. सालाना कुछ दशमलव प्रतिशत का अंतर शुरुआत में छोटा लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यही अंतर लाखों रुपये की अतिरिक्त संपत्ति बना सकता है. इसलिए म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले Direct और Regular Plan के Expense Ratio की तुलना जरूर करें.

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