रिकॉर्ड हाई पर सोने की कीमतें, मुनाफा बुक करने से पहले जान लें टैक्स के ये अहम नियम, नहीं तो बढ़ सकता है बोझ
सोने की कीमतों में तेजी के बीच निवेशकों के लिए गोल्ड और उससे जुड़े प्रोडक्ट्स पर टैक्स नियम समझना जरूरी हो गया है. फिजिकल गोल्ड, गोल्ड ईटीएफ और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर अलग-अलग टैक्स नियम लागू होते हैं. सही टैक्स प्लानिंग से निवेशक टैक्स बोझ कम कर सकते हैं. आइये जानते हैं कि किस गोल्ड प्रोडक्ट को बेचने पर कितना टैक्स देना पड़ता है.
सोने की कीमतों में हालिया तेजी के चलते बड़ी संख्या में निवेशक अपने गोल्ड निवेश को बेचने पर विचार कर रहे हैं. कुछ लोग मुनाफा बुक कर चुके हैं, जबकि कई अभी सही समय का इंतजार कर रहे हैं. आज के समय में सोने में निवेश केवल फिजिकल गोल्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि गोल्ड बार, गोल्ड ज्वेलरी, गोल्ड कॉइन के साथ-साथ डिजिटल विकल्प जैसे गोल्ड ईटीएफ, गोल्ड सेविंग फंड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) भी निवेशकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. अगर आप भी अपना सोना बेचना चाहते हैं तो आपको कुछ चीजे जानना बेहद जरुरी हैं. इसमें इस पर लगने वाला टैक्स है. हर गोल्ड प्रोडक्ट पर टैक्स के नियम अलग-अलग हैं इसलिए निवेश से पहले और बिक्री के समय टैक्स से जुड़े प्रावधानों को समझना बेहद जरूरी है. आइए इसे विस्तार से समझते हैं.
गोल्ड और गोल्ड ज्वेलरी बेचने पर कितना टैक्स
इनकम टैक्स कानून के तहत गोल्ड और गोल्ड ज्वेलरी को आमतौर पर कैपिटल एसेट माना जाता है. ऐसे में इन्हें बेचने पर होने वाला मुनाफा “कैपिटल गेन” के तहत टैक्सेबल होता है. अगर कोई व्यक्ति सोने का व्यापार करता है तो उस पर होने वाली कमाई को बिजनेस इनकम माना जाता है. होल्डिंग पीरियड के आधार पर टैक्स की दर तय होती है. अगर गोल्ड 24 महीने से ज्यादा समय तक होल्ड किया गया है, तो उसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाता है और इस पर 12.50% की फ्लैट दर से टैक्स लगता है जिसमें इंडेक्सेशन का लाभ नहीं मिलता है. वहीं, 24 महीने से कम समय में बेचने पर यह शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन होता है और इसे आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स किया जाता है.
गिफ्ट में मिले गोल्ड को लेकर क्या प्रावधान
गिफ्ट के तौर पर मिले सोने को लेकर भी टैक्स के खास नियम हैं. अगर किसी वित्त वर्ष में गिफ्ट के तौर पर मिले सोने और अन्य उपहारों की कुल बाजार कीमत 50,000 रुपये से ज्यादा हो जाती है तो यह राशि टैक्सेबल हो जाती है. हालांकि, पति या पत्नी, माता-पिता, सास-ससुर, भाई-बहन, दादा-दादी जैसे नजदीकी रिश्तेदारों से मिला सोना टैक्स फ्री होता है. इसके अलावा, शादी के मौके पर मिले गिफ्ट और वसीयत या इनहेरिटेंस के जरिए मिला सोना भी प्राप्ति के समय टैक्स के दायरे में नहीं आता है.
हालांकि, गिफ्ट या विरासत में मिले सोने को जब बाद में बेचा जाता है, तब उस पर कैपिटल गेन टैक्स लागू होता है. ऐसे मामलों में होल्डिंग पीरियड और खरीद की लागत (कॉस्ट ऑफ एक्विजिशन) पिछली पीढ़ी के आधार पर तय की जाती है. यानी जिस व्यक्ति ने सोना खरीदा था उसकी खरीद की तारीख और कीमत को ही आपके लिए आधार माना जाता है. अगर सोना 1 अप्रैल 2001 से पहले खरीदा गया था तो 1 अप्रैल 2001 की फेयर मार्केट वैल्यू को कॉस्ट के रूप में लेने का विकल्प भी मिलता है.
गोल्ड ईटीएफ का क्या है हिसाब-किताब
गोल्ड ईटीएफ के मामले में एक साल से ज्यादा होल्ड करने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाता है. वहीं, गोल्ड सेविंग फंड्स को फिजिकल गोल्ड की तरह ट्रीट किया जाता है, यानी इनमें भी 24 महीने का नियम लागू होता है. सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज टैक्सेबल होता है लेकिन अगर इन्हें मैच्योरिटी पर आरबीआई के पास रिडीम किया जाता है तो उस पर होने वाला कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स फ्री होता है. हालांकि, अगर SGB को बीच में बाजार में बेचा जाता है, तो उस पर टैक्स गोल्ड ईटीएफ की तरह लगता है.
इसके अलावा, लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी में निवेश करके टैक्स से छूट भी ली जा सकती है. ऐसे में सही टैक्स प्लानिंग के जरिए निवेशक न केवल मुनाफा कमा सकते हैं, बल्कि टैक्स बोझ भी कम कर सकते हैं.
लेखक एक टैक्स और इंवेस्टमेंट एक्सपर्ट हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं. आप उन्हें jainbalwant@gmail.com पर या ट्विटर हैंडल @jainbalwant पर संपर्क कर सकते हैं.