नए लेबर कोड का आ गया डिटेल कैलकुलेशन, जानें अब सैलरी, भत्ते और ग्रेच्युटी कैसे होगी फिक्स, ड्राफ्ट जारी

कामकाजी लोगों की सैलरी संरचना को लेकर बड़ा बदलाव आने वाला है. वेतन, भत्तों और टर्मिनल बेनिफिट्स से जुड़े कुछ नियमों पर नई स्पष्टताएं सामने आई हैं, जिनका असर नौकरीपेशा लोगों की मासिक कमाई और भविष्य की वित्तीय सुरक्षा पर दिख सकता है.

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New Labour Code: भारत में कामकाजी लोगों की सैलरी, पीएफ, ग्रेच्युटी और भत्तों को लेकर लंबे समय से एक बड़ी असमंजस की स्थिति बनी हुई है. खासकर तब से, जब केंद्र सरकार ने चार नए लेबर कोड्स को पारित किया था, लेकिन उनके नियम अभी पूरी तरह लागू नहीं हुए . अब इस दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है. श्रम मंत्रालय ने बुधवार को नए लेबर कोड्स के तहत ड्राफ्ट रूल्स को प्री-पब्लिश कर दिया है और साथ ही इन पर FAQs भी जारी की हैं. इन ड्राफ्ट रूल्स के जरिए सरकार ने साफ करने की कोशिश की है कि नई व्यवस्था में आपकी सैलरी कैसे बनेगी, ‘wages’ की परिभाषा क्या होगी, 50% का नियम क्या है और ग्रेच्युटी की गणना आखिर किस आधार पर होगी.

इस स्ट्रक्चर का सीधा असर करोड़ों सैलरीड कर्मचारियों, कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स और कंपनियों की सैलरी स्ट्रक्चर पर पड़ने वाला है.

क्या हैं नए लेबर कोड्स और क्यों हैं अहम?

केंद्र सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को समेटकर चार नए लेबर कोड्स बनाए हैं. इनमें कोड ऑन वेजेज, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड शामिल हैं. सरकार का दावा है कि इन कोड्स का मकसद श्रम कानूनों को सरल बनाना, एक समान परिभाषाएं तय करना और कर्मचारियों को ज्यादा सामाजिक सुरक्षा देना है.

अब तक अलग-अलग कानूनों में ‘wages’ यानी वेतन की अलग-अलग परिभाषाएं थीं. कहीं बेसिक सैलरी को आधार माना जाता था, कहीं डीए को और कहीं कुल सैलरी को. नए लेबर कोड्स में पहली बार ‘वेतन’ की एक समान परिभाषा तय की गई है, जो चारों कोड्स पर लागू होगी.

ड्राफ्ट रूल्स क्यों किए गए प्री-पब्लिश

श्रम मंत्रालय ने नए लेबर कोड्स के तहत ड्राफ्ट रूल्स को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया है. स्टेकहोल्डर्स को 45 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां देने का मौका दिया गया है, जबकि इंडस्ट्रियल रिलेशंस रूल्स के लिए यह समय 30 दिन का है.

सरकार ने यह भी साफ किया है कि ट्रांजिशन पीरियड के दौरान पुराने नियम तब तक लागू रहेंगे, जब तक नए नियम औपचारिक रूप से नोटिफाई नहीं हो जाते, बशर्ते वे नए कोड्स के खिलाफ न हों.

‘वेतन’ की नई परिभाषा क्या कहती है

नए लेबर कोड्स के तहत ‘वेतन’ की परिभाषा सबसे अहम बदलावों में से एक है. सरकार के ड्राफ्ट में साफ किया गया है कि भत्ते में बेसिक पे, महंगाई भत्ता यानी डीए और रिटेनिंग अलाउंस (भत्ता) शामिल होंगे.

इसके अलावा एक अहम नियम जोड़ा गया है, जिसे आम भाषा में 50% नियम कहा जा रहा है. इसके मुताबिक, अगर किसी कर्मचारी की कुल सैलरी में वेतन और अन्य भुगतान का हिस्सा 50% से ज्यादा है, तो 50% से ऊपर की रकम को भत्ते में जोड़ दिया जाएगा.

इसका मतलब यह है कि कंपनियां अब बेसिक सैलरी को बहुत कम और अलाउंस को बहुत ज्यादा रखकर वैधानिक देनदारियों से नहीं बच पाएंगी. जिसका फायदा पीएफ और ग्रैच्युटी में मिलेगा.

50% अलाउंस नियम को आसान उदाहरण से समझिए

मान लीजिए किसी कर्मचारी की कुल मासिक सैलरी 76,000 रुपये है. इसमें बेसिक पे और डीए मिलाकर 20,000 रुपये हैं. बाकी रकम अलग-अलग अलाउंस के रूप में दी जा रही है.

नए नियम के मुताबिक कुल सैलरी का 50% यानी 38,000 रुपये तक ही अलाउंस (भत्ते) स्वीकार्य होगा. अगर मद इससे ज्यादा है, तो जो अतिरिक्त रकम है, उसे भत्ते में जोड़ दिया जाएगा.

इस उदाहरण में अगर भत्ता 40,000 रुपये हैं, तो 2,000 रुपये अतिरिक्त माने जाएंगे और इन्हें बेसिक और डीए में जोड़कर नया वेतन 22,000 रुपये माना जाएगा. इसी आधार पर पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य वैधानिक भुगतान की गणना होगी.

कौन-कौन से भुगतान, वेतन में शामिल नहीं होगा

ड्राफ्ट में यह भी साफ किया गया है कि कुछ भुगतान वेतन का हिस्सा नहीं होंगे. इनमें परफॉर्मेंस आधारित इंसेंटिव, ESOPs, वैरिएबल पे और रीइंबर्समेंट आधारित भुगतान शामिल हैं.

इसके अलावा लीव एनकैशमेंट को भी अलाउंस का हिस्सा नहीं माना गया है. यह स्पष्टता इसलिए जरूरी थी क्योंकि कंपनियों और कर्मचारियों के बीच इसको लेकर काफी भ्रम था.

ग्रेच्युटी की गणना में क्या बदलेगा

नए लेबर कोड्स में ग्रेच्युटी को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. वजह साफ है, ग्रेच्युटी एक ऐसा लाभ है जो लंबे समय की नौकरी के बाद एकमुश्त मिलता है और रिटायरमेंट प्लानिंग में बड़ी भूमिका निभाता है.

ड्राफ्ट रूल्स और FAQs में स्पष्ट किया गया है कि अब ग्रेच्युटी ‘लास्ट ड्रॉन वेजेज’ पर आधारित होगी, न कि केवल बेसिक सैलरी पर. और चूंकि वेजेज की परिभाषा में 50% नियम लागू होगा, इसलिए ग्रेच्युटी की राशि अपने आप बढ़ सकती है.

यानी जिन कर्मचारियों की सैलरी स्ट्रक्चर पहले मद-हैवी थी, उनके लिए ग्रेच्युटी का बेस बढ़ जाएगा.

ग्रेच्युटी कब से लागू होगी

एक बड़ा सवाल यह था कि नई ग्रेच्युटी व्यवस्था प्रॉस्पेक्टिव होगी या रेट्रोस्पेक्टिव. ड्राफ्ट में साफ कर दिया गया है कि ग्रेच्युटी का नया प्रावधान 21 नवंबर 2025 से लागू होगा, जो कि कोड के प्रभावी होने की तारीख है.

इसका मतलब है कि जो कर्मचारी 21 नवंबर 2025 या उसके बाद नौकरी छोड़ेंगे, उन्हें ग्रेच्युटी नई व्यवस्था के तहत मिलेगी.

ग्रेच्युटी कब देनी होगी

नई व्यवस्था के तहत ग्रेच्युटी निम्न स्थितियों में देय होगी – नौकरी समाप्त होने पर, रिटायरमेंट पर, इस्तीफे पर, मृत्यु या स्थायी अक्षमता की स्थिति में, फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट के खत्म होने पर और केंद्र सरकार द्वारा नोटिफाई किए गए अन्य मामलों में.

कुछ खास मामलों में पांच साल की सेवा पूरी करना जरूरी नहीं होगा, जैसे मृत्यु, अक्षमता या फिक्स्ड टर्म रोजगार की समाप्ति.

फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए बड़ा बदलाव

ICAI की ओर से जारी FAQs में एक अहम बात यह सामने आई है कि फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को अब एक साल की सेवा के बाद ही ग्रेच्युटी का हक मिलेगा.

पहले ग्रेच्युटी के लिए पांच साल की निरंतर सेवा जरूरी होती थी, लेकिन अब यह शर्त फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों पर लागू नहीं होगी. यह बदलाव खासतौर पर उन लाखों कर्मचारियों के लिए राहत की खबर है जो कॉन्ट्रैक्ट या फिक्स्ड टर्म आधार पर काम करते हैं.

कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा

नई वेजेज परिभाषा और ग्रेच्युटी नियमों का असर सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि कंपनियों की लागत और अकाउंटिंग पर भी पड़ेगा.

ICAI के मुताबिक, नई व्यवस्था से ग्रेच्युटी की देनदारी बढ़ेगी और कंपनियों को इसे अपने वित्तीय खातों में समय पर दिखाना होगा. अगर कोई कर्मचारी 21 नवंबर 2025 के बाद नौकरी छोड़ता है, तो बढ़ी हुई ग्रेच्युटी देनदारी को उसी अवधि के खातों में मान्यता देनी होगी.

ओवरटाइम में क्या बदलेगा, 48 घंटे से ज्यादा कम करने पर डबल मजदूरी

ड्राफ्ट रूल्स में ओवरटाइम को लेकर भी अहम प्रावधान किए गए हैं. सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम करने पर कर्मचारियों को दोगुनी मजदूरी देनी होगी. इसके अलावा लगातार 10 दिनों से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकेगा और बदले में रेस्ट डे देना अनिवार्य होगा.

40 साल से ज्यादा उम्र के कर्मचारियों के लिए कुछ सेक्टर्स में सालाना मेडिकल चेकअप, क्रेच सुविधा न होने पर न्यूनतम 500 रुपये प्रति बच्चा क्रेच मद और इंटर-स्टेट माइग्रेंट वर्कर्स के लिए जर्नी मद जैसे प्रावधान भी शामिल हैं.

कर्मचारियों के लिए इसका मतलब क्या है

सरल शब्दों में कहें तो नए लेबर कोड्स सैलरी को ज्यादा पारदर्शी बनाने की कोशिश हैं. आपकी सैलरी का बड़ा हिस्सा अब वेजेज के रूप में दिखेगा, जिससे पीएफ और ग्रेच्युटी जैसी सोशल सिक्योरिटी बढ़ेगी.

हालांकि इसका एक पहलू यह भी है कि टेक-होम सैलरी में तुरंत बड़ा बदलाव न दिखे, क्योंकि कंपनियां सैलरी स्ट्रक्चर को नए सिरे से डिजाइन कर सकती हैं. लेकिन लंबे समय में रिटायरमेंट और टर्मिनल बेनिफिट्स मजबूत होंगे.

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फिलहाल ये नियम ड्राफ्ट स्टेज में हैं और सुझावों के बाद इनमें बदलाव भी हो सकते हैं. लेकिन इतना तय है कि नई लेबर कोड व्यवस्था लागू होने के बाद सैलरी, वेजेज और ग्रेच्युटी को लेकर पुरानी सोच पूरी तरह बदल जाएगी. कर्मचारियों के लिए जरूरी है कि वे अपनी सैलरी स्लिप और सैलरी स्ट्रक्चर को समझें और यह जानें कि नई व्यवस्था में उन्हें क्या फायदा या बदलाव देखने को मिल सकता है.