जानें रिटायरमेंट प्लानिंग की वो चूक जो बाद में पड़ती हैं भारी!

रिटायर होने वालों से या रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके लोगों से बात करें, तो एक पैटर्न जल्दी दिख जाता है. बहुत कम लोग कहते हैं, मैंने एक बहुत बड़ी गलती कर दी. ज्यादातर लोग कहते हैं, मुझे लगा यह छोटी चीज है या हमने सोचा था एडजस्ट कर लेंगे. यही सोच धीरे-धीरे रिटायरमेंट प्लान को कमजोर कर देती है.

जानें रिटायरमेंट प्लानिंग की वो चूक जो बाद में पड़ती हैं भारी!
जब उम्र कम होती है, रिटायरमेंट की बात दूर की लगती है. घर खरीदना, बच्चों की जिम्मेदारी, जॉब में बदलाव, बेहतर लाइफस्टाइल—यह सब ज्यादा प्राथमिकता ले लेता है. 25 साल आगे की जिंदगी के बारे में सोचना जरूरी नहीं लगता. ऐसे में मुद्दा यह है कि रिटायरमेंट प्लानिंग में समय सबसे बड़ा हथियार होता है. अगर शुरुआती साल निकल गए, तो कंपाउंडिंग का फायदा कम हो जाता है. बाद में इसकी भरपाई करना संभव है, लेकिन उसकी कीमत ज्यादा बचत और ज्यादा दबाव होता है. ज्यादातर लोग यह बात अपने 40 की उम्र में महसूस करते हैं, जब नंबर देख कर लगता है कि अब चूक की गुंजाइश बहुत कम है. ज्यादातर लोगों ने रिटायरमेंट को जानबूझकर नहीं टाला, बस बाद में करेंगे करते-करते साल निकल गए.
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यह सबसे आम और सबसे नुकसानदेह सोच में से एक है. सच यह है कि हां, कुछ खर्च कम होते हैं, लेकिन कई खर्च चुपचाप बढ़ते भी हैं. उम्र बढ़ने पर हेल्थकेयर अधिक महंगी हो जाती है. इंश्योरेंस महंगा हो जाता है. समय मिलने के कारण ट्रैवल और शौक पर खर्च बढ़ जाता है. और महंगाई तो नौकरी के साथ नहीं रुकती.
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शुरुआत में जो लोग कम खर्च का अंदाजा लगाते हैं, उन्हें कुछ साल तक सब ठीक लगता है. फिर धीरे-धीरे चिंता शुरू होती है. पैसा खत्म नहीं होता, बस फैलना मुश्किल हो जाता है. किसी एक पेंशन, एक घर का किराया, एक बिजनेस या एक बड़ी निवेश राशि पर पूरा रिटायरमेंट निर्भर करना बहुत आसान और सुकून वाला लगता है. जब तक कि उस स्तंभ में दरार न आ जाए. किराया न मिलना, नियम बदल जाना, बिज़नेस स्लोडाउन या हेल्थ इश्यू—ये सब एक ही भरोसे को हिला सकते हैं. रिटायरमेंट वो समय होता है जब एक समस्या आपकी पूरी वित्तीय जमीन हिला दे, यह आप सबसे कम चाहेंगे. इसलिए अलग-अलग स्रोत बनाना कोई जटिलता नहीं, बल्कि सुरक्षा होती है.
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ऐसे में जैसे-जैसे रिटायरमेंट नजदीक आता है, डर निर्णायक भूमिका निभाने लगता है. लोग अपना पैसा पूरी तरह सुरक्षित विकल्पों में शिफ्ट कर देते हैं—कई बार जरूरत से कई साल पहले. यह जिम्मेदार और समझदारी भरा लगता है, लेकिन इसकी भी कीमत है. जो पैसा बहुत कम कमाता है, वह धीरे-धीरे अपनी वैल्यू खो देता है, क्योंकि महंगाई रुकती नहीं. रिटायरमेंट एक या पांच साल की बात नहीं है. कई लोगों के लिए यह 20 से 30 साल तक चलता है. गलती सावधान होने में नहीं है, बल्कि यह भूलने में है कि कुछ पैसे को आगे भी बढ़ना होता है.
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बहुत सारे लोग रिटायरमेंट की प्लानिंग अपने माता-पिता या दादा-दादी की उम्र देखकर करते हैं. लेकिन आज वह पैमाना वैसा काम नहीं करता जैसा पहले करता था. लोग अब ज्यादा लंबा जी रहे हैं, और काफी समय तक ऐसे स्वास्थ्य में रहते हैं जहां खर्च कम नहीं होते. अगर पैसा 65 की उम्र में खत्म होता है या 85 की उम्र में खत्म होता है, तो इन दोनों स्थितियों में फर्क जमीन-आसमान का होता है. लंबी उम्र को जोखिम की तरह देखना जरूरी है—सिर्फ उम्मीद की तरह नहीं. एडजस्टमेंट हमेशा संभव है, लेकिन धीरे-धीरे किया गया एडजस्टमेंट आसान होता है. छोटी गलतियों को शुरुआती सालों में ठीक करना दर्द नहीं देता. लेकिन रिटायरमेंट के नज़दीक पहुंचकर बड़ी गलतियों का सुधार डरावना और भारी लगता है.
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