भारत का रियल एस्टेट चमका, चीन का बाजार धड़ाम! 104 अरब डॉलर की ग्रोथ से मिली बड़ी सीख
भारत का रियल एस्टेट मार्केट 2025 में 13 अरब डॉलर बढ़कर 104 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि चाइना का प्रॉपर्टी मार्केट 18 अरब डॉलर घटकर 938 अरब डॉलर रह गया है. मजबूत डेवलपर बैलेंस शीट और इंस्टीट्यूशनल कैपिटल के चलते भारत की स्थिति बेहतर बनी हुई है, लेकिन हाउसिंग सेल्स में गिरावट और अनसोल्ड इन्वेंट्री में बढ़ोतरी चिंता का संकेत है.
Highlights
- भारत का रियल एस्टेट मार्केट 2025 में 13 अरब डॉलर बढ़कर 104 अरब डॉलर पहुंचा गया है.
- भारत के टॉप लिस्टेड डेवलपर्स का एवरेज नेट डेट-टू-इक्विटी रेशियो FY25 में घटकर 0.05 रहा.
- 2026 में हाउसिंग सेल्स 6% घटीं और अनसोल्ड इन्वेंट्री 10% बढ़ी है.
India Real Estate Market: भारत का रियल एस्टेट सेक्टर इस समय मजबूत ग्रोथ दिखा रहा है, लेकिन चीन के प्रॉपर्टी मार्केट का संकट भारतीय बाजार के लिए एक बड़ी चेतावनी भी है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत का प्रोफेशनली मैनेज्ड रियल एस्टेट मार्केट 13 अरब डॉलर बढ़कर 104 अरब डॉलर हो गया. इसके उलट चीन का प्रॉपर्टी मार्केट 18 अरब डॉलर घटकर 938 अरब डॉलर रह गया. यानी एक ही साल में दुनिया की 2 बड़ी इमर्जिंग इकोनॉमीज के रियल एस्टेट मार्केट्स ने बिल्कुल अलग दिशा में प्रदर्शन किया.
भारत और चीन के रियल एस्टेट मार्केट में बड़ा अंतर
एमएससीआई के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 38 मार्केट्स में से 35 के प्रोफेशनली मैनेज्ड रियल एस्टेट मार्केट में बढ़ोतरी हुई. चीन, हांगकांग और इंडोनेशिया ऐसे 3 मार्केट्स रहे, जहां गिरावट दर्ज की गई. चीन की ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल रियल एस्टेट मार्केट में हिस्सेदारी 7.69% से घटकर 6.96% रह गई. खास बात यह है कि चीन की हिस्सेदारी सिर्फ इसलिए कम नहीं हुई, क्योंकि दूसरे मार्केट्स तेजी से बढ़े, बल्कि वहां का रियल एस्टेट मार्केट वास्तव में सिकुड़ा.
भारत का ग्लोबल वेट 0.73% से बढ़कर 0.77% हो गया. हालांकि, इस दौरान रुपये में करीब 4.7% की कमजोरी भी आई. भारत का रियल एस्टेट मार्केट टर्नओवर रेशियो 7.7% रहा, जो ग्लोबल एवरेज 6.9% से ज्यादा है. इसके मुकाबले चीन का टर्नओवर रेशियो सिर्फ 3.8% रहा. इसका मतलब है कि भारतीय रियल एस्टेट एसेट्स में ट्रांजैक्शंस अपेक्षाकृत ज्यादा हो रहे हैं.
चीन में कैसे शुरू हुआ प्रॉपर्टी क्राइसिस
चीन का रियल एस्टेट डाउनटर्न 2020 में डेवलपर्स पर लेवरेज कम करने के लिए उठाए गए पॉलिसी मेजर्स से शुरू हुआ था. बाद में यह संकट काफी बड़ा हो गया. फरवरी 2026 में चीन के 70 बड़े शहरों में न्यू होम प्राइसेज सालाना आधार पर 3.2% गिरे. यह लगातार 32वां महीना था, जब कीमतों में गिरावट दर्ज की गई. 2026 के पहले 5 महीनों में रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट 16.2% घटा. इसी दौरान न्यू कंस्ट्रक्शन स्टार्ट्स 22.6% और कंप्लीशंस 23.4% कम हुए.
चीन की प्रॉपर्टी क्राइसिस के पीछे कई स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम्स थीं. एक बड़ी समस्या यह थी कि हाउसिंग स्टॉक का बड़ा हिस्सा ऐसे टियर-3 सिटीज में बनाया गया, जहां इनकम ग्रोथ धीमी थी और पॉपुलेशन बाहर जा रही थी. इसके अलावा कई लोकल गवर्नमेंट्स की रेवेन्यू के लिए लैंड सेल्स पर भारी निर्भरता थी. जब लैंड सेल्स कमजोर हुईं, तो म्यूनिसिपल फाइनेंसेज पर भी दबाव बढ़ गया.
एक और बड़ी समस्या प्री-सेल्स मॉडल से जुड़ी थी. बायर्स घर की डिलीवरी से काफी पहले पैसा दे देते थे और डेवलपर्स उस रकम का इस्तेमाल नए लैंड पार्सल्स खरीदने में करते थे. क्रेडिट कंडीशंस सख्त होने के बाद कई प्रोजेक्ट्स अटक गए और मॉर्गेज बॉयकॉट्स जैसी स्थिति सामने आई.
भारत में डेवलपर्स की बैलेंस शीट ज्यादा मजबूत
भारत और चीन के रियल एस्टेट सेक्टर में सबसे बड़ा अंतर डेवलपर्स की फाइनेंशियल पोजीशन में दिखाई देता है. भारत के टॉप लिस्टेड डेवलपर्स का एवरेज नेट डेट-टू-इक्विटी रेशियो FY25 में घटकर 0.05 रह गया, जो FY17 में 0.55 के पीक पर था. DLF ने FY26 में डेवलपमेंट बिजनेस में जीरो ग्रॉस डेट और नेट कैश सरप्लस की जानकारी दी. ओबेरॉय रियल्टी का ग्रॉस डेट-टू-इक्विटी रेशियो भी FY26 में घटकर 0.16 रह गया.
इसके अलावा भारत में रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट यानी RERA के तहत बायर्स से मिलने वाली रकम का 70% कंस्ट्रक्शन से जुड़े एस्क्रो अकाउंट्स में रखने का प्रावधान है. इसका उद्देश्य डेवलपर्स को बायर्स के पैसे का इस्तेमाल दूसरे प्रोजेक्ट्स या लैंड परचेजेज में करने से रोकना है.
लेकिन भारत के लिए खतरे की घंटी भी बज रही है
भारत की स्थिति चीन जैसी नहीं है, लेकिन हालिया आंकड़ों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 2026 की अप्रैल-जून क्वार्टर में टॉप 7 सिटीज में हाउसिंग सेल्स 90,715 यूनिट्स रही, जो सालाना आधार पर 6% और पिछली तिमाही के मुकाबले 11% कम है. दूसरी तरफ डेवलपर्स ने करीब 1,06,000 यूनिट्स लॉन्च कीं, जो 7% ज्यादा हैं. अनसोल्ड इन्वेंट्री भी 10% बढ़कर 6,16,000 यूनिट्स से ज्यादा हो गई.
खास चिंता प्रीमियम और लग्जरी हाउसिंग सेगमेंट में बढ़ती इन्वेंट्री को लेकर है. नाइट फ्रैंक इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, 20-50 करोड़ रुपये कीमत वाले होम्स के लिए क्वार्टर्स-टू-सेल 14.2 रहा, जबकि 50 करोड़ रुपये से ऊपर के होम्स के लिए यह 9.7 क्वार्टर था. इसका मतलब है कि हाई-एंड हाउसिंग में इन्वेंट्री को बिकने में ज्यादा समय लग रहा है.
रियल एस्टेट सेक्टर के लिए 5 बड़े सबक
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के अनुभव से भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि सिर्फ प्रॉपर्टी प्राइसेज को देखकर मार्केट की मजबूती का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए. इन्वेंट्री और सेल्स के बीच का गैप ज्यादा महत्वपूर्ण संकेतक हो सकता है. अगर सेल्स घट रही हों और सप्लाई लगातार बढ़ रही हो, तो आगे चलकर दबाव बन सकता है.
दूसरा सबक बायर्स के पैसे की सुरक्षा से जुड़ा है. RERA एस्क्रो व्यवस्था भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है, लेकिन इसका असर स्टेट-लेवल एनफोर्समेंट पर निर्भर करता है. तीसरा, डेवलपर्स को प्रीमियम हाउसिंग के पीछे जरूरत से ज्यादा भागने से बचना होगा. चौथा, लैंड टाइटलिंग, अप्रूवल टाइमलाइंस और इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन जैसे मुद्दों को समय रहते सुधारना जरूरी है.
कुल मिलाकर, भारत का रियल एस्टेट सेक्टर फिलहाल चीन की स्थिति से काफी अलग है. मजबूत डेवलपर बैलेंस शीट्स, RERA फ्रेमवर्क और इंस्टीट्यूशनल कैपिटल की बढ़ती भूमिका भारत को बेहतर स्थिति में रखती है. लेकिन 2026 में हाउसिंग सेल्स में गिरावट और अनसोल्ड इन्वेंट्री में बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि सेक्टर को सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखना होगा. चीन का अनुभव साफ बताता है कि रियल एस्टेट बूम के दौरान लिए गए गलत फैसलों का असर कई वर्षों तक रह सकता है.
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