Rajesh Exports Explained:15 लाख करोड़ की हेरा-फेरी! SEBI को कैसे हुआ शक, जानें मिसमैच की पूरी ABCD

SEBI के अंतरिम आदेश के बाद राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रमोटर राजेश मेहता गंभीर सवालों के घेरे में हैं. ₹15 लाख करोड़ से अधिक के कथित रेवेन्यू मिसमैच, फंड डायवर्जन और जांच में सहयोग न करने जैसे आरोपों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. जानिए पूरा मामला, LIC पर संभावित असर और आगे क्या हो सकता है.

राजेश एक्सपोर्ट मामला Image Credit: Money9 Live

भारत की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनिंग और एक्सपोर्ट कंपनियों में से एक, राजेश एक्सपोर्ट्स और इसके प्रमोटर व एग्जीक्यूटिव चेयरमैन राजेश मेहता इस समय एक बहुत बड़े कानूनी और वित्तीय संकट में घिर गए हैं. मार्केट रेगुलेटर सेबी ने कंपनी के खिलाफ एक कड़ा अंतरिम आदेश जारी किया है, जिसके बाद से शेयर बाजार और कॉर्पोरेट जगत में हड़कंप मच गया है.

इस पूरे मामले को बेहद आसान तरीके से समझने के लिए पेश है यह विशेष प्रश्नोत्तर (Q&A) रिपोर्ट:

प्रश्न 1: राजेश एक्सपोर्ट्स पर मुख्य रूप से क्या आरोप लगे हैं?

उत्तर: मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) ने राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रमोटर राजेश मेहता पर गंभीर आरोप लगाए हैं. मुख्य आरोपों में शामिल हैं:

  • वित्तीय हेराफेरी : कंपनी पर आरोप है कि उसने निवेशकों को लुभाने के लिए अपनी वित्तीय रिपोर्ट में बढ़ा-चढ़ाकर और झूठे आंकड़े पेश किए.
  • फंड की हेराफेरी: कंपनी के पैसों को प्रमोटर से जुड़े निजी खातों और संस्थाओं में बिना किसी उचित दस्तावेज या जानकारी के ट्रांसफर करने का आरोप है.
  • जांच में सहयोग न करना: आरोप है कि कंपनी ने फॉरेंसिक ऑडिटर्स और सेबी की जांच टीम को अपने मुख्य अकाउंटिंग सिस्टम (ERP) और बही-खातों का एक्सेस नहीं दिया.

प्रश्न 2: कंपनी के कामकाज को वित्तीय हेराफेरी क्यों माना जा रहा है?

उत्तर: इसके पीछे मुख्य कारण कागजी या गैर-वास्तविक लेन-देन (Non-genuine Transactions) का शक होना है. जांच में सामने आया कि वित्तीय वर्ष 2022 से 2024 के बीच, राजेश एक्सपोर्ट्स ने ‘एफ्लुएंस शेयर्स एंड स्टॉक्स प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी के साथ ₹11,486 करोड़ की बिक्री और ₹11,488 करोड़ की खरीदारी दिखाई. यह राशि कंपनी की कुल स्टैंडअलोन सेल-परचेज का लगभग 66% थी.

हैरानी की बात यह है कि ‘एफ्लुएंस’ ने ऐसे किसी भी बड़े लेन-देन से साफ इनकार कर दिया है. सेबी का मानना है कि प्रमोटर राजेश मेहता ने अपने पर्सनल गोल्ड डेरिवेटिव ट्रेड्स को कंपनी के खातों में दर्ज कर दिया, जिससे कंपनी का टर्नओवर असलियत से कहीं ज्यादा बड़ा दिखने लगा.

प्रश्न 3: यह प्रॉफिट और रेवेन्यू का मिसमैच आखिर क्या है?

उत्तर: यह इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा है. सेबी के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2021 से 2025 के बीच राजेश एक्सपोर्ट्स ने करीब ₹15.45 लाख करोड़ का कुल कंसोलिडेटेड रेवेन्यू दिखाया था. कंपनी ने हालिया रिपोर्ट्स में वित्त वर्ष 2024-25 में कंसोलिडेटेड स्तर पर करीब ₹4.23 लाख करोड़ का रेवेन्यू दिखाया था, जबकि शुद्ध लाभ मात्र ₹95 करोड़ था, जो रेवेन्यू का केवल ~0.02% है.

कंपनी का दावा था कि उसका 97% से 99% रेवेन्यू उसकी विदेशी सहायक कंपनियों जैसे स्विट्जरलैंड की ‘वैल्काम्बी ‘ और ‘ग्लोबल गोल्ड रिफाइनरीज (GGR)’ से आता है.

लेकिन जब सेबी ने वैल्काम्बी के ऑडिटेड स्टैंडअलोन खातों की जांच की, तो वहां रेवेन्यू बेहद कम मिला.

सेबी का प्रारंभिक अनुमान है कि सहायक कंपनियों के नाम पर दिखाया गया ₹15.15 लाख करोड़ का रेवेन्यू (जो कि कुल रेवेन्यू का लगभग 99.8% है) मिसमैच है और इसके समर्थन में कंपनी के पास कोई पुख्ता रिकॉर्ड या बिल मौजूद नहीं हैं.

प्रश्न 4: इस पूरे विवाद पर राजेश एक्सपोर्ट्स का क्या कहना है?

उत्तर: राजेश एक्सपोर्ट्स ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी सफाई में कहा है कि उनका वित्तीय लेखा-जोखा पूरी तरह सही है और यह स्थिति सिर्फ अकाउंटिंग की समझ के कारण पैदा हुई है.

कंपनी का कहना है कि सेबी ने स्विस सहायक कंपनी ‘वैल्काम्बी’ के कुल रेवेन्यू के बजाय केवल उसके ‘EBITDA’ (ऑपरेटिंग प्रॉफिट/मूल कमाई) को देख लिया है.

कंपनी के मुताबिक, वैल्काम्बी केवल प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को अपनी आय मानती है, जबकि ग्रुप लेवल पर सोने के पूरे लेन-देन की ग्रॉस वैल्यू को रेवेन्यू के तौर पर दर्ज किया जाता है. कंपनी का दावा है कि उन्होंने केवल रेवेन्यू दर्ज करने का तरीका बदला है, मुनाफे में कोई हेरफेर नहीं की.

प्रश्न 5: क्या इस मामले में टैक्स चोरी की संभावना भी निकलती है?

उत्तर: हालांकि सेबी का मुख्य काम शेयर बाजार के नियमों और निवेशकों के हितों की रक्षा करना है, लेकिन जिस तरह से ₹15 लाख करोड़ से अधिक के रेवेन्यू का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है और फंड को प्रमोटर के निजी खातों में डायवर्ट करने के आरोप लगे हैं, उससे टैक्स चोरी (Tax Evasion) और मनी लॉन्ड्रिंग की गंभीर आशंकाएं पैदा होती हैं.

अगर रेवेन्यू और इनवॉइस फर्जी पाए जाते हैं, तो आने वाले समय में इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियां भी इस मामले में अपनी जांच शुरू कर सकती हैं.

प्रश्न 6: क्या इस मामले में आरबीआई (RBI) की तरफ से भी कोई सख्ती हो रही है?

उत्तर: वर्तमान में मुख्य एक्शन सेबी द्वारा लिया गया है. सेबी ने अपने अंतरिम आदेश के तहत प्रमोटर राजेश मेहता पर कंपनी के शेयरों और प्रतिभूतियों में ट्रेडिंग करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है.

चूंकि यह मामला विदेशों में स्थित सहायक कंपनियों (क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शंस) और भारी-भरकम फंड ट्रांसफर से जुड़ा है, इसलिए FEMA नियमों के उल्लंघन को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और विदेशी मुद्रा नियामक भी आने वाले समय में बैंकिंग रूट्स और ओवरसीज रेमिटेंस (विदेश भेजे गए पैसे) की कड़ाई से स्क्रूटनी कर सकते हैं.

प्रश्न 7: शेयर मार्केट के इंवेस्टर इस कंपनी के हाथों कैसे धोखे में रहे?

उत्तर: निवेशक किसी भी कंपनी में पैसा उसके बड़े रेवेन्यू और ग्लोबल साइज को देखकर लगाते हैं. राजेश एक्सपोर्ट्स खुद को दुनिया की सबसे बड़ी सोने की रिफाइनर कंपनियों में से एक बताती थी.

निवेशकों ने कंपनी की कंसोलिडेटेड फाइनेंशियल रिपोर्ट (जिसमें ₹15 लाख करोड़ से ज्यादा का बिजनेस दिख रहा था) पर भरोसा किया, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता था कि इस रेवेन्यू के पीछे कोई पुख्ता दस्तावेजी सबूत या डेटा ही मौजूद नहीं है. सेबी के इस आदेश के आते ही निवेशकों का भरोसा टूटा और कंपनी के शेयर लगातार 5% के लोअर सर्किट पर आ गए, जिससे निवेशकों को भारी वित्तीय नुकसान हुआ है.

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प्रश्न 8: क्या LIC के ग्राहकों पर इसका कोई असर पड़ेगा?

उत्तर: हां, इसका परोक्ष असर हो सकता है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश की सबसे बड़ी सरकारी बीमा कंपनी LIC की राजेश एक्सपोर्ट्स में 10.80% की बड़ी हिस्सेदारी है.

जब सेबी का आदेश आया, तो राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयर गिरने के साथ-साथ LIC के शेयरों में भी गिरावट देखी गई. चूंकि LIC अपने ग्राहकों से मिलने वाले प्रीमियम के पैसे का एक हिस्सा शेयर बाजार में निवेश करती है, इसलिए जब उसके किसी बड़े पोर्टफोलियो स्टॉक की वैल्यू घटती है, तो इसका असर LIC के कुल मुनाफे और ग्राहकों को मिलने वाले बोनस या रिटर्न पर थोड़ा-बहुत पड़ सकता है. हालांकि, LIC का कुल फंड इतना विशाल है कि किसी एक कंपनी के डूबने से ग्राहकों की पॉलिसी पूरी तरह असुरक्षित नहीं होती.