पेट्रोल की कीमत
भारत में पेट्रोल की कीमतें सिर्फ कच्चे तेल से तय नहीं होतीं, बल्कि टैक्स स्ट्रक्चर इसका सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है. पेट्रोल की कीमत में बेस प्राइस, फ्रेट, डीलर कमीशन, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्यों का VAT शामिल होता है. कई राज्यों में टैक्स जोड़ने के बाद पेट्रोल की कीमत का करीब 45% से 55% हिस्सा टैक्स ही होता है.इस समय देश के पेट्रोल की कीमतें मेट्रो शहरों ₹97.77 से लेकर ₹108.74 प्रति लीटर के बीच बनी हुई है. हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और टैक्स बोझ के कारण फिर दबाव बढ़ा है. पिछले 15 साल में पेट्रोल की कीमतों में कई बड़े बदलाव आए. 2010 में पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया गया, जिसके बाद कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार तय होने लगीं. 2014 के बाद केंद्र सरकार ने कई बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई. 2020 में कोविड काल के दौरान पेट्रोल पर टैक्स रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया. वहीं 2021-22 में रूस-यूक्रेन युद्ध और महंगे क्रूड ऑयल के कारण कई शहरों में पहली बार पेट्रोल ₹100 प्रति लीटर के पार चला गया . भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. देश अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. भारत हर दिन करीब 55 लाख बैरल से ज्यादा कच्चे तेल की खपत करता है, जबकि घरेलू उत्पादन काफी कम है. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती खपत का सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार घाटे पर पड़ता है.महंगे पेट्रोल का असर आम लोगों की जेब से लेकर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाद्य पदार्थ, ऑनलाइन डिलीवरी, टैक्सी और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं. इससे महंगाई बढ़ती है और लोगों की बचत व खर्च करने की क्षमता प्रभावित होती है.
करीब चार साल बाद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है. बावजूद इसके, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां ईंधन की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़े हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है. इसी वजह से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक तेल कंपनियों को पिछले साल जैसी स्थिति में लौटने के लिए ईंधन की कीमतों में करीब 16 फीसदी तक और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है.