₹3 की बढ़ोतरी तो बस एक ट्रेलर…कीमतें और बढ़ने की गुंजाइश; सरकार और तेल कंपनियों पर अभी इतना बोझ
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है. इसी वजह से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक तेल कंपनियों को पिछले साल जैसी स्थिति में लौटने के लिए ईंधन की कीमतों में करीब 16 फीसदी तक और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है.
Petrol-Diesel Price may Hike More: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल का असर अब भारत में भी साफ दिखाई देने लगा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा के स्तर लगातार मेंटेन किए हुए है. जिसका असर भारत में 4 साल बाद कीमतों में बढ़ोतरी के रुप में दिखा है. तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर का इजाफा कर दिया है. लेकिन क्या बढ़ोतरी पर्याप्त है, या फिर कंपनियों ने धीरे-धीरे कीमतों का बोझ डालने की रणनीति अपनाई है. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कंपनियों अभी जिस लागत में कच्चा तेल खरीद रही है. उसकी भरपाई केवल 3 रुपये बढ़ोतरी से नहीं हो सकती है.
ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आई तो तेल कंपनियों को भारी नुकसान से बचाने के लिए पेट्रोल-डीजल के दामों में और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक तेल कंपनियों को पिछले साल जैसी स्थिति में लौटने के लिए ईंधन की कीमतों में करीब 16 फीसदी तक और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है.
क्यों बढ़ रही है चिंता
15 मई को पेट्रोल और डीजल के दाम ₹3 प्रति लीटर बढ़ाए गए थे. यह पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद पहली बड़ी बढ़ोतरी थी. इसके बाद दिल्ली में पेट्रोल ₹97.77 और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर पहुंच गया. लेकिन इसके बावजूद तेल कंपनियों पर दबाव बना हुआ है. जुलाई 2025 में भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत करीब 71 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर करीब 114 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है. यानी कच्चे तेल की कीमतों में 61 फीसदी तक उछाल आ चुका है.

कितना नुकसान उठा रही सरकार और तेल कंपनियां
रिपोर्ट के अनुसार, तेल कंपनियां और सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को फिलहाल स्थिर रखने के लिए हर दिन करीब ₹1000 करोड़ का नुकसान उठा रही हैं. यानी एक तिमाही में यह नुकसान ₹1 लाख करोड़ से भी ज्यादा पहुंच चुका है. रिपोर्ट के अनुसार:
- 3 रुपए प्रति लीटर की हालिया बढ़ोतरी से पहले पेट्रोल पर करीब ₹26 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹81.90 प्रति लीटर तक का घाटा हो रहा था.
- इससे चालू वित्त वर्ष में सरकार और तेल कंपनियों की इनकम पर करीब ₹1 लाख करोड़ का असर पड़ सकता है.
रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई परेशानी
- डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भी तेल आयात को महंगा बना दिया है.
- पहले जहां 1 डॉलर की कीमत करीब ₹87 थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब ₹95 तक पहुंच गई है.
- इससे विदेश से तेल खरीदने की लागत और ज्यादा बढ़ गई है.
- सरकार फिलहाल पेट्रोल पर कस्टम और एक्साइज ड्यूटी नहीं ले रही है, इसलिए तेल कंपनियां कीमतों का बड़ा बोझ खुद उठा रही हैं.
अगर तेल कंपनियों को पिछले साल जैसी कमाई और स्थिति में वापस जाना है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अभी करीब 16% तक और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.
आखिर 16% बढ़ोतरी की गुंजाइश क्यों
- जुलाई 2025 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब $71 प्रति बैरल थी.
- मई 2026 तक यही कीमत बढ़कर $114 प्रति बैरल पहुंच गई. यानी करीब 61% की तेजी आ चुकी है.
- रुपये में देखें तो भारत के लिए तेल खरीदने की लागत और ज्यादा बढ़ी है.
- पहले एक बैरल कच्चे तेल की कीमत करीब ₹6,208 पड़ रही थी, जो अब बढ़कर ₹10,810 हो गई है. यानी करीब 74% का उछाल.
- पेट्रोल की बेस कीमत ₹52 से बढ़कर ₹78 प्रति लीटर पहुंच चुकी है, लेकिन इसके बावजूद तेल कंपनियों पर दबाव बना हुआ है.
- सरकार ने जनता को राहत देने के लिए एक्साइज ड्यूटी 10 रुपए की कटौती कर दी. यानी सरकार अब पहले जैसा टैक्स नहीं ले रही.
- इसके बावजूद तेल कंपनियां बढ़ती लागत का बड़ा हिस्सा खुद उठा रही हैं.
- कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के अनुसार अगर कच्चे तेल की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹25 से ₹28 प्रति लीटर तक बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.
अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और तेल कंपनियों को पुराने मुनाफे के स्तर पर लौटना है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब 16% तक और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है. यानि अभी जो ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है, वह पूरी राहत देने के लिए काफी नहीं मानी जा रही. आगे भी कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बना रह सकता है.
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