सेकेंडो में चीजें जोड़ने वाला Fevi Kwik अपनी ही बोतल में क्यों नहीं चिपकता? द्वितीय विश्व युद्ध से है कनेक्शन, जानें वजह
फेवीक्विक या क्विक फिक्स जैसे इंस्टेंट ग्लू कुछ ही सेकंड में टूटी हुई चीजों को जोड़ देते हैं. कई बार तो गलती से हमारी उंगलियां भी आपस में चिपक जाती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतना ताकतवर ग्लू अपनी ही बोतल या ट्यूब के अंदर क्यों नहीं चिपकता? आइए जानते हैं इसके पीछे का दिलचस्प विज्ञान.

घर में कोई चीज टूट जाए तो ज्यादातर लोग तुरंत फेवीक्विक या क्विक फिक्स जैसे इंस्टेंट ग्लू का सहारा लेते हैं. ये ग्लू इतने ताकतवर होते हैं कि कुछ ही सेकंड में टूटी हुई चीजों को मजबूती से जोड़ देते हैं. कई बार तो जरा सी लापरवाही में हमारी उंगलियां भी आपस में चिपक जाती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो ग्लू हवा के संपर्क में आते ही चुटकियों में चीजों को जोड़ देता है, वह अपनी ही बोतल या ट्यूब के अंदर क्यों नहीं चिपकता? आखिर ऐसा क्या खास होता है कि महीनों तक पैक रहने के बावजूद यह लिक्विड रूप में बना रहता है? इस दिलचस्प सवाल का जवाब विज्ञान और खास पैकेजिंग तकनीक में छिपा है, जो ग्लू को उसकी बोतल के अंदर जमने से बचाती है.
ग्लू को सेकंडों में चिपकाने वाला खास केमिकल
इंस्टेंट ग्लू में साइनोएक्रिलेट (Cyanoacrylate) नाम का एक खास कैमिकल होता है. यही केमिकल ग्लू को बेहद तेजी से काम करने की ताकत देता है. जैसे ही यह हवा के संपर्क में आता है, हवा में मौजूद नमी और पानी के साथ रिएक्ट करके सख्त हो जाता है और चीजों को मजबूती से जोड़ देता है.
बोतल के अंदर क्यों नहीं जमता ग्लू?
बोतल के अंदर ग्लू क्यों नहीं जमता है? इस सवाल का जवाब इसकी पैकेजिंग में छिपा है. ग्लू को ऐसी स्पेशल बोतलों या ट्यूबों में भरा जाता है, जिनके अंदर नमी नहीं पहुंच पाती. पैकिंग के समय भी यह सुनिश्चित किया जाता है कि बोतल के भीतर नमी की मात्रा बेहद कम रहे. नमी नहीं होने के कारण साइनोएक्रिलेट रिएक्ट नहीं कर पाता और ग्लू लिक्विड रूप में बना रहता है.
बोतल खुली छोड़ने पर क्या होता है?
जब ग्लू की बोतल लंबे समय तक खुली छोड़ दी जाती है, तब हवा और नमी अंदर पहुंचने लगती हैं. इसके बाद साइनोएक्रिलेट रिएक्शन शुरू कर देता है और धीरे-धीरे ग्लू जमने लगता है. यही कारण है कि पुरानी या खुली हुई ग्लू की ट्यूब अक्सर सूख जाती है. दिलचस्प बात यह है कि साइनोएक्रिलेट की खोज द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई थी, जब वैज्ञानिक पारदर्शी सामग्री विकसित करने की कोशिश कर रहे थे. उसी दौरान इस चिपकाने वाले रसायन का पता चला था.
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