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Prashant Srivastav

करीब 18 साल से पत्रकारिता जगत से नाता बना हुआ है। और इस दौरान मीडिया की सभी विधाओं यानी डिजिटल, टेलीविजन, प्रिंट, मैगजीन में काम करने का मौका मिला। इस समय money9live.com में टीम लीड के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। करियर का पहला ब्रेक ईटीवी से टेलीविजन के जरिए हुआ। यहां पर टेलीविजन पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का मौका मिला। इसके बाद अगला पड़ाव दिल्ली स्थित दैनिक भास्कर समूह का बिजनेस भास्कर रहा। यहां से बिजनेस पत्रकारिता में कदम रखा। और यह सफर वित्त मंत्रालय की रिपोर्टिंग से लेकर बैंकिंग, इंश्योरेंस, ऑटो, एफएमसीजी, एमएमएमई, टेलीकॉम सेक्टर की ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर कॉरपोरेट जगत की खबरें और इकोनॉमी से जुड़ी खबरों से गुजरते हुए अमर उजाला, मनी भास्कर वेबसाइट से होकर आउटलुक मैगजीन और टाइम्स नाउ हिंदी डिजिटल तक पहुंचा।

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Prashant Srivastav

इस बार 35 साल पुराने जैसे हालात नहीं दिखते हैं. बीते 35 साल में भारत का खाड़ी देशों के साथ रिश्ता बदल चुका है. भारत बदल चुका है. खाड़ी देशों में भारतीयों की पहचान बदल चुकी है. खाड़ी देश अब केवल भारतीयों के काम करने के ठिकाने नहीं है. बल्कि वह लाखों लोगों के घर बन चुके हैं. जहां भारतीय प्रवासी, यूएई, सउदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन जैसे देशों की इकोनॉमी के मजबूत स्तंभ बन गए हैं.

AI अब सिर्फ तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का नया पैमाना बन चुका है. AI सेमीकंडक्टर, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा और प्रतिभा के चार स्तंभों पर टिका है. इस इकोसिस्टम में आज तीन देश निर्णायक भूमिका में हैं. सबसे आगे अमेरिका और चीन है. जबकि भारत ने भी इस रेस में अहम पायदान पर पहुंच चुका है.

वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत के किसान पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं. ऐसे में जब पर्दा पूरी तरह उठेगा और समझौते की बारीकियां सामने आएंगी, तब यह और साफ होगा कि यह समझौता भारत के लिए अवसर है या भारतीय कृषि के लिए एक कठिन परीक्षा.

क्षेत्रीय एयरलाइंस और छोटे शहरों को जोड़ने वाले रूट भारत में एक शानदार बाजार हो सकते हैं. सरकार की मदद एवं नई मंजूरी इस दिशा में अच्छा कदम लगता है. लेकिन सिर्फ जुगाड़ और तात्कालिक उपायों से एयरलाइंस नहीं चलतीं. वरना नई कंपनियां भी आसमान में उड़ने का सिर्फ सपना ही देखती रह जाएंगी.

2009 के आम चुनावों में यूपीए-2 की सत्ता में वापसी की सबसे बड़ी वजह नरेगा बन गया था. शुरुआत में मोदी सरकार इसे यूपीए की असफलता का स्मारक कहती थी. लेकिन करीब 20 साल अब योजना को नए कलेवर में पेश किया जा रहा है.

इंडिगो इस समय चौतरफा संकट से जूझ रही है. ऐसे में लगता है कि फाउंडर राहुल भाटिया को इस समय दोस्त राकेश गंगवाल की कमी सबसे ज्यादा महसूस हो रही होगी. गंगवाल को दुनिया के सबसे प्रभावशावी एयरलाइन मैनेजर में से एक माना जाता है. और उन्होंने कंपनी को देश की नंबर वन एयरलाइन बनाने में अपने इसी अनुभव को झोका है.

अफरातफरी का आलम ऐसा है कि जैसे कि एयरपोर्ट पर लॉकडाउन लग गया हो. जी हां ये सब देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के मिसमैनेजमेंट से हो रहा है. वो भी एक ऐसी लापरवाही के लिए जिसकी जिम्मेदार वह खुद है.साफ है कि किसी भी सेक्टर में एकाधिकार खतरनाक हो सकता है और जिस तरह इंडिगो के कस्टमर बंधक बन गए, वैसा ही हाल दूसरी सेवाओं के कस्टमर के साथ कभी भी हो सकता है.

बिहार नतीजे के बाद विपक्ष यह सोचने पर मजबूर होगा कि उसकी कांग्रेस के साथ आने वाले विधानसभा चुनावों में रणनीति क्या होनी चाहिए? इसके अलावा कांग्रेस को अंदरूनी विरोधों का भी सामना करना पड़ेगा. ऐसे में राजनीति का मिजाज बदलना तय है.

बैलेंस शीट से संबंध तय करने के दौर में महात्मा गांधी कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं. क्योंकि जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ के जरिए संरक्षणवाद की नीति अपना रखी है. ऐसे में 1930 और 1940 का वह खतरनाक दौर फिर उभर के सामने आ रहा है.

पाकिस्तान सरकार को अब ऐसे फैसले लेने पड़ रहे हैं. जो उसके लिए किसी गुलामी से कम नहीं है. आईएमएफ के दबाव में शहबाज शरीफ सरकार ने पिछले 50 साल से चली आ रही, फसलों पर दी जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था को खत्म करने का फैसला कर लिया है.