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AI में नंबर 1 बनने की रेस! Apple और Nvidia में टक्कर, किस कंपनी का पलड़ा है भारी?

Apple और Nvidia के बीच दुनिया की सबसे कीमती कंपनी बनने की होड़ जारी है. एक ओर जहां एनवीडिया चिप्स बनाकर एआई क्रांति को गति दे रही है तो वहीं दूसरी ओर एपल कम खर्च में एआई को किराए पर लेकर मजबूत कैश फ्लो बना रही है. कुल मिलाकर दोनों कंपनियों का लक्ष्य तो एक ही है लेकिन दोनों कंपनियों का नजरिया अलग-अलग है.

एपल Image Credit: Klaudia Radecka/NurPhoto via Getty Images

Highlights

  • फिर से शुरू हो गई सबसे कीमती कंपनी बनने की रेस.
  • पहले एपल आगे तो अब एनवीडिया.
  • एपल और एनवीडिया का एआई बूम को देखने का तरीका अलग-अलग.

Apple की नई कमाई ने दुनिया की सबसे कीमती कंपनी की रेस को फिर से शुरू कर दिया है, कुछ समय के लिए यह Nvidia से आगे निकल गई, लेकिन कुछ दिनों बाद AI चिपमेकर ने फिर से ताज हासिल कर लिया. बदलती रैंकिंग से एक और बहस शुरू हो गई है कि कौन सी कंपनी ज्यादा कीमती है, वह कंपनी जो Big Tech के बड़े AI खर्च से बाहर है या वह कंपनी जो इसे बढ़ावा दे रही है? दुनिया की ये दो सबसे कीमती कंपनियां एआई बूम को अलग-अलग तरीके से देख रही हैं.

Apple vs Nvidia: दो अलग कंपनियां-दो अलग नजरिए

एपल ग्राहकों के लिए आईफोन, मैक और बाकी दूसरे डिवाइस बनाती है जिनका इस्तेमाल अरबों लोग एआई चैटबॉट और दूसरे एआई टूल इस्तेमाल करने के लिए करते हैं लेकिन कंपनी को लेकर ये कहा जाता रहा है कि एआई की दौड़ में एपल पीछे छूट गई है.

वनकैप के को-फाउंडर और CEO संदीप नांबियार कहते हैं, इस साल एप्पल कैपेक्स पर 11 बिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा खर्च करेगी, जिसमें जून तिमाही में 3.4 बिलियन डॉलर शामिल है, जबकि इसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च करती हैं. एपल AI कैपेसिटी बनाने के बजाय उसे किराए पर ले रहा है.

इन्वेस्टर्स को एपल का तरीका पसंद है क्योंकि इससे अच्छा कैश फ्लो मिलता है, जबकि AI कंपनियों को आज डेटा सेंटर्स पर अरबों खर्च करने पड़ते हैं और इन्वेस्टमेंट वापस पाने के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है. नांबियार कहते हैं, हालांकि, इसकी एक कीमत है. अगर एआई वह लेयर बन जाता है जिसके साथ लोग असल में जुड़े रहते हैं, तो इसे किराए पर लेने का मतलब है अपना भविष्य किराए पर देना.

क्या है Nvidia का सोचना?

ये कंपनी ग्रोथ बिग टेक खर्च पर निर्भर करती है. एनवीडिया एआई को पावर देने के लिए चिप्स और डेवलपर टूल बनाती है. यह टेक्नोलॉजी के भविष्य के लिए जरूरी है लेकिन इसके साथ आने वाली अनिश्चितता के प्रति कंपनी बेहद संवेदनशील है.

वनकैप बॉस का कहना है कि एनवीडिया के साथ रिस्क यह है कि इसका रेवेन्यू दूसरों के चेक लिखने पर निर्भर करता है. लेकिन, लोग इस बात को कम आंकते हैं कि जीपीयू इस्तेमाल हो जाते हैं, वे हमेशा के लिए नहीं रहते. पिछली तिमाही में माइक्रोसॉफ्ट के कैपेक्स का दो-तिहाई हिस्सा सीपीयू और जीपीयू जैसे कम समय के एसेट्स में चला गया. आज एनवीडिया की कीमत यह मानकर चलती है कि रिप्लेसमेंट साइकिल कई सालों तक पूरी स्पीड से चलता रहेगा.

स्ट्रेटेजी अलग-अलग लेकिन लक्ष्य एक

दोनों कंपनियों की प्रोफाइल बहुत अलग है, एनवीडिया AI क्रांति ला रही है, जबकि एपल सीधे कंज्यूमर्स तक AI पहुंचाने पर फोकस कर रही है. VTMarkets के ग्लोबल स्ट्रेटेजी ऑपरेशंस लीड, रॉस मैक्सवेल कहते हैं, इससे एक स्ट्रेटेजी दूसरी से बेहतर नहीं हो जाती, यह बस अलग-अलग नजरिए देती है.

वैल्यूएशन की खींचतान: किसका पलड़ा भारी?

दोनों एक्सपर्ट्स का कहना है कि टॉप स्पॉट के लिए रेस काफी हद तक रोटेशनल है. दोनों कंपनियां आने वाले कई सालों तक टेक लीडर बनी रहेंगी, बस उनके तरीके अलग-अलग होंगे. एपल की ताकत भरोसेमंद कैश फ्लो बनाने में है, जबकि Nvidia का मौका AI कंप्यूटिंग के लगातार विस्तार से जुड़ा है. नांबियार कहते हैं, लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन पर यह अंतर सिर्फ़ 2 से 3 फीसदी है, इसलिए एक मजबूत कमाई रिपोर्ट आसानी से रैंकिंग बदल सकती है.

हालांकि, मैक्सवेल को लगता है कि इन्वेस्टर्स के बीच एपल का पलड़ा भारी है. इन्वेस्टर अक्सर ऐसे बिजनेस की तरफ जाते हैं जिनकी कमाई का अंदाजा ज्यादा होता है और कैपिटल की जरूरत कम होती है. इसलिए, एपल का डिसिप्लिन्ड तरीका उन इन्वेस्टर्स को पसंद आ सकता है जो स्टेबिलिटी चाहते हैं, भले ही एनवीडिया लंबे समय तक मज़बूत ग्रोथ देता रहे.

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