Airtel के नए पोस्टपेड प्लान में ऐसा क्या? जिससे निकला नेट न्यूट्रैलिटी का जिन्न, Vi ने भी कसा तंज; क्या हो गई चूक?
Bharti Airtel के नए ‘Priority Postpaid’ प्लान ने भारत के टेलीकॉम सेक्टर में नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर नई बहस छेड़ दी है. एयरटेल का दावा है कि ज्यादा पैसे देने वाले ग्राहकों को भीड़भाड़ वाले इलाकों में बेहतर 5G स्पीड मिलेगी.
Airtel priority postpaid controversy: भारत के टेलीकॉम सेक्टर में एक बार फिर बड़ा घमासान शुरू हो गया है. इस बार लड़ाई डेटा पैक्स या सस्ते प्लान्स की नहीं, बल्कि ‘इंटरनेट के अधिकार’ की है. भारती एयरटेल (Airtel) द्वारा लॉन्च किए गए ‘प्रायोरिटी पोस्टपेड’ प्लान ने पूरी इंडस्ट्री में खलबली मचा दी है. इस प्लान के तहत ज्यादा पैसे देने वाले प्रीमियम ग्राहकों को भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी तेज और स्थिर 5G नेटवर्क देने का दावा किया जा रहा है. एयरटेल के इस दांव पर वोडाफोन आइडिया (Vi) ने तीखा पलटवार करते हुए “एवरीवन मैटर्स” (हर कोई मायने रखता है) कैंपेन शुरू कर दिया है. वीआई का साफ कहना है कि डिजिटल इंडिया में हर ग्राहक बराबर है, तो फिर नेटवर्क में भेदभाव क्यों?
क्या है एयरटेल और वोडाफोन का विवाद?
विवाद की जड़ एयरटेल की नई ‘प्रायोरिटी पोस्टपेड’ सेवा है. एयरटेल अपने उन ग्राहकों को बेहतर नेटवर्क एक्सपीरियंस दे रहा है जो ज्यादा पैसे चुकाते हैं. इसके लिए कंपनी 5G की एडवांस ‘नेटवर्क स्लाइसिंग’ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है.
इस पर वोडाफोन आइडिया (Vi) ने गंभीर सवाल उठाए हैं. Vi के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर अवनीश खोसला का कहना है कि भारत का डिजिटल विकास सबको साथ लेकर चलने और सस्ते नेटवर्क पर टिका है. यूजर की प्रोफाइल या जेब देखकर उसे बेहतर स्पीड देना डिजिटल समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है. Vi ने बिना नाम लिए एयरटेल पर तंज कसा कि उनके लिए हर ग्राहक प्रायोरिटी है, चाहे वह प्रीपेड हो या पोस्टपेड.
एयरटेल को क्यों देनी पड़ रही है सरकार को सफाई?
यह मामला अब दूरसंचार विभाग (DoT), ट्राई (TRAI) और संसद की स्थायी समिति तक पहुंच चुका है. दरअसल, भारत में ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ (Net Neutrality) के कड़े नियम हैं, जो कहते हैं कि इंटरनेट पर किसी भी यूजर या कंटेंट के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. 2020 में भी एयरटेल और वीआई ने 4G नेटवर्क पर ऐसी कोशिश की थी, जिसे ट्राई ने ‘क्लास के भीतर क्लास’ बनाने की बात कहकर रुकवा दिया था. अब सरकार यह जांच कर रही है कि क्या 5G नेटवर्क पर ज्यादा पैसे वालों को तरजीह देना नेट न्यूट्रैलिटी का उल्लंघन है? क्या इससे आम या प्रीपेड ग्राहकों का नेटवर्क खराब होगा?
सफाई में एयरटेल ने क्या तर्क दिए?
मामला बढ़ने पर एयरटेल के एमडी और सीईओ शाश्वत शर्मा ने दूरसंचार विभाग (DoT) के पैनल के सामने कंपनी का पक्ष रखा. एयरटेल ने नेट न्यूट्रैलिटी के उल्लंघन के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए ये बातें कहीं:
- कंटेंट में कोई भेदभाव नहीं: एयरटेल ने कहा कि यह सेवा ‘कंटेंट-न्यूट्रल’ है. हम किसी ऐप को ब्लॉक नहीं कर रहे हैं, न ही किसी खास ऐप की स्पीड कम या ज्यादा कर रहे हैं.
- प्रीपेड ग्राहकों को नुकसान नहीं: कंपनी के मुताबिक, इस समय पीक आवर्स (जब नेटवर्क पर सबसे ज्यादा लोड होता है) में भी कुल 5G क्षमता का सिर्फ 38% इस्तेमाल हो रहा है. इसमें पोस्टपेड ग्राहकों का हिस्सा महज 4% से 6% होगा. बाकी का 60% हिस्सा प्रीपेड और सामान्य ग्राहकों के लिए पूरी तरह खाली है, इसलिए उनकी सेवा पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
- तकनीक पर रोक लगी तो भुगतेगा देश: एयरटेल ने दलील दी कि ‘नेटवर्क स्लाइसिंग’ 5G की मुख्य ताकत है और दुनिया के कई देशों में इसका इस्तेमाल हो रहा है. अगर भारत में इस एडवांस तकनीक को रोकने की कोशिश की गई, तो देश में भविष्य की 6G संभावनाओं को भारी नुकसान पहुंचेगा.
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रिलायंस जियो का क्या है रुख?
देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो ने इस मामले पर बीच का रास्ता चुना है. जियो ने संसदीय पैनल से कहा कि 5G नेटवर्क स्लाइसिंग से नेट न्यूट्रैलिटी का उल्लंघन नहीं होता, बशर्ते आम जनता के लिए इंटरनेट की क्वालिटी खराब न हो. हालांकि, जियो ने यह भी जोड़ा कि कंपनियों को ऐसे प्लान कमर्शियली लॉन्च करने से पहले दूरसंचार विभाग (DoT) से मंजूरी जरूर लेनी चाहिए.
फिलहाल गेंद सरकार और रेगुलेटर्स के पाले में है. फैसला जो भी हो, लेकिन इसने 5G के दौर में इंटरनेट की समानता पर एक नई बहस जरूर छेड़ दी है.
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