Crude Oil महंगा होने के बावजूद क्यों चढ़ रहा है US Dollar? समझिए पूरा मामला
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक बाजारों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकी डॉलर मजबूत हो रहा है. सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग, ऊंची ब्याज दरों की उम्मीद और अमेरिका की ऊर्जा ताकत डॉलर को वैश्विक मुद्रा बाजार में और मजबूत बना रही है.
Crude Oil Surge and Dollar Strength: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है. एक तरफ कच्चे तेल की कीमतें (90 डॉलर के पार) तेजी से बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर (डॉलर इंडेक्स 100 के करीब) भी मजबूत हो रहा है. आम तौर पर तेल की कीमतें बढ़ने पर डॉलर पर दबाव पड़ता है, लेकिन इस बार स्थिति अलग है. विशेषज्ञों के मुताबिक भू-राजनीतिक संकट, सुरक्षित निवेश की मांग और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति जैसे कई कारण डॉलर को मजबूत बना रहे हैं.
डॉलर इंडेक्स में तेज बढ़त
शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर इंडेक्स करीब 99.30 के स्तर तक पहुंच गया. पूरे सप्ताह में इसमें करीब 1.3 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जो नवंबर 2024 के बाद सबसे बड़ी साप्ताहिक तेजी है.
डॉलर इंडेक्स दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की ताकत को मापता है. जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक डॉलर को सुरक्षित विकल्प मानते हैं और उसमें निवेश बढ़ाते हैं. डॉलर के मजबूत होने से कई बड़ी वैश्विक मुद्राओं पर दबाव देखा गया. यूरो करीब 1.161 डॉलर के आसपास स्थिर रहा, लेकिन पूरे सप्ताह में इसमें लगभग 1.7 प्रतिशत की गिरावट की आशंका है.
जापानी येन 0.2 प्रतिशत गिरकर 157.83 प्रति डॉलर पर पहुंच गया. वहीं ब्रिटिश पाउंड मामूली बढ़त के साथ 1.3358 डॉलर पर रहा. इस बीच भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ और पहली बार 92.03 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया.
क्यों मजबूत हो रहा है अमेरिकी डॉलर
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है. आम तौर पर ऐसे समय में निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड खरीदते हैं, लेकिन इस बार डॉलर इंडेक्स में भी तेजी देखने को मिली है.
रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से ऊर्जा आधारित महंगाई बढ़ने की आशंका है. इससे बाजार को उम्मीद है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रख सकता है. इसी वजह से 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड भी 4 प्रतिशत से ऊपर चली गई है.
तेल की कीमतों में तेज उछाल
अमेरिका-ईरान तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है. इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी है. ब्रेंट क्रूड की कीमत एक सप्ताह में करीब 70.84 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 93.60 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, यानी लगभग 24 प्रतिशत की तेजी.
अमेरिका को ऊर्जा निर्यात का फायदा
दूसरी बड़ी वजह अमेरिका की ऊर्जा स्थिति मानी जा रही है. कई यूरोपीय और एशियाई देशों के विपरीत अमेरिका अब ऊर्जा का शुद्ध निर्यातक बन चुका है. इसलिए तेल की कीमतें बढ़ने से जहां आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, वहीं अमेरिका को इससे अपेक्षाकृत फायदा मिल सकता है. यही कारण है कि संकट के दौरान डॉलर और मजबूत दिखता है.
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तेल और डॉलर का रिश्ता बदल रहा है
इतिहास में अक्सर देखा गया है कि तेल और डॉलर के बीच उल्टा संबंध होता है, यानी तेल महंगा होने पर डॉलर कमजोर होता है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आज वैश्विक वित्तीय बाजारों और ऊर्जा व्यापार की बदलती संरचना के कारण कई बार दोनों साथ-साथ भी मजबूत हो सकते हैं.
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