नोएल टाटा की बड़ी जीत, तीन दशक पुराना शेयर ट्रांसफर विवाद खत्म; कारोबार पर कंट्रोल होगा मजबूत
हाल के महीनों में टाटा ग्रुप के स्टेकहोल्डर्स के बीच कंट्रोल को लेकर झगड़ा शुरू होने पर शेयरों के ट्रांसफर का मामला उठा था. तीन दशक से भी अधिक पुराने इस शेयर ट्रांसफर विवाद का मामला अब खत्म हो गया है.
Highlights
- तीन दशक से भी अधिक पुराना शेयर ट्रांसफर विवाद.
- यह ट्रांजैक्शन 18 जनवरी, 1989 को ऑफिशियली पूरा हुआ था.
- नोएल टाटा को शेयर ट्रांसफर से सीधे फायदा.
महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने 1989 में नवलजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) द्वारा नवल एच. टाटा को टाटा संस के 833 शेयर ट्रांसफर करने के मामले की जांच बंद कर दी है. कमिश्नर ने पाया कि यह ट्रांजैक्शन उस समय लागू कानूनों के प्रावधानों का पूरी तरह पालन करते हुए किया गया था. इस तरह, तीन दशक से भी अधिक पुराने इस शेयर ट्रांसफर विवाद का मामला अब खत्म हो गया है.
विरासत में मिले शेयरों से जुड़ा मामला
हाल के महीनों में टाटा ग्रुप के स्टेकहोल्डर्स के बीच कंट्रोल को लेकर झगड़ा शुरू होने पर शेयरों के ट्रांसफर का मामला उठा था. शिकायत करने वालों का मानना था कि यह कदम टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा को मुश्किल में डालने के लिए उठाया गया था, क्योंकि यह मामला उन्हें विरासत में मिले शेयरों से जुड़ा था.
यह फैसला नोएल टाटा के लिए राहत की बात होगी, क्योंकि चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने 2027 की शुरुआत में अपना कार्यकाल खत्म होने पर पद छोड़ने का फैसला किया है, जिससे नोएल टाटा के लिए बिजनेस एम्पायर पर अपना कंट्रोल मजबूत करने का रास्ता साफ हो गया है.
कानून का हुआ पालन
ET की रिपोर्ट के अनुसार, 2 सितंबर के एक आदेश में राज्य चैरिटी कमिश्नर अमोघ एस. कलोटी ने कहा कि ट्रस्ट ने यह साबित कर दिया है कि बिक्री टैक्स से जुड़े कारणों से जरूरी थी, इसके लिए सही कागजात और वैल्यूएशन मौजूद थे, और उस समय लागू कानूनों का पालन किया गया था.
इस मामले में नहीं मिली राहत
हालांकि, इस आदेश से राज्य के रेगुलेटर द्वारा सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) पर लगाई गई रोक नहीं हटती है. मई में चैरिटी कमिश्नर ने महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की धारा 36A(1) के तहत यह रोक लगाई थी. यह कार्रवाई SRTT बोर्ड के गठन और एक्ट की धारा 30A(2) का पालन न करने की शिकायतों के बाद की गई थी.
यह धारा बोर्ड में हमेशा रहने वाले या आजीवन ट्रस्टियों की तय संख्या से जुड़ी एक अहम बात है. हाल ही में कानून में किए गए एक बदलाव के तहत, पब्लिक ट्रस्ट बोर्ड में काम करने वाले स्थायी ट्रस्टियों की संख्या पर कानूनी सीमा तय कर दी गई है.
क्यों बेचे गए थे शेयर?
चैरिटी कमिश्नर ने पाया कि 1989 में शेयर बेचने का फैसला न तो अचानक लिया गया था और न ही मनमाना था. ट्रस्ट ने 1984 में ही शेयर बेचने पर विचार करना शुरू कर दिया था, क्योंकि इनकम टैक्स एक्ट में हुए एक बदलाव से उन चैरिटेबल ट्रस्ट के टैक्स-फ्री स्टेटस पर खतरा मंडराने लगा था, जिनके पास ऐसी सिक्योरिटीज थीं जो तय निवेश की लिस्ट में शामिल नहीं थीं.
इसके बाद सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस ने नवंबर 1988 में NRTT को नेशनल ट्रस्ट के तौर पर मान्यता देने से मना कर दिया, जिससे ट्रस्ट पर टाटा संस में उसके शेयर पर टैक्स की देनदारी आ गई.
कानूनी मजबूरी
आदेश में कहा गया, ‘जरूरत का होना असल में तथ्यों पर आधारित एक सवाल है. इसलिए, इसे उस समय के तथ्यों और हालात के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. इस अथॉरिटी का मानना है कि NRTT का यह पक्ष सही है कि शेयरों का ट्रांसफर एक बाहरी कानूनी मजबूरी की वजह से करना पड़ा था, जिससे ट्रस्ट के टैक्स-फ्री स्टेटस और कॉर्पस (मूल पूंजी) को खतरा था. इसलिए इसे स्वीकार किया जा सकता है.’
ऑर्डर के मुताबिक, ट्रस्ट के रिकॉर्ड में सिर्फ असेसमेंट ईयर 1986-87 से 1988-89 के लिए 4.23 लाख रुपये की संभावित टैक्स देनदारी दिखाई गई. चैरिटी कमिश्नर ने कहा कि टैक्स देनदारी से बचने और ट्रस्ट के पैसे को बचाने के लिए शेयर बेचने की जरूरत पड़ी.
टाटा परिवार के पास ही रहे शेयर
यह ऑर्डर इस बात को भी अहमियत देता है कि नवल टाटा ने 1 जनवरी, 1988 से NRTT के ट्रस्टी के तौर पर इस्तीफा दे दिया था. चैरिटी कमिश्नर ने बताया कि इस्तीफे की जानकारी असिस्टेंट चैरिटी कमिश्नर को दी गई थी और बदलाव की रिपोर्ट फरवरी 1990 में मान ली गई थी.
इसके बाद, जाने-माने वकील नानी ए. पालखीवाला ने इस प्रस्तावित सौदे की जांच की. दिसंबर 1988 में अपनी राय में पालखीवाला ने कहा कि नवल टाटा के शेयर खरीदने पर कोई कानूनी रोक नहीं थी, क्योंकि वे अब ट्रस्टी नहीं थे. उन्होंने सलाह दी कि यह बिक्री उनके इस्तीफे के एक साल बाद होनी चाहिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ शर्तें भी सुझाईं कि शेयर टाटा परिवार के पास ही रहें.
कितनी तय की गई थी शेयर की कीमत
वेल्थ-टैक्स के मकसद से तय की गई वैल्यूएशन के आधार पर, हर शेयर की कीमत 1,914 रुपये तय की गई थी. इसके बाद नवल टाटा उस कीमत पर 833 शेयर खरीदने के लिए सहमत हो गए और परिवार के बाहर उनके ट्रांसफर पर लगी शर्तों को भी मान लिया.
यह ट्रांजैक्शन 18 जनवरी, 1989 को ऑफिशियली पूरा हुआ. शेयर ट्रांसफर फॉर्म में कुल 15.94 लाख रुपये की रकम दर्ज थी, जबकि ट्रस्ट की बैलेंस शीट में बिक्री से 8.15 लाख रुपये का प्रॉफिट दिखाया गया था. चैरिटी कमिश्नर ने बताया कि ट्रांसफर को टाटा संस बोर्ड ने भी मंजूरी दे दी थी और जरूरी डॉक्यूमेंट्स भी इसके सपोर्ट में थे.
कैसे और कब बढ़ा विवाद?
1989 में हुए शेयर ट्रांसफर को लेकर विवाद तब और बढ़ गया जब टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन विजय सिंह ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर को पत्र लिखकर NRTT से दिवंगत उद्योगपति नवल एच. टाटा को शेयर ट्रांसफर किए जाने की स्वतंत्र जांच की मांग की. उन्होंने कहा, ‘चूंकि शेयर ट्रांसफर से सीधे फायदा पाने वाले नोएल टाटा अभी टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं, इसलिए यह माना जा सकता है कि उनके द्वारा इनकार किए जाने से हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट-ऑफ-इंटरेस्ट) की स्थिति पैदा होती है.’
यह रिक्वेस्ट सिंह को मिले एक लीगल नोटिस के बाद आई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह ट्रांजैक्शन पब्लिक चैरिटेबल एसेट्स को प्राइवेट हाथों में गैर-कानूनी तरीके से ट्रांसफर करने जैसा है.
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