4 महीने बाद FPI की जोरदार वापसी, क्या अब नई रिकॉर्ड रैली शुरू होगी?

लगातार चार महीनों की बिकवाली के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने जुलाई में भारतीय शेयर बाजार में 20,200 करोड़ रुपये का निवेश किया. अब कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति आगे बाजार की दिशा तय करेंगी.

एफपीआई

Highlights

  • जुलाई में FPI ने खरीदारी फिर शुरू की
  • क्रूड ऑयल कीमतें बाजार दिशा तय करेंगी
  • फेड की नीति निवेशकों पर असर डालेगी

लगातार चार महीनों तक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने जुलाई 2026 में एक बार फिर खरीदारी का रुख अपनाया है. नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में एफपीआई ने भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया. इससे बाजार में सकारात्मक माहौल बना और सेंसेक्स तथा निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक जुलाई के दौरान 2% से अधिक मजबूत हुए.

हालांकि, पूरे कैलेंडर वर्ष 2026 की बात करें तो विदेशी निवेशक अब भी भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर निकासी कर चुके हैं. ऐसे में बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई की खरीदारी एक सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन आगे इसका सिलसिला जारी रहेगा या नहीं, यह दो प्रमुख वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगा.

कच्चे तेल और अमेरिकी फेड की नीति पर रहेगी नजर

विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले महीनों में एफपीआई के निवेश की दिशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति की होगी.

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं तो भारत का आयात बिल और चालू खाते का घाटा (CAD) सीमित रहेगा. इससे महंगाई पर दबाव कम होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहेगी, जो विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक स्थिति मानी जाती है.

वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी फेडरल रिजर्व यदि ब्याज दरों को स्थिर रखता है या भविष्य में कटौती के संकेत देता है तो उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है. लेकिन यदि अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो निवेशकों का झुकाव अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर बढ़ सकता है.

मजबूत आर्थिक संकेतकों ने बढ़ाया भरोसा

विश्लेषकों का कहना है कि भारत के मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक संकेतकों, कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों, आरबीआई की स्थिर मौद्रिक नीति और घटती महंगाई ने भी विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. इसके अलावा, भारत के सरकारी बॉन्ड्स के वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने से डेट मार्केट में भी विदेशी निवेश बढ़ा है.

निवेशकों के लिए क्या है संदेश?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई में एफपीआई की वापसी भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन निवेशकों को केवल विदेशी निवेश के आधार पर फैसले नहीं लेने चाहिए. कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम, डॉलर इंडेक्स और अमेरिकी फेड की अगली नीति पर नजर रखना जरूरी होगा. यदि ये कारक अनुकूल बने रहते हैं, तो विदेशी निवेश का प्रवाह आगे भी जारी रह सकता है और इससे भारतीय शेयर बाजार को अतिरिक्त मजबूती मिल सकती है.

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