प्याज-अदरक से लेकर खाना पकाने के तेल तक… सबकुछ हुआ महंगा, आखिर क्यों बढ़ रहे खाने-पीने की चीजों के दाम?

भारत में खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों को समझने के लिए पारंपरिक 'थाली' से बेहतर कुछ नहीं हो सकता. यह एक ऐसी आम भोजन है जिसमें देश में रोजाना खाई जाने वाली कई चीजें एक ही प्लेट में परोसी जाती हैं. इन चीजों की बढ़ती कीमतें घरों के बजट पर भारी पड़ रही हैं.

भारत में खाद्य पदार्थों की महंगाई Image Credit: sorbetto/DigitalVision Vectors/Getty Images

Highlights

  • खाने-पीने की चीजें देश में महंगाई बढ़ाने वाली मुख्य वजह बन गई हैं.
  • इन चीजों की बढ़ती कीमतें घरों के बजट पर भारी पड़ रही हैं.
  • मॉनसून की बारिश इस समस्या के साफ संकेतों में से एक है.

देश में महंगाई की दरें उछली हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर भार बढ़ गया है. बढ़ती महंगाई ने आर्थिक बजट को तो हिलाकर रख ही दिया है, साथ ही किचन का हिसाब-किताब भी गड़बड़ा गया है. इस साल हर महीने खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ी है और इस बढ़ोतरी का असर ब्याज दरों पर पड़ेगा, क्योंकि देश का सेंट्रल बैंक हेडलाइन कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (खुदरा महंगाई दर) को टारगेट करता है.

भारत में खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों को समझने के लिए पारंपरिक ‘थाली’ से बेहतर कुछ नहीं हो सकता. यह एक ऐसी आम भोजन है जिसमें देश में रोजाना खाई जाने वाली कई चीजें एक ही प्लेट में परोसी जाती हैं.

इन चीजों की बढ़ती कीमतें घरों के बजट पर भारी पड़ रही हैं. कुछ ग्रामीण परिवारों के महीने भर के खर्च का लगभग आधा हिस्सा और शहरों में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा खाने-पीने पर खर्च होता है. कई तरह के चटपटे व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाली प्याज की कीमत एक साल पहले की तुलना में लगभग 50 फीसदी बढ़ गई है.

वेजिटेबल ऑयल और अदरक की कीमत

अगस्त के लेटेस्ट कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के अनुसार, स्ट्रीट स्नैक्स तलने में इस्तेमाल होने वाले वेजिटेबल ऑयल की कीमतें भी बढ़ रही हैं और स्वाद के लिए जरूरी अदरक की कीमत में 70 फीसदी से ज्यादा का उछाल आया है।.

खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों के पीछे के कारण को ब्लूमबर्ग ने बताया है. दरअसल, सालाना मॉनसून सामान्य से कमजोर रहा है, जिससे खेत सूखे रह गए हैं. एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बायोफ्यूल का प्रोडक्शन बढ़ाने की कोशिशों के कारण अनाज का इस्तेमाल दूसरी तरफ हो रहा है. साथ ही, ईरान और यूक्रेन में चल रहे युद्धों के कारण दुनिया भर में फसल और फ्यूल की कीमतें बढ़ रही हैं.

महंगाई की मुख्य वजहें

इस वजह से खाने-पीने की चीजें देश में महंगाई बढ़ाने वाली मुख्य वजह बन गई हैं. यह रिटेल महंगाई बास्केट का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा हैं. अगस्त में महंगाई की दर सेंट्रल बैंक की टारगेट रेंज के ऊपरी स्तर के करीब पहुंच गई. यह दूसरे देशों के लिए भी आने वाले समय का संकेत हो सकता है, क्योंकि कई देश संघर्षों और खराब मौसम के असर से जूझ रहे हैं. दूसरी तरफ इस साल ‘अल नीनो’ ने इसे और बढ़ा दिया है.

ब्लूमबर्ग के अनुसार, बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने कहा, ‘आपस में जुड़ी दुनिया में सप्लाई कोई समस्या नहीं है, लेकिन कीमतों को लेकर समस्याएं होंगी.’

मॉनसून की कम बारिश

इस महीने खत्म होने वाली मॉनसून की बारिश इस समस्या के साफ संकेतों में से एक है. जून में शुरू होने के बाद से बारिश सामान्य से 15 फीसदी कम हुई है और मौसम विभाग ने सितंबर में भी बारिश कम रहने का अनुमान लगाया है. बारिश की कमी का संबंध ‘अल नीनो’ मौसम की घटना से है, जो देश में सूखे के लिए जानी जाती है.

इससे चावल से लेकर सोयाबीन, मक्का और गन्ना जैसी फसलों की पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है. चावल और मक्के की बुआई पिछले सीज़न की तुलना में 3 फीसदी से ज्यादा पीछे चल रही है और अब बहुत कम समय बचा है. साथ ही, कमी की आशंका के कारण अगस्त में घरेलू चीनी की कीमतों में भी तेजी आई है. इस वजह से सरकार को बिना ड्यूटी के चीनी आयात की इजाजत देनी पड़ी. यह एक ऐसे देश के लिए असामान्य कदम है जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है.

क्वांटइको (QuantEco) की अर्थशास्त्री युविका सिंघल के अनुसार, कम बारिश वाले वर्षों में सामान्य बारिश के मुकाबले हर एक फीसदी की कमी का मतलब है खाने-पीने की चीजों की महंगाई में लगभग 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी.

इथेनॉल-ब्लेंडिंग

बायोफ्यूल पॉलिसी भी इसमें भूमिका निभा रही है. देश ने 2030 के लिए तय 20 फीसदी इथेनॉल-ब्लेंडिंग के लक्ष्य को 2025 तक आगे बढ़ा दिया है, जिससे हजारों फ्यूल स्टेशनों पर बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है. इस पॉलिसी के कारण गन्ने के साथ-साथ मक्के और चावल की मांग भी फीडस्टॉक (कच्चे माल) के तौर पर बढ़ गई है.

सबनवीस ने कहा कि इससे खाने-पीने की चीजों और पशु-चारे की घरेलू सप्लाई और कम हो सकती है, क्योंकि अगर इथेनॉल बनाने वालों से ज्यादा कीमत मिलती है तो किसान अपनी फसलें उन्हें ही बेचना पसंद करेंगे.

महंगा हुआ खाना-पकाना

खाना पकाना भी महंगा हो गया है. इस साल की शुरुआत में वेस्ट एशिया में संघर्ष के कारण भारत को खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाली लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की कमी का सामना करना पड़ा था. नोएडा (दिल्ली के पास) में एक छोटा रेस्टोरेंट चलाने वाले एक शख्स ने बताया कि LPG की कीमतें बढ़ने के बाद उन्होंने भी दाम बढ़ा दिए थे, लेकिन अब सामान की लागत बढ़ने के कारण मेन्यू के दाम और बढ़ाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है. उनके बिजनेस का मुकाबला आस-पास की आधा दर्जन फूड कार्ट से है, जो कम कीमत पर रोटी के साथ सब्जी या दाल बेचती हैं.

उन्होंने कहा, ‘हम अपने दाम नहीं बढ़ा सकते क्योंकि ग्राहक आना बंद कर देंगे.’

दीवाली में मिठास होगी महंगी

यह स्थिति इसलिए भी खास तौर पर अहम है, क्योंकि इसी समय भारत में त्योहारों का मौसम शुरू हो रहा है, जो नवंबर में हिंदुओं के रोशनी के त्योहार ‘दीवाली’ पर खत्म होगा. इस दौरान खाने-पीने की चीजों की खपत बढ़ जाती है. चीनी और खाना पकाने के तेल की मांग सबसे अधिक होती है, क्योंकि लोग पारंपरिक मिठाइयां, तली-भुनी चीजें और दूसरी पकवान ज्यादा खाते हैं.

सबनवीस के अनुसार, इस साल हर महीने खाने-पीने की चीजों की महंगाई (फूड इन्फ्लेशन) बढ़ी है. इसका असर ब्याज दरों पर भी पड़ेगा, क्योंकि देश का सेंट्रल बैंक हेडलाइन कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (महंगाई दर) को टारगेट करता है. अगस्त में महंगाई दर बढ़कर दिसंबर 2024 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई और लगातार तीसरे महीने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के 4% के मीडियम-टर्म टारगेट से ऊपर रही.

बढ़ सकती हैं ब्याज दरें

सेंट्रल बैंक ने अल नीनो को खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों के लिए एक बड़ा खतरा बताया है और साल की शुरुआत से ही ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि अक्टूबर में ही ब्याज दरें बढ़ने की संभावना ज़्यादा है.

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने CNBC TV18 को दिए एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि महंगाई अब उतनी मामूली नहीं रही.

RBI की अगस्त की बैठक के मिनट्स में उन्होंने कहा था, ‘हमें सतर्क रहने की भी जरूरत है क्योंकि खाने-पीने की चीज़ों, ईंधन और दूसरी इनपुट लागतों के बढ़ने से महंगाई में व्यापक बढ़ोतरी और उम्मीदों के अनियंत्रित होने का खतरा बना हुआ है.’ अगर इन खतरों के सच होने का कोई सबूत मिलता है, तो पॉलिसी को सख्त करने की जरूरत पड़ सकती है.

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