पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते भारतीय एविएशन सेक्टर को लग सकता है 18000 करोड़ का झटका, रेस्टोरेंट सेक्टर में भी तनाव बढ़ा

इस व्यवधान का असर पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी और रेस्टोरेंट व्यवसायों पर भी पड़ रहा है, जबकि घरेलू मांग अभी भी कुछ हद तक सहारा दे रही है. एविएशन सेक्टर को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है. एयरलाइंस एयरस्पेस पर लगी पाबंदियों, उड़ानों के रद्द होने और लंबे रास्तों से जूझ रही हैं.

एविएशन सेक्टर. Image Credit: CANVA

भारत का एविएशन सेक्टर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है. इससे अनुमानित 18,000 करोड़ का नुकसान हो सकता है और आने वाले पर्यटकों की संख्या में 15–20 फीसदी की भारी गिरावट का अनुमान है. इस व्यवधान का असर पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी और रेस्टोरेंट व्यवसायों पर भी पड़ रहा है, जबकि घरेलू मांग अभी भी कुछ हद तक सहारा दे रही है.

ईटी ने PHD चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) की एक रिपोर्ट के हवाले से लिखा, ‘पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत के पर्यटन, एविएशन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर असर’ नाम की यह रिपोर्ट फ्लाइट ऑपरेशन में रुकावटों, बदलते ट्रैवल पैटर्न और बढ़ती लागत की ओर इशारा करती है. वहीं दूसरी ओर, घरेलू मांग कुछ हद तक सहारा देती रहती है.

एविएशन सेक्टर को सबसे बड़ा झटका

एविएशन सेक्टर को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है. एयरलाइंस एयरस्पेस पर लगी पाबंदियों, उड़ानों के रद्द होने और लंबे रास्तों से जूझ रही हैं, क्योंकि वेस्ट एशिया के अहम कॉरिडोर – जो दुनिया के सबसे व्यस्त कॉरिडोर में से हैं – में रुकावटें आ रही हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, ‘इन रुकावटों की वजह से खास रूट्स पर उड़ान का समय 2–4 घंटे बढ़ गया है, जिससे ईंधन की खपत और ऑपरेशनल खर्चों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, एयरलाइन के ऑपरेशनल खर्चों में ईंधन का हिस्सा 35-40% होता है और मौजूदा हालात ने एयरलाइन के मुनाफे पर और भी ज्यादा दबाव डाल दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया के हवाई रास्तों में आई रुकावट, जो दुनिया के सबसे व्यस्त ट्रांजिट रूट्स में से एक है, की वजह से कनेक्टिविटी की एफिशिएंसी में भी कमी आई है और हवाई किराया भी बढ़ गया है.’

आउटबाउंड पैटर्न में बदलाव

इनबाउंड पर्यटन में काफी गिरावट आई है, खासकर लेजर (मनोरंजन) सेगमेंट में, क्योंकि भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच दुनिया भर के यात्री ज्यादा सतर्क रवैया अपना रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी पर्यटकों के आगमन में 15–20% की गिरावट का अनुमान है.

आउटबाउंड यात्रा के रुझान भी बदल रहे हैं. भारतीय यात्री थाईलैंड, सिंगापुर और वियतनाम जैसे कम दूरी वाले डेस्टिनेशन को ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जबकि लंबी दूरी वाले रूट और ज्यादा ट्रांजिट वाले यात्रा कार्यक्रमों की मांग में कमी आई है.

मार्जिन पर दबाव

घरेलू यात्रा की वजह से होटलों में ऑक्यूपेंसी तो बनी हुई है, लेकिन उन्हें मार्जिन को लेकर दबाव का सामना करना पड़ रहा है. बढ़ती एनर्जी लागत, इनपुट की ज्यादा कीमतें और अंतरराष्ट्रीय मांग में उतार-चढ़ाव- खास तौर पर प्रीमियम और बिजनेस सेगमेंट में जो विदेशी मेहमानों पर निर्भर हैं- मुनाफे पर भारी पड़ रहे हैं.

रेस्टोरेंट सेक्टर में तनाव बढ़ा

रेस्टोरेंट और फ़ूड सर्विसेज़ सेक्टर में अलग-अलग तरह के रुझान देखने को मिल रहे हैं. नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) से मिली जानकारी के आधार पर इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि इनपुट लागत 10–15% बढ़ गई है. इसकी मुख्य वजह आयातित सामग्री, लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा पर होने वाला खर्च है. बड़े टूरिस्ट हब में मौजूद प्रीमियम डाइनिंग आउटलेट्स और होटलों में बने रेस्टोरेंट में विदेशी पर्यटकों की आवाजाही में कमी देखी गई है.

इसके साथ ही, घरेलू खपत और फूड डिलीवरी, जो संगठित कंपनियों के रेवेन्यू का 20–30% हिस्सा हैं, इस सेक्टर को कुछ हद तक सहारा दे रहे हैं. हालांकि, छोटे ऑपरेटरों पर मार्जिन में कमी का दबाव बना हुआ है.

बाहरी झटकों के बावजूद, घरेलू पर्यटन इस सेक्टर के लिए स्थिरता का मुख्य जरिया बना हुआ है. स्टेकेशन्स, कम दूरी की छुट्टियों वाली यात्राएं, बिजनेस के साथ-साथ घूमने-फिरने वाली यात्राएं और नए अनुभवों वाले डाइनिंग जैसे यात्रा के नए चलन, सभी सेगमेंट में मांग को बढ़ावा दे रहे हैं.

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