अपने ऑल टाइम हाई से कितना पीछे कच्चा तेल, जानें जब होता है युद्ध तो कितने बढ़ जाते हैं दाम
इतिहास बताता है कि कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ मांग और सप्लाई से नहीं, बल्कि युद्ध, राजनीति और आर्थिक संकट से भी तय होती हैं. साल 2026 में कीमतें 118 डॉलर तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन इससे पहले भी कई बार तेल के दाम रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचे हैं. आइए जानते हैं कब-कब.
Crude oil Price History: दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें हमेशा से राजनीति, युद्ध और आर्थिक हालात पर निर्भर रही हैं. साल 2026 में हालात एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं. अमेरिका और इजरायल की ईरान पर सैन्य कार्रवाई, उसके बाद जवाबी हमले और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से बाजार में घबराहट फैल गई है. इसका असर सीधा गैस और कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ा है. कतर के रास लाफान एलएनजी प्लांट और सऊदी अरब के रास तनुरा रिफाइनरी जैसे बड़े ऊर्जा सेंटरों पर हमलों से दुनिया की करीब एक-पांचवां सप्लाई प्रभावित हुई है. हमले से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 70 डॉलर थी, जो आज यानी 19 मार्च 2026 को बढ़कर 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. लेकिन सवाल ये है कि क्या यह इतिहास की सबसे ज्यादा कीमत है? इसका जवाब है नहीं. इससे पहले भी कई बार तेल के दाम रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचे हैं. आइए जानते हैं कब-कब.
साल 2022 का रूस-यूक्रेन वार के बाद बड़ा उछाल
कोविड महामारी के दौरान 2020 में तेल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से नीचे चली गई थीं. एक समय WTI क्रूड माइनस 37.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था. लेकिन जैसे ही दुनिया खुली, मांग बढ़ी और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध ने बाजार को झटका दिया. इस दौरान ब्रेंट क्रूड 139.13 डॉलर और WTI 130.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो करीब चार दशक का सबसे बड़ा लेवल था.
साल 2008 जब तेल ने बनाया सबसे बड़ा रिकॉर्ड
साल 2008 में तेल की कीमतें इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थीं. उस समय अमेरिका में हाउसिंग बबल फूटा और वित्तीय संकट गहराया. 2011 की Financial Crisis Inquiry Commission की रिपोर्ट के अनुसार, बड़े पैमाने पर नियमों में ढील, कम ब्याज दरें और कर्ज देने के ढीले-ढाले मानकों के कारण बैंकों ने ऐसे लोगों और बिजनेस को मॉर्गेज लोन दिए, जिनमें क्रेडिट रिस्क बहुत ज्यादा था. मुनाफे के लिए तेजी से खरीद-बिक्री होने से कीमतों में बनावटी और तेज उछाल आया. इस सट्टेबाजी वाले निवेश के कारण कमोडिटी मार्केट में जबरदस्त तेजी आई और तेल की कीमतें बढ़कर 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, हालांकि बाद उनमें 70 फीसदी से भी ज्यादा की भारी गिरावट आई और वे लगभग 40 प्रति डॉलर बैरल पर आ गईं.
साल 1973 का ऑयल शॉक जिसने दुनिया को हिला दिया
1973 में योम किप्पुर युद्ध के दौरान OPEC देशों ने तेल सप्लाई पर रोक लगा दी थी. इसका असर ये हुआ कि तेल की कीमत 3 डॉलर से बढ़कर 11 डॉलर प्रति बैरल हो गई यानी करीब 266 फीसदी की बढ़ोतरी. कुछ मामलों में यह 17 डॉलर तक भी पहुंची. अगर आज के हिसाब से देखें, तो 1973 के 11 डॉलर की कीमत करीब 80.58 डॉलर के बराबर मानी जाती है.
1991 का गल्फ वॉर का असर
खाड़ी युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, क्योंकि इराक द्वारा कुवैत पर किए गए आक्रमण से ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो गई थी. कीमतें 17 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 36 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं. हालाँकि, यह स्थिति उतनी गंभीर नहीं थी और इसका समय भी कम रहा.
इसे भी पढ़ें- ICICI बैंक को बड़ा झटका! मिला ₹768.6 करोड़ का GST नोटिस, टैक्स विवाद के बीच शुक्रवार को फोकस में रहेंगे शेयर
