अभी और इतने रुपये बढ़ सकती हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें, महंगाई का लगेगा झटका; इन चीजों पर सबसे अधिक असर

15 मई के बाद से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो संभव है कि फ्यूल के प्राइस में अभी और इजाफा देखने को मिले. अगर बढ़ोतरी होती है, तो फिर महंगाई लोगों को जोर का झटका देगी.

अभी और बढ़ सकती हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें. Image Credit: money9live

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक कमोडिटी और एनर्जी की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी अब सिर्फ कच्चे तेल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत में रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों की कीमतों पर भी इसका असर नजर आने लगा है. 15 मई के बाद से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो संभव है कि फ्यूल के प्राइस में अभी और इजाफा देखने को मिले.

अगर बढ़ोतरी होती है, तो फिर महंगाई लोगों को जोर का झटका देगी. 15 मई से अब तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है.

2.5 रुपये और महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

Crisil की रिपोर्ट के अनुसार, ईंधन की बढ़ती कीमतें भारत में महंगाई को बढ़ा सकती है. अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है. जैसे-जैसे तेल मार्केटिंग कंपनियां धीरे-धीरे अपने नुकसान (या अंडर-रिकवरी) को कम कर रही हैं, निकट भविष्य में कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच सकती है. यानी अभी और 2.5 रुपये तक पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है.

कैसे बढ़ेगी महंगाई?

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का व्यापक असर पूरी अर्थव्यवस्था पर परिवहन लागत में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा, जिससे खाद्य और कोर, दोनों तरह की महंगाई बढ़ जाएगी.

कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से जुड़ी महंगाई में सीधे तौर पर 36 बेसिस पॉइंट्स (bps) की बढ़ोतरी का अनुमान है (पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7.5 रुपये/लीटर की बढ़ोतरी के साथ), और अगर रिटेल फ्यूल की कीमतें 10 रुपये बढ़ जाती हैं, तो यह बढ़कर 48 bps हो जाएगी.

  • प्रोड्यूसर्स को दोहरी लागत का झटका लग रहा है, क्योंकि इन चीजों की कीमतें बढ़ गई हैं.
  • कच्चा तेल, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और गैस, जिससे मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ गई है.

ग्राहकों पर बढ़ेगा बोझ

फ्यूल, जिससे ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ गई है. इसका बोझ आखिर में कंज्यूमर को चुकाने वाली कीमत पर पड़ेगा. Crisil के अनुसार, हमने वित्त वर्ष 2023 और 2024 के लिए सबसे नए ‘सप्लाई एंड यूज टेबल्स’ का इस्तेमाल करके उन कैटेगरी की पहचान की है, जिनमें ट्रांसपोर्ट का ज्यादा इस्तेमाल होता है. आने वाले महीनों में इन कैटेगरी की रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर ज्यादा देखने को मिल सकता है.

ट्रांसपोर्टेशन लागत क्यों मायने रखती है?

परिवहन एक मुख्य माध्यम है जिसके जरिए ईंधन की महंगाई पूरी अर्थव्यवस्था में फैलती है. जहां माल ढुलाई भारत की 54% लॉजिस्टिक्स लागत का हिस्सा है, वहीं सड़क परिवहन कुल माल ढुलाई का लगभग 71% हिस्सा है.

ईंधन सबसे बड़ा कॉम्पोनेंट

NCAER की स्टडी के अनुसार, सड़क परिवहन लागत में ईंधन सबसे बड़ा कॉम्पोनेंट है, जो लगभग 42 फीसदी है. रिटेल फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर इन माल ढुलाई लागत ढांचों पर पड़ेगा और आने वाले महीनों में यह सप्लाई चेन में कीमतों को प्रभावित करेगा.

खाद्य महंगाई – कम आधार और बढ़ती परिवहन लागतों के मेल से खाद्य मुद्रास्फीति की गति तेज हो जाएगी.

सप्लाई और यूज टेबल्स (Supply and Use Tables) बताती हैं कि डेयरी उत्पादों, चाय, कॉफी, फलों, दालों, मसालों, अंडों, मांस और मछली की कीमतों में परिवहन लागत का योगदान सबसे अधिक होता है. ईंधन और परिवहन लागतों में वृद्धि होने पर ये कैटेगरीज सबसे अधिक प्रभावित होती हैं.

कोर इन्फ्लेशन – परिवहन लागत में तेजी से बढ़ोतरी और साथ ही अन्य वस्तुओं की लागत से पड़ने वाले दबाव के कारण कोर इन्फ्लेशन बढ़ जाएगा.

कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स, लकड़ी के उत्पाद और आवास से जुड़ी निर्माण सामग्री (जिसमें सीमेंट और सिरेमिक शामिल हैं) के परिवहन में राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक लागत आती है. परिवहन की बढ़ती कीमतों का इन उत्पादों की फाइनल प्राइस पर असर पड़ेगा.

मैन्युफैक्चरिंग इनपुट कॉस्ट

मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाली चीजें, जैसे माइनिंग (लोहा, कोयला) और केमिकल प्रोडक्ट, भी ट्रांसपोर्ट पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं. इसलिए, मैन्युफैक्चरर्स पर इनपुट कॉस्ट का दबाव बढ़ने की संभावना है.

प्रॉफिट मार्जिन को बचाने की कवायद

अब तक मांग की स्थिति मोटे तौर पर स्थिर रहने को देखते हुए, मैन्युफैक्चरर्स द्वारा अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचाने के लिए बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने की संभावना बढ़ गई है. इसके अलावा, वे ‘श्रिंकफ्लेशन’ का भी सहारा ले सकते हैं. यानी किसी प्रोडक्ट की कीमत वही रखते हुए उसकी मात्रा कम कर देना.

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