चुनाव के बाद बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम, तेल कंपनियों को प्रति लीटर 18 से 35 रुपये तक का घाटा
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कीमतें 100 बैरल प्रति डॉलर के ऊपर चली गई थीं. फिर इस साल की शुरुआत में घटकर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं. भारत, जिसने 2025 में अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 फीसदी हिस्सा आयात किया था, वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील बना हुआ है.

Petrol-Diesel Price Outlook: अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की वजह से दुनिया भर के बाजारों में तेल की कीमतें खौल रही हैं. इसका असर भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर भी पड़ रहा है. हालांकि, अभी तक रेगुलर फ्यूल की रिटेल की कीमतों में इजाफा नहीं हुआ है, लेकिन कहा जा रहा है कि राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है.
एक दशक से भी ज्यादा समय पहले कीमतें नियंत्रण-मुक्त (Deregulated) हो जाने के बावजूद, सरकारी कंपनियां- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL), अप्रैल 2022 से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है. इस दौरान वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है.
क्रूड ऑयल की कीमतें
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तेल कीमतें 100 बैरल प्रति डॉलर के ऊपर चली गई थीं. फिर इस साल की शुरुआत में घटकर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं. लेकिन फरवरी के आखिरी में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों से आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा होने के बाद कीमतें फिर से बढ़कर लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं.
पेट्रोल-डीजल पर नुकसान
पीटीआई के मुताबिक Macquarie की रिपोर्ट बताती है कि इस समय कंपनियों का पेट्रोल पर नुकसान बढ़कर 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर हो गया है, क्योंकि सरकारी तेल कंपनियां इनपुट लागत में भारी बढ़ोतरी के बावजूद कीमतें स्थिर रखे हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले महीने जब नुकसान अपने चरम पर था, तो इन तीनों कंपनियों को हर दिन लगभग 2,400 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था. सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती के बाद यह नुकसान अब घटकर लगभग 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है.
खत्म हो गया मुनाफा
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, एक्साइज कटौती का फायदा ग्राहकों को नहीं दिया गया, बल्कि इसका इस्तेमाल कंपनियों के नुकसान की आंशिक भरपाई के लिए किया गया. इसके बावजूद मार्च महीने में हुए नुकसान ने जनवरी और फरवरी में कमाए गए सारे मुनाफे को खत्म कर दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि इन तीनों कंपनियों को जनवरी से मार्च वाली तिमाही में नुकसान होने की पूरी संभावना है.
स्पॉट प्राइस का तेल कंपनियों पर असर
मैक्वेरी ग्रुप ने ‘इंडिया फ्यूल रिटेल’ पर अपनी एक रिपोर्ट में कहा, ‘अगर पेट्रोल और डीजल की मौजूदा कीमतें (स्पॉट प्राइस) $135 से $165 प्रति बैरल के बीच रहती हैं, तो हमारे अनुमान के मुताबिक भारत की तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर क्रमशः 18 रुपये और 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होगा.’ रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से मार्केटिंग से होने वाले नुकसान में लगभग 6 रुपये प्रति लीटर की और बढ़ोतरी हो जाती है.
चुनाव के बाद बढ़ सकती हैं कीमतें
ब्रोकरेज फर्म ने इस महीने के आखिर में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे अहम राज्यों में चुनावों के बाद रिटेल फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी की बहुत ज्यादा संभावना जताई है. हमें अप्रैल में राज्यों के चुनावों के बाद पंप की कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम दिख रहा है.
भारत, जिसने 2025 में अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 फीसदी हिस्सा आयात किया था, वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील बना हुआ है. लगभग 45 फीसदी आयात पश्चिम एशिया से, 35 फीसदी रूस से और 6 फीसदी अमेरिका से हुआ. इसके बावजूद, देश डीजल, पेट्रोल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल सहित प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का नेट एक्सपोर्टर बना हुआ है.
हालांकि, सरकार ने मार्च में ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी, लेकिन केंद्रीय लेवी में गिरावट का रुख बना हुआ है और अब यह पेट्रोल पर 11.9 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 7.8 रुपये प्रति लीटर है. रिपोर्ट में कहा गया है कि एक्साइज ड्यूटी को पूरी तरह से हटा देने पर भी मौजूदा कीमतों पर OMC (तेल विपणन कंपनियों) के नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो पाएगी.
राजकोषीय प्रभाव
हालांकि, राज्य-स्तरीय VAT दरें काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं. टैक्स कटौती के राजकोषीय प्रभाव काफी अहम हो सकते हैं. FY26 में लगभग 170 अरब लीटर की अनुमानित खपत के आधार पर, एक्साइज ड्यूटी को पूरी तरह से वापस लेने से सालाना राजस्व में लगभग $36 अरब का नुकसान हो सकता है, जिससे राजकोषीय घाटा अनुमानित 80 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है, ऐसा रिपोर्ट में कहा गया है.
सरकारी रेवेन्यू में फ्यूल पर लगने वाले एक्साइज ड्यूटी का योगदान FY17 के 22 फीसदी से घटकर FY26 में लगभग 8 फीसदी रह गया है, और अब यह राजकोषीय घाटे के पांचवें हिस्से से भी कम है, जो अपने चरम स्तर 45 फीसदी से काफी नीचे आ गया है.
चालू खाता घाटा
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के बाहरी संतुलन के लिए भी एक जोखिम पैदा करती हैं. चालू खाता घाटा, जो 2025 के मध्य में लगभग संतुलित स्थिति में था, 2026 की पहली तिमाही में बढ़कर लगभग 20 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है. मैक्वेरी की रिपोर्ट के अनुसार, यदि कोई नीतिगत प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की लगातार वृद्धि से यह घाटा GDP के लगभग 30 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है.
EBITDA पर कितना असर?
OMC के लिए कमाई की स्थिति अनिश्चित बनी हुई है. कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 1 डॉलर के हर बदलाव से EBITDA पर लगभग 5 फीसदी का असर पड़ता है. इस सेक्टर के लिए ब्रेक-ईवन क्रूड प्राइस 80-85 डॉलर प्रति बैरल होने का अनुमान है. इस आउटलुक को देखते हुए, मैक्वेरी ग्रुप ने कहा कि वह निकट भविष्य में तेल मार्केटिंग कंपनियों के मुकाबले यूटिलिटीज को ज्यादा पसंद करता है.