खरीफ फसलों पर संकट के संकेत, कमजोर मानसून और महंगाई से बढ़ेगी चिंता; किसानों के लिए अलर्ट
इस बार खरीफ सीजन पर कमजोर मानसून और पश्चिम एशिया तनाव का दोहरा असर पड़ सकता है. अल नीनो के कारण बारिश कम रहने की आशंका है, जिससे फसल प्रोडक्शन घट सकता है. वहीं कच्चे तेल और खाद की बढ़ती कीमतों से किसानों की लागत बढ़ेगी. इसका असर खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है.
Kharif Season India: देश का आने वाला खरीफ सीजन इस बार कई चुनौतियों का सामना कर सकता है. मौसम और वैश्विक हालात दोनों ही खेती पर असर डाल सकते हैं. कमजोर मानसून और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सीधा असर फसल प्रोडक्शन पर पड़ सकता है. इससे खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग पर भी दबाव बढ़ सकता है. सरकार राहत देने की कोशिश कर सकती है, लेकिन जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ऐसे में किसानों और बाजार दोनों की नजर मानसून पर टिकी है.
कमजोर मानसून से प्रोडक्शन पर असर
ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका जताई जा रही है. अल नीनो की स्थिति बनने से बारिश पर असर पड़ सकता है. आमतौर पर अल नीनो वाले वर्षों में खरीफ प्रोडक्शन में गिरावट देखी जाती है.जानकारों का मानना ऐसे समय में प्रोडक्शन में औसतन कमी आ सकती है. इसका असर धान और दाल जैसी फसलों पर ज्यादा पड़ सकता है.
तनाव से बढ़ सकती है लागत
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर एग्रीक्लचर पर भी पड़ सकता है. कच्चे तेल, खाद और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है. इससे किसानों की लागत बढ़ेगी. साथ ही समुद्री रास्तों में बाधा आने से सप्लाई चेन भी प्रभावित हो सकती है. इससे निर्यात और आयात दोनों पर असर पड़ सकता है.
खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका
अगर प्रोडक्शन कम होता है और लागत बढ़ती है तो इसका असर सीधे खाने पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ सकता है. खाद्य महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है. इससे आम लोगों की जेब पर असर पड़ेगा. खासकर ग्रामीण इलाकों में खर्च करने की क्षमता कम हो सकती है.
सरकार दे सकती है राहत
हालांकि सरकार इस स्थिति को संभालने के लिए कदम उठा सकती है. खाद सब्सिडी बढ़ाने और किसानों को राहत देने के उपाय किए जा सकते हैं. इससे कुछ हद तक लागत का बोझ कम हो सकता है. सरकार मानसून और बुवाई की स्थिति पर लगातार नजर रखेगी.
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ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है असर
अगर फसल प्रोडक्शन कम होता है तो किसानों की इनकम पर असर पड़ेगा. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में मांग घट सकती है. इसका असर अर्थव्यवस्था के दूसरे सेक्टर पर भी पड़ सकता है. कुछ जानकारों अगर बारिश का वितरण सही रहता है और जलाशयों में पर्याप्त पानी रहता है तो प्रोडक्शन सामान्य रह सकता है. आने वाले जून और जुलाई महीने में मानसून की स्थिति तय करेगी कि खरीफ सीजन कैसा रहेगा.
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