पॉलिटिक्स टू प्रॉफिट! संसद में 33% महिला आरक्षण से ऐसे रफ्तार भरेगी इकोनॉमी; चीन, नॉर्वे, स्वीडन की राह पर भारत

संसद में आज महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए तीन ऐतिहासिक विधेयक पेश किए गए हैं. परिसीमन और जनगणना की बाधाओं को दूर कर सरकार 2029 के चुनावों में महिलाओं की 33% भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है. जानिए कैसे यह राजनीतिक फैसला भारत की जीडीपी (GDP) में 30% तक का उछाल ला सकता है और क्यों स्वीडन-नॉर्वे जैसे देश इस मामले में भारत के लिए मिसाल हैं.

महिला आरक्षण विधेयक 2026, Image Credit: Money9 Live

Women Reservation and Delimitation Bill: संसद की टेबल पर पेश हुए तीन ऐतिहासिक विधेयक न केवल राजनीति की दशा और दिशा बदलेंगे, बल्कि यह उस आर्थिक क्रांति की नींव भी रखेंगे जिसका इंतजार दशकों से किया जा रहा है. महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तय करने वाले संशोधित विधेयक उस ‘इंजन’ को चालू करने की कोशिश है जिसे दुनिया ‘नारी शक्ति’ कहती है.

सोचिए, जिस देश की जीडीपी में महिलाओं का योगदान फिलहाल सिर्फ 18% है, अगर वह बढ़कर पुरुषों के बराबर आ जाए, तो भारत की अर्थव्यवस्था रॉकेट की रफ्तार से बढ़ सकती है. संसद में पेश ‘केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026’, ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026’ और ‘परिसीमन विधेयक 2026’ का सीधा मकसद यही है कि 2029 के आम चुनावों तक हर हाल में महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं के दरवाजे 33% मजबूती के साथ खोल दिए जाएं.

मिशन 2029: आरक्षण की राह से हटेंगी अड़चनें

साल 2023 में जब ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित हुआ था, तब सबसे बड़ी चिंता ‘समय’ को लेकर थी. कानून तो बन गया था, लेकिन शर्त थी कि आरक्षण नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा. ऐसे में इस नियम को लागू होने में 10 साल या उससे ज्यादा लग सकते हैं. लेकिन आज संसद में जो तीन विधेयक पेश हुए वे इस प्रक्रिया को ‘फास्ट ट्रैक’ पर ले आएंगे. सीटों का बंटवारा 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा ताकि 2029 के चुनावों में देश की बेटियां कानून बनाने वाली मेजों पर अपनी तय हिस्सेदारी के साथ बैठें.

यह परिसीमन विधेयक 2026 न केवल महिलाओं को आरक्षण देगा, बल्कि बढ़ती आबादी के हिसाब से संसद में सदस्यों की संख्या बढ़ाने का रास्ता भी साफ करेगा. जब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो नीतियां केवल ‘पुरुष प्रधान’ नहीं रहेंगी. शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और श्रम जैसे मुद्दों पर एक नया और संवेदनशील नजरिया देखने को मिलेगा, जो आखिरकार समाज को जड़ों से मजबूत करेगा.

लोकसभा में महिलाओं का सफर

अगर हम इतिहास पर नजर डालें, तो भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व हमेशा से ‘कछुआ चाल’ वाली रही है. पहली लोकसभा में यह आंकड़ा महज 4-5% के आसपास था. ग्राफ कभी ऊपर गया तो कभी नीचे. 9वीं लोकसभा के दौरान तो यह गिरकर 5% के करीब आ गया था. हालांकि, 17वीं लोकसभा में हम 14% से कुछ ऊपर पहुंचे हैं, लेकिन दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले हम अभी भी बहुत पीछे हैं.

Prs India 2023 की रिपोर्ट ‘Women in Parliament and State Assemblies’ में दिए गए ग्राफ और आंकड़ों की तुलना करें तो स्वीडन (46%), नॉर्वे (46%) और दक्षिण अफ्रीका (45%) जैसे देश महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भारत से कोसों आगे हैं. यहां तक कि बांग्लादेश (21%) भी भारत (14%) के मुकाबले अपनी संसद में महिलाओं को ज्यादा जगह दे रहा है. आज जो बिल संसद में है, उसका मुख्य उद्देश्य भारत को इसी वैश्विक कतार में सबसे आगे खड़ा करना है.

जब महिलाएं नेतृत्व करेंगी, तो वे केवल अपने क्षेत्र का विकास नहीं करेंगी, बल्कि समाज के उस 48% हिस्से का आत्मविश्वास बढ़ाएंगी जो घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर देश बनाने का सपना देखता है.

अर्थव्यवस्था और जेंडर गैप: 30% तक बढ़ सकती है भारत की जीडीपी

दुनियाभर की रिसर्च रिपोर्ट एक स्वर में कहती हैं कि जिस देश ने महिलाओं को आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त किया, उसकी जीडीपी (GDP) में उछाल आना तय है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की 2024 की स्टडी बताती है कि यदि रोजगार में जेंडर गैप को खत्म कर दिया जाए, तो भारत की जीडीपी में 30% तक की भारी बढ़ोतरी हो सकती है. 2011 Census के मुताबिक, भारत की आबादी में 48% महिलाएं हैं, लेकिन आर्थिक उत्पादन में उनकी भागीदारी महज 18% है. यह एक बहुत बड़ा ‘मिसिंग गैप’ है.

मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत महिलाओं की समानता को बढ़ावा दे, तो वार्षिक जीडीपी में 770 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त इजाफा हो सकता है. यह सामान्य विकास दर से 18% अधिक होगा. यह भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का सबसे छोटा और पक्का रास्ता है.

जहां महिला सशक्त, वहां पैसा और समृद्धि ज्यादा

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की 2023 की रिपोर्ट साफ कहती है कि उभरते बाजारों में यदि लेबर मार्केट के जेंडर गैप को कम किया जाए, तो जीडीपी 8% तक बढ़ सकती है और अगर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए, तो यह वृद्धि 23% तक जा सकती है. दुनिया के जो देश आज आर्थिक महाशक्ति हैं, वहां महिलाओं की भागीदारी 35% से 40% के बीच है. चीन में महिलाओं का जीडीपी योगदान 41% है, जबकि भारत अभी 17-18% पर जूझ रहा है.

जब संसद में 33% महिलाएं बैठेंगी, तो वे ऐसे कानून और नीतियां बनाएंगी जो महिलाओं के लिए बैंकिंग, लोन और स्टार्टअप की राह आसान करेंगे. अभी 65% महिलाएं सामाजिक बाधाओं के कारण बैंकिंग सेवाओं का लाभ नहीं ले पातीं. लेकिन जब एक महिला सांसद अपने क्षेत्र की महिलाओं के लिए काम करेगी, तो ये बाधाएं टूटेंगी. महिलाओं के पर्स में जब अपने पैसे होंगे तो देश की कंज्यूमर स्पेंडिंग भी बढ़ेगी. भारत में वर्तमान में 10% स्टार्टअप महिलाओं द्वारा संचालित हैं, लेकिन राजनीतिक सशक्तिकरण के बाद यह आंकड़ा कई गुना बढ़ सकता है.

कामकाजी महिलाओं के आंकड़े

अच्छी खबर यह है कि देश में बदलाव ने दस्तक दे दी है. भारत में ‘वर्कर पॉपुलेशन रेशियो’ (WPR) यानी कामकाजी महिलाओं के अनुपात में जबरदस्त सुधार हुआ है. साल 2017-18 में जहां केवल 22% महिलाएं काम कर रही थीं, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 40.3% हो गया है. इसी तरह श्रम बल में भागीदारी (LFPR) भी 23.3% से बढ़कर 41.7% तक पहुंच गई है. ग्रामीण इलाकों में तो महिलाओं की भागीदारी 45.9% तक दर्ज की जा रही है.

2025-26 के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में महिलाएं मजबूती से श्रम बल का हिस्सा बन रही हैं. हालांकि, अभी भी एक बड़ी चुनौती यह है कि 88% कामकाजी महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) में हैं, जहां न तो सामाजिक सुरक्षा है और न ही बेहतर वेतन. संसद में महिला आरक्षण इन्हीं महिलाओं के हक की आवाज को कानूनी जामा पहनाने का जरिया बनेगा.

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जब संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो समाज की सोच बदलेगी. वे रोल मॉडल बनेंगी, जिससे पितृसत्तात्मक ढांचों में दरार आएगी और लड़कियों की शिक्षा व करियर को लेकर परिवार का नजरिया बदलेगा.

2029 में जब आरक्षण लागू होता है, तो भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना रहेगा, बल्कि वह एक ऐसा देश बनेगा जहां आर्थिक विकास की कमान पुरुष और महिला दोनों के हाथों में बराबर होगी. यही वह ‘पावर ऑफ पैरिटी’ है जो भारत को विश्व गुरु बनाने का सामर्थ्य रखती है.

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