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सुप्रीम कोर्ट की कॉरपोरेट मंत्रालय को फटकार, कहा- NCLT और NCLAT पर पूरी तरह कब्जा किया, नियुक्तियों पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT की स्वायत्तता को लेकर कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) पर तीखी टिप्पणी की है. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि मंत्रालय ने दोनों संस्थानों पर पूरी तरह कंट्रोल कर लिया है.

- सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT की स्वायत्तता पर चिंता जताई. Image Credit: TV9 Bharatvarsh

Highlights

  • सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT की ऑटोनॉमी पर चिंता जताई.
  • संविदा कर्मचारियों ने अचानक नौकरी से हटाए जाने की आशंका जताई.
  • कोर्ट ने प्रतिनियुक्ति और UPSC-SSC के जरिए चरणबद्ध नियमित भर्ती का सुझाव दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की ऑटोनॉमी को लेकर कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) पर तीखी टिप्पणी की है. गुरुवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि मंत्रालय ने दोनों संस्थानों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है. कोर्ट ने कहा कि NCLT और NCLAT में नियुक्तियों को लेकर दोनों संस्थानों के अध्यक्षों को पूरी ऑटोनॉमी मिलनी चाहिए. इसके लिए कोर्ट ने सरकारी विभागों से अनुभवी कर्मचारियों को डेप्यूटेशन पर लाने और आगे चलकर UPSC या SSC के जरिए नियमित भर्ती करने का सुझाव दिया.

MCA के कंट्रोल पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच NCLT और NCLAT में काम करने वाले संविदा कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान बेंच ने दोनों संस्थानों की नियुक्ति प्रक्रिया और प्रशासनिक स्वायत्तता पर सवाल उठाए.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का दोनों संस्थानों पर पूरा कंट्रोल होना उनकी स्वायत्तता को प्रभावित करता है. उन्होंने कहा कि NCLT और NCLAT के अध्यक्षों को नियुक्तियों के मामले में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि मंत्रालय का संस्थानों पर पूरी पकड़ बनाए रखने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है.

संविदा कर्मचारियों को हटाने का मामला क्या है?

यह मामला NCLT और NCLAT में काम कर रहे संविदा कर्मचारियों की याचिका से जुड़ा है. कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि करीब छह साल से काम कर रहे कर्मचारियों को अचानक नौकरी से नहीं हटाया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि NCLT के भर्ती नियमों और नौकरी के विज्ञापन में कर्मचारियों को नियमित करने का प्रावधान है. ऐसे में सभी कर्मचारियों को एक साथ हटाना मनमाना हो सकता है. वकील ने कोर्ट से यह भी आग्रह किया कि NCLT अध्यक्ष की मंजूरी के बिना कर्मचारियों की सेवा समाप्त नहीं की जानी चाहिए.

अरोड़ा ने अपनी दलील में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, इस तरह कर्मचारियों को हटाने से समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो सकता है.

1 या 2 नवंबर से नौकरी छोड़ने की आशंका

सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से आशंका जताई गई कि मौजूदा संविदा कर्मचारियों को 1 या 2 नवंबर से काम छोड़ने के लिए कहा जा सकता है. उनकी जगह एक प्राइवेट कंपनी के जरिए नई नियुक्तियां किए जाने की संभावना बताई गई.

वकील ने कहा कि कर्मचारियों ने लंबे समय तक दोनों संस्थानों में सर्विस दी हैं. उन्होंने यह भी बताया कि संविदा कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों की तरह हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और महंगाई भत्ता (DA) नहीं मिलता.

वहीं, मुख्य न्यायाधीश ने संविदा के आधार पर नियुक्तियों पर असहमति जताई. उन्होंने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ मामलों में संविदा कर्मचारियों के कारण न्यायिक सदस्यों को परेशानी हुई है. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के कामकाज को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता.

NCLT और NCLAT में भर्ती के लिए क्या है सुझाव?

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों संस्थानों की स्वायत्तता बनाए रखने के लिए भर्ती व्यवस्था में बदलाव का सुझाव दिया. बेंच के मुताबिक, तत्काल समाधान के तौर पर सरकारी विभागों से अनुभवी कर्मचारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाया जा सकता है.

इसके साथ ही, दोनों ट्रिब्यूनल को नियमित भर्ती की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से शुरू करनी चाहिए. कोर्ट ने सुझाव दिया कि इसके लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) या कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की मदद ली जा सकती है.

बेंच ने कहा कि इस समस्या के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक, दोनों तरह के समाधान जरूरी हैं. कोर्ट ने कर्मचारियों की याचिका पर नोटिस जारी किया और मामले को व्यापक हित से जुड़ा बताया.

फिलहाल, ये टिप्पणियां सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से की गई हैं. इन्हें मामले में अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए. आगे की कानूनी प्रक्रिया और कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट होगा कि नियुक्तियों और दोनों संस्थानों की ऑटोनॉमी को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं.