US Fed ने तीन साल में पहली बार ब्याज दर बढ़ाने का किया ऐलान, 25 bps की बढ़ोतरी; भारत पर क्या पड़ेगा असर?

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईंधन की बढ़ती कीमतों से महंगाई अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रही है. फेड का यह फैसला तब आया जब अगस्त में कंज्यूमर महंगाई 3.4% पर रही. यह पिछले महीने से अलग नहीं थी लेकिन सेंट्रल बैंक के 2% टारगेट से अभी भी काफी अधिक है.

यू.एस. फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श. Image Credit: US Federal Reserve

Highlights

  • महंगाई के ताजा आंकड़ों ने बढ़ोतरी करने की जरूरत को और मजबूत कर दिया.
  • दरों में बढ़ोतरी फेड चेयरमैन केविन वॉर्श के लिए भी एक बड़ी परीक्षा है.
  • महंगाई के कारण सेंट्रल बैंक के पास नीति में ढील देने की गुंजाइश कम हो गई है.

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बुधवार को 2023 के बाद पहली बार इंटरेस्ट रेट बढ़ाए हैं. यह कदम महंगाई को कंट्रोल करने के लिए उठाया गया है, जो उसके लॉन्ग-टर्म टारगेट से काफी ऊपर बनी हुई है. फेडरल ओपन मार्केट कमेटी ने दो दिन की मीटिंग के बाद इस फैसले की घोषणा की, जिसमें बेंचमार्क इंटरेस्ट रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 3.75%-4.00% की रेंज में कर दिया गया.

ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर

अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने कहा है कि वह ब्याज दरों में एक चौथाई फीसदी अंक की बढ़ोतरी करेगा, क्योंकि अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईंधन की बढ़ती कीमतों से महंगाई अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रही है.

यह कदम US सेंट्रल बैंक के लिए एक बदलाव है, जिसने जनवरी से रेट्स में कोई बदलाव नहीं किया था. दरअसल अमेरिकी केंद्रीय बैंक इकोनॉमी पर एनर्जी की अधिक कीमतों, टैरिफ और बड़े पैमाने पर कीमतों के दबाव के असर का अंदाजा लगाने का इंतजार कर रहा था.

महंगाई की वजह से फेड को एक्शन लेना पड़ा

फेड का यह फैसला तब आया जब अगस्त में कंज्यूमर महंगाई 3.4% पर रही. यह पिछले महीने से अलग नहीं थी लेकिन सेंट्रल बैंक के 2% टारगेट से अभी भी काफी अधिक है.

पश्चिम एशिया में नए तनाव के बाद एनर्जी की बढ़ी कीमतों, टैरिफ पॉलिसी के असर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बूम से जुड़ी मजबूत डिमांड से महंगाई के दबाव को सपोर्ट मिला है.

इससे पहले सेंट्रल बैंक ने दरों में बदलाव करने से पहले इंतजार करने का फैसला किया था, लेकिन महंगाई के ताजा आंकड़ों ने बढ़ोतरी करने की जरूरत को और मजबूत कर दिया. जुलाई में हुई फेड की बैठक में वोट देने वाले एक-चौथाई सदस्यों ने दरों को स्थिर रखने के फैसले का विरोध किया था और तुरंत बढ़ोतरी की मांग की थी.

वॉर्श के लिए विश्वसनीयता की पहली बड़ी परीक्षा

दरों में बढ़ोतरी फेड चेयरमैन केविन वॉर्श के लिए भी एक बड़ी परीक्षा है, जिन्होंने इस साल की शुरुआत में सेंट्रल बैंक की कमान संभाली थी. वॉर्श ने दरों की संभावित चाल के बारे में साफ संकेत देने से परहेज किया था, लेकिन उन्होंने यह संकेत दिया था कि अगर महंगाई में कमी नहीं आई तो फेड एक्शन लेगा.

इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनके मतभेद हो सकते हैं, जिन्होंने वॉर्श को इस उम्मीद के साथ चुना था कि वे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कम ब्याज दरों का समर्थन करेंगे.

ट्रंप ने बार-बार फेड से दरों में कटौती करने के लिए कहा है, उनका तर्क है कि उधार लेने की लागत कम होने से विकास में मदद मिलेगी. लेकिन महंगाई के कारण सेंट्रल बैंक के पास नीति में ढील देने की गुंजाइश कम हो गई है.

दरों में बढ़ोतरी का क्या मतलब है?

जानकारों का कहना है कि बढ़ोतरी से महंगाई से निपटने में फेड चेयरमैन की विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है, और वित्तीय स्थितियों को बहुत ज्यादा सख्त होने से बचाने के लिए फेड को आगे सीमित बढ़ोतरी के दौर का संकेत देना पड़ सकता है.

भारत पर क्या असर हो सकता है?

कमजोर हो सकता है रुपया: अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने से डॉलर में निवेश आकर्षक हो जाता है. ऐसे में विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड/एसेट्स में लगा सकते हैं. इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है. अभी भी रुपये पर तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मांग का दबाव है.

बढ़ सकती है FPI/FII की बिकवाली: अगर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़ती है, तो भारत जैसे बाजारों में निवेश का जोखिम-रिटर्न रेश्यो विदेशी निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो सकता है. इसका असर खास तौर पर भारतीय शेयर बाजार में वोलैटिलिटी के रूप में दिखाई दे सकता है.

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